Wed. Oct 21st, 2020

मोदी की जीत के मायने

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“मोदी ने एक बड़ी लाइन खींची है जिसकी जरूरत सामाजिक न्याय की राजनीति की सार्थक तार्किक परिणति के लिए थी। इसी के चलते राष्ट्रीय गौरव के नाम पर अस्मिता की राजनीति को तिलांजलि देकर सभी उनके पक्ष में खड़े हो गये।”
के. पी. सिंह 28.05.2019

राजनीति का एक सूत्र वाक्य है जनता कभी गलत नहीं होती। व्यक्तिगत तौर पर लोग गलत और मूल्यहीन हो सकते हैं लेकिन लोगों का सामूहिक विवेक और निर्णय मूल्य पक्षधरता को व्यक्त करता है। निश्चित रूप से चार्वाकवादी इस युग में मौलिक आध्यात्मिक भावनाएं लोगों के अंदर घुटकर मर चुकी हैं। जिनका संबंध संयम और त्याग जैसे मूल्यों से है। इसके बावजूद लालच और स्वार्थ की पराकाष्ठा के इस युग में भी सामूहिक फैसले बड़ी सोच के अनुरूप ही हो रहे हैं। लोकतंत्र सामूहिक फैसले पर आधारित व्यवस्था है। इसलिए सर्वोत्तम है।

अकल्पनीय जनादेश

2019 का जनादेश अकल्पनीय है। लेकिन यह सत्य है कि उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में जहां गठबंधन बनने के बाद पिछड़ा और दलित वोट बैंक के विपरीत दिशा में ध्रुवीकरण के अनुमान लगाये जा रहे थे, हमने मतदान के समय देखा तो स्थितियां उल्टी मिलीं। जातियों के थोक के थोक हमें भाजपा की ओर जाते दिखाई दिये। लेकिन भाजपा को 50 प्रतिशत से ज्यादा मतदाताओं का समर्थन मिलेगा यह किसी भी अंदाज से परे था। मोदी की ब्रांडिंग और अमित शाह के मैनेजमेंट को इसका श्रेय देकर पल्ला झाड़ लेना अन्याय होगा। यह बात जब कही जाती है तो ध्वनित यह होता है कि लोगों को भुलावे में डालकर उनका समर्थन ले लिया गया है। लेकिन यह नहीं भूला जाना चाहिए कि ब्रांडिंग और मैनेजमेंट तब फलित होता है जब लोगों में उसी दिशा में जाने की स्वत: स्फूर्त इच्छा हो।

वर्ण व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति से जो नेतृत्व उपजा उसने किसी नैतिकता से यहां तक कि लोकतंत्र से भी कोई सरोकार नहीं रखा। जिन लोगों ने उम्मीद की थी कि वर्ण व्यवस्था बेअसर होने से अधिक मानवीय और नैतिक व्यवस्था कायम होगी वे सामाजिक न्याय की राजनीति के नेताओं के निरंकुश आचरण से हतप्रभ थे। अराजकता की घनघोर बियावान इनके चलते लोकतंत्र में अंधेरे की तरह पसर गया था।

लेकिन ये नेता किसी भी लोकलाज से बेफिक्र रहे क्योंकि उन्होंने अपनी समर्थक पूरी जमात की सोच को हठधर्मिता में तब्दील कर दिया था। हाल-फिलहाल अस्मिता की राजनीति से देश ऊपर हो सकता है, इसकी कल्पना असंभव हो गयी थी। बहरहाल, मोदी ने एक बड़ी लाइन खींची है जिसकी जरूरत सामाजिक न्याय की राजनीति की सार्थक तार्किक परिणति के लिए थी। इसी के चलते यह संभव हुआ कि राष्ट्रीय गौरव के नाम पर अस्मिता की राजनीति को तिलांजलि देकर सभी उनके पक्ष में खड़े हो गये। सवाल मोदी का नहीं लेकिन यह प्रवृत्ति देश, समाज और लोकतंत्र के हित में है। दरअसल सामाजिक न्याय एक प्रक्रिया है, साधन है, साध्य नहीं। साध्य तो इससे कहीं व्यापक है। मोदी की जीत भारतीय राजनीति में गुणात्मक परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु साबित हो सकती है।

समालोचना भी जरूरी

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को जब लोगों ने दिल खोलकर सिर पर बैठाया था, तब भी एक नये आगाज की उम्मीद संजोयी गयी थी। लेकिन केजरीवाल इसका निर्वाह नहीं कर पाये। सवाल यह है कि क्या मोदी अब इसका निर्वाह कर पाएंगे? वक्त बताएगा। आज के दिन इसका विवेचन ‘बर्रे के छत्ते’ में हाथ डालने का जोखिम मोल लेने के बराबर है। लेकिन लोकतंत्र बिना समालोचना के नहीं चल सकता। उम्मीदवारी से लेकर सरकार में रखे जाने वाले चेहरों के चयन तक में जिस जवाबदेही का परिचय देने की जरूरत है, अभी उसके मुताबिक काम नहीं किया गया है। कई ऐसे सांसदों को रिपीट कर दिया गया, लोग जिनके पूरी तरह खिलाफ थे। सांसद, विधायक बनने का अवसर भी उनको दिया जाना चाहिए जिनमें खुद भी लोगों के लिए कुछ करने का जज्बा हो।

नरेंद्र मोदी विपक्षी खेमे में कारपोरेट के प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित हैं। लेकिन यह भी सही है कि गुजरात में तीन बार मुख्यमंत्री रहने और प्रधानमंत्री के रूप में एक कार्यकाल पूरा कर लेने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने कहीं कोई न तो खुद संपत्ति बनायी न ही अपने परिवार को बनाने दी। इससे इन आरोपों की अचूक काट होती रही। अपनी इस मिसाल को व्यापक नैतिक पुनरुत्थान के अभियान का हिस्सा बनाने के लिए उन्हें अपने सांसदों और विधायकों के भ्रष्ट आचरण को लेकर भी सख्ती दिखानी होगी जिसे लेकर बेशक अभी तक बेपरवाही बरती गयी है।

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