Sun. May 31st, 2020

क्या भारत में ईजाद होगी कोरोना की वैक्सीन?

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“आज के दिन दुनिया में दर्जनों जगहों पर कोरोना वैक्सीन पर काम चल रहे हैं। पिछली एक सदी के दौरान दुनिया में जब कोई संकट आया तो अमेरिकी वैज्ञानिक ही सबसे आगे खड़े मिले। अब अमेरिका समेत दर्जनों देशों में कोविड-19 की वैक्सीन खोजने के लिए दिन-रात काम चल रहा है।”

आर.के. सिन्हा

कोरोना वायरस ने दुनिया के हरेक इंसान की आंखों से आंसू निकलवा दिये हैं। सारी दुनिया की अधिकांश आबादी इस जानलेवा वायरस से बचने के लिए घरों के अंदर ही छिपी हुई है। अब पृथ्वी पर मौजूद हरेक धर्म, जाति, रंग, लिंग आदि से संबंधित मानव-समाज की यह ही ईश्वर से प्रार्थना है कि कोरोना वायरस की कोई वैक्सीन जल्द से जल्द ईजाद हो जाये, ताकि दुनिया फिर से अपनी गति से चलने लगे। दफ्तर खुल जायें, कारोबार चालू हो जायें, स्कूल-कॉलेजों में छात्र-छात्राएं आने लगें, बाजार खरीदारों से गुलजार हो आ जायें आदि और पूरी दुनिया कोरोना से पूर्व की जिंदगी में लौटे।

चूंकि कोरोना के कारण मौतें बढ़ती ही जा रही हैं, इसलिए सारी दुनिया में इसकी औषधि को खोजने की भी तलाश तेज हो चुकी है। बीते दिनों खबर आयी थी कि चड़ीगढ़ के पीजीआई में कोरोना की वैक्सीन एमडब्ल्यू वैक्सीन पर काम पूरा हो चुका है। इसके ट्रायल चल रहे हैं। कुल 40 लोगों पर इसका ट्रायल होना है।

अगर भारत में कोरोना वायरस की कोई दवा मिल जाती है, तो यह भारत के वैज्ञानिकों लिए बड़ी उपलब्धि होगी। पर अभी इस दिशा में ठोस जानकारी मिलने का इंतजार है। पर यह कहना सही होगा कि प्रतिभाशाली इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से भरे भारत में कभी भी उन्हें कुछ सर्जनात्मक करने की भी संकल्प-शक्ति भी है।

हमने साइंस और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलताएं अर्जित तो नहीं की हैं। परन्तु, यह देश के लिए कोई गर्व की बात नहीं है कि भारत में बहुत कम औषधि अन्वेषण प्रयोगशालाएं नयी औषधियों के लिए शोध कर रही हैं। भारत सरकार द्वारा स्थापित केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के तमाम वैज्ञानिक दशकों से क्या खोज रहे हैं, यह भी समझ से बाहर है।

केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान देश में स्थापित सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं में से एक है। यह संस्थान भारतीय विज्ञान एवं उद्योग अनुसंधान परिषद (सी.एस.आई.आर.) के संरक्षण में काम करने वाली 39 प्रयोगशालाओं में से एक है। इसका औपचारिक उद्घाटन 1951 में हुआ था। क्या इस प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों से कभी किसी ने पूछा कि यहां से कितनी अहम औषधियों को ईजाद किया गया?

हमारे पास अवसर तो है। किन्तु, हमारी फार्मा कंपनियों ने अमेरिका और यूरोप से मुनाफाखोरी और सुविधाभोगी है, होना ही भर सीखा है। उन्होंने कभी कोई बड़ी व्याधि की औषधि खोजी हो तो बताएं। चीन कोरोना से अब बाहर आ चुका है, ऐसा बताते हैं। लेकिन, हम अभी तक जूझ रहे हैं। आपको यह जानकार भी हैरानी होगी कि भारत में किसी भी उल्लेखनीय एलोपैथिक दवा को ईजाद नहीं किया गया है।

संकट में अमेरिका रहा है आगे

बहरहाल, आज के दिन दुनिया में दर्जनों जगहों पर कोरोना वैक्सीन पर काम चल रहे हैं। पिछली एक सदी के दौरान दुनिया में जब कोई संकट आया तो अमेरिकी वैज्ञानिक ही सबसे आगे खड़े मिले। यानी वह संकट का मुकाबला करने वालों में अहम रोल निभा रहा था। अब अमेरिका समेत दर्जनों देशों में कोविड-19 की वैक्सीन खोजने के लिए दिन-रात काम चल रहा है।

जानकारों का कहना है कि अमेरिकी वैज्ञाानिकों ने कोरोना की वैक्सीन का सफल ह्यूमन ट्रायल भी कर लिया है। अब कहीं न कहीं से जल्द ही दवा आने की उम्मीद है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि दवा जल्दी ही इस्तेमाल के लिए भी तैयार हो जाएगी। अभी क्लीनिकल ट्रायल की तैयारी चल रही है। क्लीनिकल ट्रायल को ऑस्ट्रेलिया में अंजाम दिये जाने की तैयारी भी चल रही है।

सफलता के करीब कौन?

