Wed. Feb 19th, 2020

जेएनयूए, शाहीन बाग और कश्मीर के संबंधों को समझिए

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“जब जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होते जा रहे हैं, तब आइशी घोष का इस तरह का बेहद आपत्तिजनक बयान का आना घोर निंदनीय है। गौर करें कि वो कश्मीर के मसले को मुस्लिम बहुल शाहीन बाग में उठा रही हैं। यह सब करते हुए वो साबित क्या करना चाहती हैं? क्या वह मुस्लिम समाज को भड़का नहीं रही हैं? इस बात का भी खुलासा हो ही जाना चाहिए।”

“प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ गृहमंत्री अमित शाह भी बार-बार कह रहे हैं कि नागरिकता संशोधन कानून से मुसलमानों पर कोई असर नहीं होगा। पर उन्हें भड़काया जा रहा है। यह देश में अशांति पैदा करने का षड्यंत्र है। ऐसा ही षड्यंत्र 1947 में हुआ था, जब धर्म के नाम पर देश को तोड़ डाला गया था। देश में एकबार फिर से धर्मनिरपेक्षता, मानवतावाद, रोहिंग्यावाद और सहिष्णुतावाद जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं।”

आर.के. सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष राजधानी के शाहीन बाग में जाकर कहती हैं कि कश्मीर को अलग करते हुए हम आंदोलन नहीं जीत सकते। शाहीन बाग में तथाकथित स्थानीय लोग नागरिकता संशोधन कानून 2019 के खिलाफ धरना दे रहे हैं। बताया तो यह भी जाता है कि दिहाड़ी मजदूरों को दुगना-तिगुना पैसा देकर उन्हें बिठाया जा रहा है। फूड पैकेट अलग से। खैर, किसी को भी धरना देने का तो अधिकार है पर कोई धरना देने वालों को गुमराह करे तो क्या किया जाए।

शाहीन बाग में घोष आकर कहती हैं कि जो लड़ाई चल रही है, उसमें हम कश्मीर को पीछे नहीं छोड़ सकते। कश्मीर से ही संविधान में छेड़छाड़ शुरू हुई है। साफ है कि उनका इशारा जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35-ए हटाने की ओर था। कश्मीर के लिए बने इस अनुच्छेद के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा का लाभ मिलता था, जिसे केंद्र ने 5 अगस्त 2019 को समाप्त कर दिया। सरकार के इस कदम का सारे देश ने तहे दिल से स्वागत किया।

हां, इसके विरोध में कुछ मुट्ठी भर आईशी घोष जैसे कुछ वामपंथी और छद्म धर्मनिरपेक्षता वादी तत्व भी थे। इस कदम से केंद्र सरकार ने जम्मू और कश्मीर के पूर्ण राज्य के दर्जे को भी खत्म कर दिया और जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। केंद्र ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश के तौर पर विभाजित भी कर दिया। क्या आइशी घोष को इस तथ्य की जानकारी नहीं कि जम्मू-कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 और 35-ए को संसद के दोनों सदनों में अभूतपूर्व बहुमत से हटाया गया था। इस मसले पर राज्यसभा और लोकसभा में लंबी बहस भी हुई थी।

बेहद आपत्तिजनक बयान

जब जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होते जा रहे हैं, तब आइशी घोष का इस तरह का बेहद आपत्तिजनक बयान का आना घोर निंदनीय है। गौर करें कि वो कश्मीर के मसले को मुस्लिम बहुल शाहीन बाग में उठा रही हैं। यह सब करते हुए वो साबित क्या करना चाहती हैं? क्या वह मुस्लिम समाज को भड़का नहीं रही हैं? इस बात का भी खुलासा हो ही जाना चाहिए।

आइशी घोष 5 जनवरी को जेएनयू कैंपस में हमले के बाद से ही चर्चा में हैं। उनपर भी पुलिस ने विभिन्न धाराओं के अंतर्गत केस दर्ज किए हैं। आइशी और उनके आका नागरिकता संशोधन कानून 2019 से लेकर जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने के मसले पर देश को भ्रम की हालत में रखकर साम्प्रदायिक उन्माद पैदा करना चाहते हैं। ये मुसलमानों को भड़का रहे हैं। जबकि यह कानून नागरिकता छीनने के लिए है ही नहीं। यह तो पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने के लिये है।

