Sun. Aug 9th, 2020

खुद को पढ़ाकू दिखाने का पाखंडी दौर

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सुधांशु गुप्त

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया(फेसबुक) पर एक दिलचस्प चुनौतियों का दौर चल रहा है। इसमें एक व्यक्ति अपनी पसंद की किताब का कवर शेयर करता है। यही व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति को किसी पुस्तक का कवर शेयर करने के लिए नामित करता है। इसी तरह कई पुस्तकों के कवर सामने आ जाते हैं।

इस चुनौती से दो चीजें सामने आती हैं। पहली यह कि किस तरह की किताबों का प्रचलन आज भी समाज में बना हुआ है यानी कौन-सी किताबें हैं, जो समाज में अपनी पैठ सालों बीत जाने के बाद भी बनाए हुए हैं। दूसरी, किताबों के आवरण से हम कुछ हद तक इस बात का भी अंदाजा लगा सकते हैं कि आवरण शेयर करने वाला व्यक्ति किस मिजाज का है या होगा।

इस दिलचस्प चुनौती को देखते समझते हुए मुझे बर्बस ही गुजरी सदी का नवां दशक याद आ गया। वैश्वीकरण से पहले का यह वह दौर था, जब रूस प्रेम भारतीय जनमानस या बुद्धिजीवियों को बेपनाह प्रभावित किए था। शायद यही वजह थी कि रूसी लेखक भारतीय पाठकों के बीच लोकप्रिय थे।

पीपल्स पब्लिशिंग हाउस से छपने वाले रूसी साहित्य और दर्शन की किताबें न केवल सुंदर व आकर्षक होते थे, बल्कि सस्ते भी होते थै। युवाओं के हाथ में अक्सर दोस्तोव्स्की, तॉलस्तॉय, गोर्की, चेखव, शोलोखोव, तुर्गनेव, बाल्जाक और अन्य लेखकों की किताबें दिखाई पड़ जाती थीं।

ऐसा नहीं है कि अन्य लेखकों (हिन्दी के) की किताबों से युवाओं का कोई बैर था। अज्ञेय, यशपाल, कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की लिखी पुस्तकें भी युवाओं के हाथों में देखी जा सकती थीं। ये किताबें हाथों के बारे में कुछ निश्चित संकेत करती थीं।

पीपीएच की किताबों से पता चलता था कि इन्हें थामने वाले हाथ कहीं न कहीं वाम विचारधारा से प्रभावित होंगे। अन्य लेखकों की किताबें यह बताती थीं कि इन्हें पढ़ने वाले की रुचि साहित्य में है। आमतौर पर यही माना जाता है कि किताबें हमारे लिए दुनिया के द्वार खोलती हैं, ज्ञान, सूचनाएं, दर्शन, विचार, इतिहास, संस्कृति से हमारा परिचय कराती हैं।

आप जितना अधिक किताबें पढ़ेंगे आपके सामने दुनिया उतनी ही अधिक खुलती जाएगी, लेकिन किताबों की भूमिका यहीं तक सीमित नहीं होती। हमें लगता है हम ही किताबों को जानते हैं। लेकिन वास्तव में किताबें भी आपको जानती हैं। वे जानती हैं कि किस हाथ जाना है।

जिस तरह आप किताब को चुनते हैं, उसी तरह किताब भी आपको चुनती है। कई बार आपने देखा और महसूस किया होगा कि किसी किताब को पढ़ने से आप लगातार बच रहे हैं, लेकिन फिर ऐसी स्थितियां बनती हैं कि आप उसे पढ़ने लगते हैं।

ऐसी ही एक किताब है एडोल्फ हिटलर की आत्मकथा। इस किताब को न जाने मैं कब से पढ़ने की सोच रहा था। लेकिन नहीं पढ़ पाया। 2014 के आसपास फिर इस किताब को पढ़ने की इच्छा तीव्र हुई। बड़ी सहजता से यह किताब पढ़ी गई। ऐसी और भी कितनी ही किताबें आप पाएंगे, जिनके पढ़ने का संयोग अचानक बन जाता है यानी किताब भी अपना पाठक स्वयं चुन लेती है।