विश्व स्वास्थ्य संगठन को लगता है कि कोरोना वैक्सीन के व्यावसायिक उत्पादन आने में अभी डेढ़ साल तक का लग सकता है। लेकिन, वह यह दावा किस आधार पर कर रहा है, इसकी जानकारी उसकी तरफ से नहीं मिली है।

इस बीच, एक अमेरिकी कंपनी मॉडर्ना के बारे में कहा जा रहा है कि अगर उसके तीसरे चरण के परीक्षण सफल रहे तो दुनिया कोरोना को मात दे देगी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मॉडर्ना में हो रहे काम के आधार पर कह रहे हैं कि इस साल के अंत तक कोरोना की वैक्सीन मिल सकती है। यूरोप की भी कई प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक कोरोना के खिलाफ काम करने वाली वैक्सीन को तलाश रहे हैं।

खबरें मिल रही हैं कि यूरोप की कुछ प्रयोगशालाओं ने वैक्सीन तैयार करने के स्तर पर कुछ ठोस उपलब्धियां भी दर्ज की हैं। इन्होंने इंसानों पर ट्रायल चालू कर दिया है और उसके अब तक के नतीजे भी अच्छे आये हैं। तो कमोबेश यह ही लग रहा है कि कोरोना के खिलाफ वैक्सीन जल्दी ही आने वाली है। पर वह अमेरिका या यूरोप की किस लैब से आएगी? हालांकि, अगर वह भारत में ईजाद हो तो बहुत ही सुखद होगा। हालांकि अभी तक हमारे देश के रिकार्ड को देखकर इस तरह की संभावनाएं करना जल्दी होगी।

इस बीच, कुछ जानकार यह मानते हैं कि भारतीय मीडिया ने ‘कोरोना का कहर’ और ‘कोरोना का कोहराम’ जैसे जुमले गढ़कर देशवासियों को डरा दिया है। अब अगर लॉकडाउन हट भी जाये, तब भी इसका डर बना ही रहेगा। अजीब स्थिति है कि किसी अस्पताल में कोरोना का एक रोगी मिलने पर भी पूरा अस्पताल सील कर दिया जाता है।

अस्पतालों को सील करने से क्या होगा? अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मन में तो कोई अस्पताल कोरोना रोगी मिलने के कारण बंद नहीं किया जाता। बेशक, वहां भी कर दिया जाता, अगर वहां भी भारत की तरह के सरकारी बाबू मौजूद होते। राजधानी के हृदय-रोग-विशेषज्ञ दीपक नटराजन का सवाल वाजिब है कि क्या अस्पताल में जाने वाले लोगों को डराना सही है? यदि ऐसा हुआ तो अगले दो-चार सालों में हार्ट अटैक, कैंसर और स्ट्रोक से होने वाली मौतें कोरोना से कई गुना ज्यादा होंगी।

एक बात तो समझनी ही होगी कि जब तक कोरोना की वैक्सीन नहीं आती तब तक हमें घर से बाहर निकलते हुए मुंह में मास्क और हाथों पर दस्ताने पहनने ही होंगे। सोशल डिस्टेंसिंग का हर सूरत में पालन करना ही होगा। दुर्भाग्यवश अब भी शहरों तक में तमाम पढ़े-लिखे लोग इन छोटी-छोटी बातों पर गौर नहीं कर रहे हैं।

मुझे दिल्ली पुलिस का एक आला अफसर बता रहा था कि लॉकडाउन के दौर में भी कुछ लोग बाजारों में बिना मास्क पहने सब्जी खरीद रहे होते हैं। अब आप इन लोगों के बारे में क्या कहेंगे? इनका तो भगवान ही मालिक है। भारत में कोरोना के फैलाव को बढ़ाने में तबलीगियों से लेकर प्रवासी मजदूरों के मसलों ने बहुत गड़बड़ की। सरकार की भी अपनी सीमाएं हैं। अब तो देश को कोरोना की वैक्सीन का ही सहारा है। आशा है कि यह जल्दी बाजार में आ जाएगी।
                                                                                                                                                   (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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