Wed. Dec 11th, 2019

सख्त, सही टीएन शेषन

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“शेषन ने अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल गुलशेर अहमद और बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव किसी को नहीं ब़ख्शा। उन्होंने बिहार में पहली बार चार चरणों में चुनाव करवाया और चारों बार चुनाव की तारीखें बदली गयी। ये बिहार के इतिहास का सबसे लंबा चुनाव था।”

रेहान फजल

दिसंबर 1990 की एक ठंडी रात। करीब एक बजे केंद्रीय वाणिज्य मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की सफेद एम्बैसडर कार नयी दिल्ली के पंडारा रोड के एक सरकारी घर के पोर्टिको में रुकी। ये घर उस समय योजना आयोग के सदस्य टीएन शेषन का था। स्वामी बहुत बेतकल्लुफी से शेषन के घर में घुसे। वजह ये थी की साठ के दशक में स्वामी शेषन को हारवर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके थे।

उस दिन स्वामी शेषन के यहां इतनी देर रात प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दूत के तौर पर वहां पहुंचे थे और आते ही उन्होंने उनका संदेश दिया था- ‘क्या आप भारत का अगला मुख्य चुनाव आयुक्त बनना पसंद करेंगे?’ शेषन इस प्रस्ताव से बहुत अधिक उत्साहित नहीं हुए, क्योंकि एक दिन पहले ही कैबिनेट सचिव विनोद पांडे ने भी उन्हें ये प्रस्ताव दिया था।

और तब शेषन ने विनोद को टाल दिया था। लेकिन जब स्वामी दो घंटे तक उन्हें ये पद स्वीकार करने के लिए मनाते रहे तो शेषन ने उनसे कहा कि वो कुछ लोगों से परामर्श करने के बाद अपनी स्वीकृति देंगे।

टीएन शेषन की जीवनी ‘शेषन-एन इंटिमेट स्टोरी’ लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार के गोविंदन कुट्टी बताते हैं, ‘स्वामी के जाने के बाद शेषन ने राजीव गांधी को फोन मिला कर कहा कि वो तुरंत उनसे मिलने आना चाहते हैं। जब वो उनके यहां पहुंचे तो राजीव गांधी अपने ड्रॉइंग रूम में थोड़ी उत्सुकता के साथ उनका इंतजार कर रहे थे।’

‘शेषन ने उनसे सिर्फ पांच मिनट का समय लिया था, लेकिन बहुत जल्दी ही ये समय बीत गया। राजीव ने जोर से आवाज लगायी ‘फैट मैन इज हियर, क्या आप हमारे लिए कुछ चॉकलेट्स भिजवा सकते हैं?’ चॉकलेट्स शेषन और राजीव दोनों की कमजोरी थी।’

‘दाढ़ी वाला खुद को कोसेगा’

‘थोड़ी देर बाद राजीव गांधी ने शेषन को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद स्वीकार करने के लिए अपनी सहमति दे दी, लेकिन वो इससे बहुत खुश नहीं थे। जब वो शेषन को दरवाजे तक छोड़ने आए तो उन्होंने उन्हें छेड़ते हुए कहा कि वो दाढ़ी वाला श़ख्स उस दिन को कोसेगा, जिस दिन उसने तुम्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने का फैसला किया था।’

दाढ़ी वाले श़ख्स से राजीव गांधी का मतलब चंद्रशेखर से था। टीएन शेषन के राजीव गांधी के करीब आने की भी एक दिलचस्प कहानी है। वो पहले वन और फिर पर्यावरण मंत्रालय में सचिव थे। वहां उन्होंने इतना अच्छा काम किया कि राजीव गांधी ने उन्हें आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय के अंतर्गत सुरक्षा सचिव बना दिया।

के. गोविंदन कुट्टी बताते हैं- ‘सुरक्षा सचिव के रूप में शेषन सचिव से कहीं बड़ा काम करने लगे। वो खुद सुरक्षा विशेषज्ञ बन गए। एक बार उन्होंने राजीव गांधी के मुंह से ये कहते हुए बिस्किट खींच लिया कि प्रधानमंत्री को वो कोई चीज नहीं खानी चाहिए, जिसका पहले परीक्षण न किया गया हो।’

एक बार उनके सामने सवाल उठाया गया कि अगर आप ड्राइविंग और बस के इंजन की जानकारी नहीं रखते तो ड्राइवरों की समस्याओं को किस तरह हल करेंगे? शेषन ने इसको चुनौती के तौर पर लिया और कुछ ही दिनों में वो न सिर्फ़ बस की ड्राइविंग करने लगे बल्कि बस के इंजन को खोल कर उसे दोबारा फिट करना भी उन्होंने सीख लिया। एक बार वो यात्रियों से भरी बस को खुद चला कर 80 किलोमीटर तक ले गए।

मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के पहले ही दिन उन्होंने अपने से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त रहे पेरी शास्त्री के कमरे से सभी देवी देवताओं की मूर्तियां और कैलंडर हटवा दिए। ये तब था जब शेषन खुद बहुत धार्मिक व्यक्ति थे। उनकी आजाद प्रवृत्ति का सबसे पहला नमूना तब मिला जब उन्होंने राजीव गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन सरकार से बिना पूछे लोकसभा चुनाव स्थगित करा दिए।

चुनाव आयोग सरकार का हिस्सा नहीं

एक बार उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था-‘ उन दिनों चुनाव आयोग के साथ सरकार एक पिछलग्गू जैसा व्यवहार करती थी। मुझे याद है कि जब मैं कैबिनेट सचिव था तो प्रधानमंत्री ने मुझे बुला कर कहा कि मैं चुनाव आयोग को बता दूं कि मैं फलां-फलां दिन चुनाव करवाना चाहता हूं। मैंने उनसे कहा, हम ऐसा नहीं कर सकते। हम चुनाव आयोग को सिर्फ ये बता सकते हैं कि सरकार चुनाव के लिए तैयार है।’

‘मुझे याद है कि मुझसे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त, कानून मंत्री के द़फ्तर के बाहर बैठ कर इंतजार किया करता था कि उसे कब अंदर बुलाया जाए। मैंने तय किया कि मैं कभी ऐसा नहीं करूंगा। हमारे द़फ्तर में पहले सभी लिफाफों पर लिख कर आता था, चुनाव आयोग, भारत सरकार। मैंने उन्हें साफ कर दिया कि मैं भारत सरकार का हिस्सा नहीं हू।’

बड़े अफसरों से सीधा टकराव

साल 1992 के शुरू से ही शेषन ने सरकारी अफसरों को उनकी गलतियों के लिए लताड़ना शुरू कर दिया था। उसमें केंद्र के सचिव और राज्यों के मुख्य सचिव भी शामिल थे। एक बार शहरी विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव के धर्मराजन को त्रिपुरा में हो रहे चुनावों का पर्यवेक्षक बनाया गया। लेकिन वो अगरतला जाने के बजाय एक सरकारी काम पर थाइलैंड चले गए।

शेषन ने तुरंत आदेश दिया-‘धर्मराजन जैसे अफसरों को ये गलतफहमी है कि चुनाव आयोग के अंतर्गत उनका काम एक तरह का स्वैच्छिक काम है, जिसे वो चाहे करें या न करें। वो अगर सोचते हैं कि विदेश जाना या उनके विभाग का काम, चुनाव आयोग के काम से ज्यादा महत्वपूर्ण है, तो उनकी इस गलतफहमी को दूर किया जाना चाहिए।’

‘वैसे तो उन्हें इसकी कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन चुनाव आयोग ने इस विकल्प का इस्तेमाल न करते हुए सिर्फ उनकी गोपनीय रिपोर्ट में विपरीत प्रवष्टि करने का फैसला किया है।’

दो अगस्त 1993 को रक्षाबंधन के दिन टीएन शेषन ने एक 17 पेज का आदेश जारी किया कि जब तक सरकार चुनाव आयोग की शक्तियों को मान्यता नही देती, तब तक देश में कोई भी चुनाव नहीं कराया जाएगा। इस आदेश पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक थी।

शेषन ने पश्चिम बंगाल की राज्यसभा सीट पर चुनाव नहीं होने दिया, जिसकी वजह से केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु इतने नाराज हुए कि उन्होंने उन्हें ‘पागल कुत्ता’ कह डाला। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कहा-‘हमने पहले कारखानों में लॉक-आउट के बारे में सुना था, लेकिन शेषन ने तो प्रजातंत्र को ही लॉक-आउटश् कर दिया है।’

किसी को नहीं ब़ख्शा

शेषन ने अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल गुलशेर अहमद और बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव किसी को नहीं ब़ख्शा। उन्होंने बिहार में पहली बार चार चरणों में चुनाव करवाया और चारों बार चुनाव की तारीखें बदली गयी। ये बिहार के इतिहास का सबसे लंबा चुनाव था।

पूर्व चुनाव आयुक्त एमएस गिल याद करते हैं-शेषन का सबसे बड़ा योगदान था कि वो चुनाव आयोग को ‘सेंटर-स्टेज’ में लाए। इससे पहले तो मुख्य चुनाव आयुक्त का पद गुमनामी में खोया हुआ था और हर कोई उसे ‘टेकेन फॉर ग्रांटेड’ मान कर चलता था। (बीबीसी से साभार)

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