April 23, 2021

Desh Pran

Hindi Daily

सुखदा मणि

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एक संत सदा प्रसन्न रहते थे। चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, वह दुखी नहीं होते थे। वह हर बात पर ठहाके लगते रहते, कुछ चोरो को यह बात अजीब सी लगाती थी। वह समझ नही पते थे कि कोई व्यक्ति हर समय इतना खुश कैसे रह सकता है। चोरों ने यह सोच कर की संत के पास अपार धन होगा, उनका अपहरण कर लिया। वे उन्हें दूर जंगल में ले गए और बोले, ‘सुना है संत कि तुम्हारे पास काफी धन है, तभी इतने प्रसन्न रहते हो, सारा धन हमारे हवाले कर दो। अगर तुम अपना धन हमारे हवाले नहीं करोगे तो हम तुम्हें इसी जंगल में मौत के घाट उतार देंगे।

संत ने एक-एक कर हर चोर को अलग-अलग बुलाया और कहा ‘मेरे पास बेशकीमकी सुखदा मणि है, मगर मैंने उसे तुम चोरो के डर से जमीन में गाड़ दिया है, यहां से कुछ दूर पर वह स्थान है, अपनी खोपड़ी के नीचे चन्द्रमा की छाया में खोदना, शायद मिल जाए’, यह कहकर संत एक पेड़ के नीचे सो गए, सभी चोर अलग-अलग दिशा में जाकर जमीन खोदने लगे, जरा सा सिर उठते चलते तो उनकी छाया भी हिल जाती और उन्हें जहां-तहां खुदाई करनी पड़ती।

खुदाई का क्रम देर रात तक चलता रहा। रात भर में सैकड़ो छोटे-बड़े गढ्ढे बन गये पर कही भी मणि का पता नही चला, चोर हताश होकर लौट आये और संत को बुरा-भला कहने लगे। संत अपने स्वाभाव के अनुसार हंस कर बोले ‘मूर्खो मेरे कहने का अर्थ समझो, खोपड़ी तले सुखदा मणि छिपी हैअर्थात श्रेष्ट विचारों के कारण मनुष्य प्रसन्न रह सकता है, तुम सब भी अपना-अपना दृष्टिकोण बदलो और जीना सीखो।’ चोरो को यथार्थ का बोध हुआ, वे समझ गये कि चोरी करने और पैसे जमा करने से खुशी नहीं मिल सकती। वे अपनी आदतें सुधार कर प्रसन्न रहने की कला सीखने लगे।

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