पिछले दिनों परिवार में ही रिश्ते के एक भाई अचानक नाथूराम गोडसे लिखित ‘गांधी वध’ देखकर उत्साही हो उठे। उन्होंने वह किताब मांगी और ले गए। दो दिन बाद ही उनका फोन आ गया कि उन्होंने यह किताब पढ़ ली है और उन्हें इस बात का अफसोस है कि इस किताब को उन्होंने अब तक क्यों नहीं पढ़ा।

उनका यह वाक्य उनकी बदलती सोच को दर्शाता है। मूल बात यही है कि किताबें दुनिया से हमारा परिचय ही नहीं कराती, बल्कि दुनिया को हमारा परिचय भी बताती हैं। जितना हम किताबों के बारे में जानते हैं, उससे कहीं ज्यादा किताबें हमारे बारे में जानती हैं। नब्बे के दशक तक और उसके बाद के कुछ सालों तक यह स्थिति बनी रही कि आप किसी के हाथ में किताबें देखकर यह अंदाजा लगा सकते थे कि यह व्यक्ति किस सोच का होगा। लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया के जमाने में यह काम थोड़ा कठिन हो गया है।

फेसबुक पर जिन किताबों के कवर शेयर किए जाते हैं, उनमें से अधिकांश किताबें बेहद लोकप्रिय और चर्चित होती हैं। मिसाल के तौरपर धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’, मोहन राकेश का नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’, उदय प्रकाश की ‘पीली छतरी वाली लड़की’ काशीनाथ सिंह की ‘रेहन पर रघू’, तुर्गनेव की ‘पहला प्यार’, कुप्रिन की ‘अन्ना का कोठा’… या इसी तरह और भी किताबें हो सकती हैं।

जिन किताबों के कवर शेयर किए जाते हैं वे निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ किताबें ही होती हैं। लेकिन इन आवरणों को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि इन्हें शेयर करने वाला व्यक्ति किस सोच का है। क्या वह सचमुच इन किताबों को पढ़ता भी है? फ्यूजन के इस दौर में किताबों को लेकर भी एक फ्यूजन है।

एक दिन कोई एक विचारधारा से प्रभावित किताब का आवरण शेयर करता है तो दूसरे दिन वही दक्षिणपंथी सोच की किताब का आवरण निस्संकोच शेयर कर देता है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है, आखिर कोई एक ही तरह की किताबें क्यों पढ़े? बेशक कुछ बेहद अच्छी और चर्चित किताबें भी इस दौरान सतह पर दिखाई देने लगती हैं।

गंभीर और विषय के जानकार इस पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखकर इसे पोस्ट करते हैं। कर्मेंदु शिशिर की ‘भारतीय मुसलमान : इतिहास का संदर्भ’ दो खंड, ऐसी ही किताब है। इस तरह की किताबों पर लिखने के कारण किताबों से बाहर की दुनिया में आसानी से तलाशे जा सकते हैं ।

लेकिन आवरण तलाशने की नई चुनौती को स्वीकारने वाला वास्तव में किताब का कवर शेयर करते समय इस बात का ध्यान रखता है कि किसी बड़े लेखक की ही किसी चर्चित किताब का कवर शेयर किया जाए ताकि देखने वालों को लगे कि वह कितना पढ़ा-लिखा और जानकार है।

यह एक स्वाभाविक-सी बात है। एक बार मुझे भी यह करने को कह गया तो मैंने सारी दुनिया कि किताबों को छोड़कर काफ्का के उपन्यास मुकदमा (ट्रायल) का कवर शेयर किया। जबकि उस वक्त भी मेरे घर में बेपनाह किताबें मौजूद थीं। लेकिन मेरा चयन न जाने क्यों काफ्का पर रुका। इसकी वजह ये भी हो सकती है कि मैं काफ्का को पढ़ता हूं, पसंद करता हूं। लेकिन सच यही है कि किताबें हर हाल में आपको जानती हैं और आपका परिचय दुनिया को दे ही देती हैं। (-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर)
 (लेखक कहानीकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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