Wed. May 27th, 2020

नकल से गुलजार साहित्य का संसार

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“साहित्यिक चोरियों की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि इसका परिणाम कुछ नहीं निकलता। न तो साहित्यकार की छवि धूमिल होती है ना लेखक पर इसका कोई असर होता है। देश की भोली जनता ने तो माफ करना सीख ही लिया है-चाहे राजनीति में की गयी चोरियां हों या साहित्य में। यही वजह है कि चोरियों से गुलजार रहता है साहित्य का संसार।”

“जिनकी कविताएं पढ़ और सुनकर आप बड़े हुए हों, जिनकी कविताओं को आपने हर आंदोलन की एक सिग्नेचर ट्यून की तरह सुना हो, जिनकी कविताएं सुनकर आपके जिस्म का लहू उबाल भरने लगे, जिनके शब्दों में आपको हर समय क्रांति के सुर सुनाई पड़ते हों यदि ऐसे कवि के विषय में आपको कभी यह सुनना पड़े कि उनकी कोई कविता किसी अन्य कवि की प्रतिलिपि है तो आप सदमे की स्थिति में आ जाते हैं। पलभर को आपको यकीन ही नहीं होता। पिछले दिनों अवतार सिंह ‘पाश’ की एक कविता के विषय में यही तथ्य सामने आए। सोशल मीडिया पर मालिनी गौतम ने अपनी एक पोस्ट पर पाश की एक कविता ‘घास’ को पोस्ट किया। इसी के समानांतर उन्होंने अमेरिकन कवि कार्ल सैंडबर्ग की एक कविता ‘ग्रास’ भी पोस्ट की।”

सुधांशु गुप्त

कविताओं में गजब का साम्य

दोनों कविताओं में गजब का साम्य है। सिर्फ साम्य ही नहीं है बल्कि यह साफ दिखाई पड़ रहा है कि पाश की कविता का मूल विचार कार्ल सैंडबर्ग की कविता से ही लिया गया है। पाश का जन्म 1950 में हुआ और सैंडबर्ग की मृत्यु उस समय हुई जब पाश की उम्र महज 17 साल की थी। तब क्या यह कविता पाश ने चोरी की।

दो साल पहले भी इसी कविता को लेकर विवाद हुआ था। इंडियन एक्सप्रेस के एक लेख में निरुपमा सुब्रमण्यम ने पाश के दोस्त और कवि चंदन के हवाले से कहा था कि पाश पर साहित्यिक चोरी का इल्जाम सही नहीं है।

यह भी कहा गया कि पाश ने इस कविता का अनुवाद किया था,जिसे उनके मित्रों ने उन्हीं के नाम से छाप दिया। लेकिन अगर ऐसा होता तो पाश इस कविता में आए स्थान का नाम पंजाब के नाम पर क्यों रखते। अंग्रेजी कविता की कुछ पक्तियां हैं- ज्ूव लमंतेए जमद

जबकि पाश की कविता कहती है, दो साल… दस साल बाद सवारियां फिर किसी कंडक्टैर से पूछेंगी, यह कौन-सी जगह है…मुझे बरनाला उतार देना, जहां हरे घास का जंगल है.. यह संयोग नहीं हो सकता। न ही इसे पाश द्वारा किया गया अनुवाद कहा जा सकता है।

भारतीय समाज की एक अच्छी बात है कि वह अपने नायकों की किसी भी कमी को अपने जेहन में नहीं रहने देती। वह जल्दी ही उनकी गलतियों को क्षमा कर देती है। पाश की एक अन्य कविता ‘सबसे खतरनाक होता’ पर भी यह आरोप लगे थे कि इस कविता की कुछ पंक्तियां रूसी कवि कुल्चीत्स्के की एक कविता से ली गयी हैं।

गुलजार पर भी इल्जाम

बहरहाल साहित्य में यह आरोप झेलने वाले पाश अकेले कवि नहीं हैं। गुलजार बॉलीवुड के एक लोकप्रिय गीतकार ही नहीं हैं, साहित्यिक हल्कों में भी उनका खूब नाम है। इस नाम के साथ ही उन पर चोरी के भी कई इल्जाम लगे हैं। ग्रीस में जन्मे पूरी दुनिया में प्रसिद्ध कवि नाजिम हिकमत की कविताएं भी युवाओं के लिए किसी संविधान से कम नहीं हैं।

