April 18, 2021

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हिन्दी का विरोध क्यों?

“विश्व के कई देशों में हिन्दी बोलने और समझने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कुछ समय पूर्व आबू धाबी में हिन्दी को तीसरी भाषा के रुप में मान्यता मिलना निश्चित तौर पर हिन्दी की गौरव गाथा को ध्वनित करता है।”

सुरेश हिन्दुस्थानी 06.06.2019

हिन्दी अपने देश की मातृभाषा है। लेकिन दुर्भाग्य से दक्षिण भारत के राज्यों के विरोध के कारण अब तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं प्राप्त कर पायी है। अब फिर हिन्दी विरोधी वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है। वजह यह कि वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अगुआई वाली समिति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारुप केन्द्र सरकार को सौंपा है, उसमें भारत के सभी प्रदेशों में तीन भाषा प्रणाली को लागू करने की बात प्रस्तावित है। तमिलनाडु सरकार ने यह कहकर इस प्रस्ताव का विरोध किया है कि उनके राज्य पर हिन्दी नहीं थोपी जानी चाहिए। यहां पर सवाल यह आता है कि अभी केवल प्रारुप ही आया है तो इसमें थोपने जैसी बात कहां से आ गयी।

वैश्विक बनती हिन्दी

यह सही है कि दक्षिण के कुछ राज्यों में हिन्दी के विरोध में स्वर मुखरित किए जाते रहे हैं। इन राज्यों के हिन्दी विरोध में राजनीतिक कारण ही दिखायी देता है क्योंकि हिन्दी के विरोध में राजनीतिक आंदोलन किए जाते रहे हैं, इनमें जनता की भागीदारी नहीं के बराबर ही होती है। इसे हिन्दी का राजनीतिक विरोध कहा जाए तो अधिक समुचित होगा। हिन्दी को भले ही देश के सभी राज्यों में समान सम्मान नहीं मिल रहा हो, लेकिन हिन्दी भाषा पहले से भी और वर्तमान में भी वैश्विक सम्मान को प्रमाणित करती हुई दिखायी दे रही है। आज विश्व के कई देशों में हिन्दी बोलने और समझने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कुछ समय पूर्व आबू धाबी में हिन्दी को तीसरी भाषा के रुप में मान्यता मिलना निश्चित तौर पर हिन्दी की गौरव गाथा को ध्वनित करता है। लेकिन हमारे राज्यों में हिन्दी के प्रति इतना राजनीतिक आक्रोश क्यों?

भारत में हिन्दी की संवैधानिक स्वीकार्यता रही है। कई संस्थाएं हिन्दी को राजभाषा के रुप में प्रचारित करती हैं तो कई मातृभाषा के रुप में। दक्षिण के राज्यों में भी हिन्दी बोलने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसलिए यह तो कहा ही जा सकता है कि हिन्दी लगातार अपना विस्तार कर रही है। भारतीय संविधान के अनुसार हिन्दी भारत संघ के साथ ही उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड व उत्तराखण्ड राज्यों तथा दिल्ली व संघ शासित क्षेत्र अंडमान निकोबार की भी राजभाषा है। इसी के साथ महाराष्ट्र, गुजरात व पंजाब राज्यों व संघ शासित क्षेत्रों चंडीगढ़, दादर नगर हवेली व दमन द्वीप में शासकीय कार्यों हेतु हिन्दी मान्य राजभाषा है।

सात देशों में हिन्दी को मान्यता

भारत के साथ ही सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद, गुयाना, मारीशस, थाइलैंड व सिंगापुर इन सात देशों में भी हिन्दी को सम्मान के साथ देखा जाता है और उसे सरकारी मान्यता प्राप्त है। अब आबू धाबी को मिलाकर हिन्दी भारत के अतिरिक्त 8 देशों की मान्यता प्राप्त भाषा बन गयी है। इसी के साथ विश्व के 44 ऐसे राष्ट्र हैं, जहां की 10 प्रतिशत या उससे अधिक जनता हिन्दी को बोलती एवं समझती है। यह बात हिन्दी भाषा की सर्वग्राह्यता को बखूबी प्रतिपादित करती है कि विश्व के अनेक देशों में हिन्दी भाषा के पत्र, पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं। अमेरिका में ‘हम हिन्दुस्तानी’ नाम का साप्ताहिक समाचार पत्र आज विश्व ख्याति अर्जित कर रहा है। उसके पाठकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी प्रकार चीन, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका में भी हिन्दी को वैश्विक दर्जा दिलाने वाले कार्यक्रम हो रहे हैं, जो भारत के लिए गौरव की बात है। भारत की भाषा का यह सम्मान विदेश में भारतीयों के महत्व को दिखाता है।

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