नरेन्द्र मोदी भी स्पष्ट कह चुके हैं कि देश के मुसलमानों का नागरिकता संशोधन कानून से कोई लेना-देना ही नहीं है। इसके बावजूद आइशी घोष जैसे तत्व शाहीन बाग में जाकर माहौल को विषाक्त कर रहे हैं। क्या इन्होंने वहां जाकर यह भी पूछा कि शाहीन बाग में चल रहे धरने का भारी-भरकम खर्चा कौन उठा रहा है? घोष और उससे पहले जेएनयू के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार तो एक तरफ जेएनयू में फीस को कम करने के लिये आन्दोलन कर रहे हैं, दूसरी तरफ वे कश्मीर से लेकर नागरिकता संशोधन कानून पर भी अनाप-शनाप बोलते हैं। इस कानून के बहाने देश में अस्थिरता पैदा करने की चेष्टा हो रही है। सरकार के फैसलों में मीन-मेख निकालने वाले कन्हैया और आइशी घोष ने तब एक शब्द भी नहीं बोला था जब उपद्रवी इन कानूनों के खिलाफ अपना विरोध जताने के लिए सरकारी संपत्तियों को तोड़ रहे थे।

अशांति पैदा करने का षडयंत्र

रोहिंग्या पर रोने वाले लोगों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों पर रोना क्यों नहीं आता? पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों पर पिछले सात दशकों से हो रहे बर्बर अत्याचार के खिलाफ मुसलमानों की तरफ से एक आवाज नहीं उठी। आज जब उन देशों के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने की बात उठी तो रोने लगे। इन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों के बारे आंसू नहीं बहाए।

प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ गृहमंत्री अमित शाह भी बार-बार कह रहे हैं कि नागरिकता संशोधन कानून से मुसलमानों पर कोई असर नहीं होगा। पर उन्हें भड़काया जा रहा है। यह देश में अशांति पैदा करने का षड्यंत्र है। ऐसा ही षड्यंत्र 1947 में हुआ था, जब धर्म के नाम पर देश को तोड़ डाला गया था। देश में एकबार फिर से धर्मनिरपेक्षता, मानवतावाद, रोहिंग्यावाद और सहिष्णुतावाद जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं।

जो संगठन और नेता जहां-जहां खुद को थोड़ा मजबूत समझते हैं, वहां-वहां हिंसा भड़का रहे हैं। नागरिकता संशोधन कानून के मसले पर राजधानी दिल्ली में कांग्रेस के नेता मतीन अहमद और आम आदमी पार्टी के ओखला से विधानसभा उम्मीदवार अमानतउल्ला खान आमने-सामने हैं। बीते दिनों जब खान अचानक मतीन अहमद के पूर्वी दिल्ली स्थित क्षेत्र में पहुंचकर मुसलमान औरतों को नागरिकता संशोधन कानून के संबंध में ज्ञान दे रहे थे, तब मतीन समर्थकों से उनकी झड़प भी हुई।

कश्मीरी पंड़ितों का ख्याल नहीं आता पर आजकल आंदोलन करने वालों को कश्मीरी पंड़ितों के लिए संविधान की धारा-14 का औचित्य कभी नहीं समझ में आया। कश्मीरी पंडितों को सरेआम काटते, पीटते और कश्मीरी महिलाओं के साथ सरेआम बलात्कार करते समय बेशर्म-जमातों को यह ख्याल नहीं रहा था कि कश्मीरी पंडितों, सिखों, बौद्धों और वहां के अन्य अल्पसंख्यकों के भी समानता के अधिकार हैं। उनकी सम्पत्तियों पर कब्जा करके और उन्हें अपनी ही जमीन से भगाने वाली जमातें क्या संविधानवादी थीं, धर्मनिरपेक्ष थीं, मानवतावादी थीं, सहिष्णुतावादी थीं और प्रगतिशील थीं?

देश यह भी देख रहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी की बातें करने वालों को अलग राय रखने वालों से परहेज है। दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम बुखारी ने नागरिकता संशोधनद्ध अधिनियम-2019 के समर्थन में अलग राय क्या रख दी कि सब उनके पीछे पड़ गए। यह तो इस देश में नहीं चलेगा। अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रवचन देने वाले बोलें कि वे शाही इमाम के पक्ष में क्यों नहीं खड़े हो रहे हैं? क्या उन्हें अपना पक्ष रखने का अधिकार नहीं है?

(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं।)

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