नाजिम हिकमत की मृत्यु 1963 में हुई थी। उनकी एक कविता है ‘मेरा जनाजा’। इसमें कवि इस बात की चिंता कर रहा है कि उनका जनाजा तीसरी मंजिल से कैसे उतरेगा। वह लिखते हैं, मेरा जनाजा क्या मेरे आंगन से उठेगा, तीसरे मंजिल से कैसे उतारोगे, ताबूत अटेगा नहीं लिफ्ट में, और सीढ़ियां निहायत संकरी हैं।

गुलजार ने इस कविता को लगभग हूबहू अपनी कविता बना दिया। उन्होंने तीसरे मंजिल को कुछ और ऊपर पहुंचा दिया। उन्होंने लिखा, ‘मैं नीचे चल के रहता हूं, जमीं के पास रहने दो मुझे, घर से उठाने में बड़ी आसानी होगी, बहुत ही तंग हैं ये सीढ़ियां और 11वीं मंजिल, दबाव पानी का भी 5वीं मंजिल तक मुश्किल से जाता है, मुझे तुम लिफ्ट से लटका के नीचे लाओगे, यह सोच के अच्छा नहीं लगता, मैं नीचे चलके रहता हूं।’

गुलजार ने इस कविता में शहरी चालाकियों के साथ बदलाव किए हैं। लेकिन इसके बावजूद यह साफ दिखाई पड़ रहा है कि इस कविता का मूल नाजिम हिकमत की कविता ही है। साहित्य के संसार में चोरियों की परंपरा बहुत पुरानी है। आश्चर्य की बात है कि अज्ञेय और भीष्म साहनी तक पर ये आरोप लगे हैं, लगाए जा सकते हैं।

अज्ञेय के बहुत लोकप्रिय उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ के विषय में कहा जाता है कि इसमें जिस द्वीप की कल्पना की गयी है, जिसमें नायक नायिका नग्न रहते हैं, वह वास्तव में ओ नील के नाटक ‘अभिशप्त’ से ली गयी थी।

भीष्म साहनी हिंदी के एक बड़े लेखक हैं। उनकी एक कहानी ‘कंठहार’ मोपासां की कहानी ‘नेकलैस’ से हूबहू मिलती-जुलती है। केवल इसमें परिवेश और किरदारों के नाम बदल दिए गये हैं

। युवा लेखिका रजनी मोरवाल पर भी युवा लेखक सुशोभित ने पिछले दिनों चोरी का आरोप लगाया था। बेंगलुरु की एक लेखिका अनविता वाजपेयी ने भी चेतन भगत पर यह आरोप लगाया था कि भगत ने वन इंडियन गर्ल में उनकी लिखी पुस्तक लाइफ, ओड्स एंड एंड्स के किरदारों, स्थानों और भावनाओं की नकल की है। (इरि)

पिछली सदी के 70 और 80 के दशक में विदेशी साहित्य में हिन्दी में बहुत ज्यादा उपलब्ध नहीं था। लोग अंग्रेजी भी कम ही जानते थे। इसलिए चोरी करना थोड़ा आसान होता था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज विदेशी साहित्य भरपूर मात्रा में हिन्दी में, नेट पर उपलब्ध है।

अधिकांश लोग इसे पढ़ते भी हैं। साहित्यिक चोरी आज आसान नहीं रह गया है। बावजूद इसके चोरियां बढ़ रही हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह हो सकती है कि लेखकों को तुरंत लोकप्रयिता की दरकार होती है चाहे इसके लिए कुछ भी किया जाए। जो आसान काम उन्हें दिखाई पड़ता है, वह चोरी ही है।

लेकिन साहित्यिक चोरियों की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि इसका परिणाम कुछ नहीं निकलता। न तो साहित्यकार की छवि धूमिल होती है ना लेखक पर इसका कोई असर होता है। देश की भोली जनता ने तो माफ करना सीख ही लिया है-चाहे राजनीति में की गयी चोरियां हों या साहित्य में। यही वजह है कि चोरियों से गुलजार रहता है साहित्य का संसार।

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