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सोनिया के हाथ में फिर कमान

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“कांग्रेस को चाहिए वे उससे छिटक गयी पार्टियों और नेताओं के साथ मिलकर एक साझा मोर्चा बनाये और नयी शुरुआत करे, क्योंकि अब ये गांधी परिवार के बस की बात नहीं है कि वो अकेले नरेंद्र मोदी और भाजपा की काट ढूंढ सके।”

रशीद किदवई 13.08.2019

आखिरकार शनिवार को यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया। राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद यह संकेत मिलने लगे थे कि एक बार फिर सेनिया गांधी को कांग्रेस की कमान सौंपे जाने की तैयारी कर ली गयी है।

इस बदलाव के बाद कई अहम सवाल उठ रहे हैं। मसलन, क्या सोनिया गांधी को एक बार फिर आगे कर के कांग्रेस अपना अस्तित्व बचा पाएगी? नयी प्रतिभाओं को मौके देने की बजाय पार्टी पुराने चेहरों पर ही भरोसा क्यों जता रही है? वस्तुत: कांग्रेस के लिए ये बदलाव का व़क्त है लेकिन उसकी समस्या यही है कि वो बदलना ही नहीं चाहती। कांग्रेस की मुश्किल ये है कि वो अपने काम करने के ढांचे को नहीं बदलना नहीं चाहती और साथ ही ये भी चाहती है कि उसके प्रति लोगों का नजरिया बदल जाए।

अस्तित्व बचाने की लड़ाई

अगर करीब से देखा जाए तो कांग्रेस के पास सोनिया गांधी को आगे करने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है। इस समय कांग्रेस के सामने अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है और एड़ी-चोटी का जोर लगाकर ये कोशिश कर रही है कि किसी तरह पार्टी बनी रहे। लोकसभा चुनाव में पार्टी को बहुत बुरी तरह से धक्का लगा था और इस हार से उबरने के लिए एक ऐसे नेता की जरूरत थी जो उसका आत्मविश्वास लौटा सके। वो आत्मविश्वास और स्वाभिमान सोनिया गांधी ही फूंक सकती हैं क्योंकि पार्टी में सब मानते हैं कि इस समय कांग्रेस में उनसे बड़ा और प्रभावशाली नेता कोई और नहीं है।

सवाल है कि लोकसभा में हार की जि़म्मेदारी अकेले राहुल गांधी के सिर पर डालना कितना उचित है? एक मायने में देखा जाए तो राहुल गांधी विफल जरूर रहे। ये चुनाव नरेंद्र मोदी का था और उन्होंने भाजपा की जीत में बड़ी भूमिका निभायी। लेकिन अगर पार्टी का पूरा तंत्र उनका साथ न देता तो शायद उसे इतनी बड़ी जीत न मिल पाती।

कांग्रेस के लिए अभी एक अच्छा मौका ये है कि जो पार्टियां और नेता उससे छिटककर अलग हो गयी हैं, उन्हें सेनियां गांधी वापस लाए। जैसे कि शरद पवार की एनसीपी, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और केसीआर की तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीएसआर) चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) ये सभी पार्टियां अपने-अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं और मजबूत भी। कांग्रेस को चाहिए इन पार्टियों के साथ मिलकर एक संगठित मोर्चा बनाए और एक नयी शुरूआत करे क्योंकि अब ये नेहरू-गांधी परिवार के बस की बात नहीं है कि वो अकेले नरेंद्र मोदी और भाजपा की काट ढूंढ सके।

कांग्रेस की वैचारिक शक्ति

कांग्रेस की वैचारिक शक्ति ही उसके वजूद को बचा सकती है। कांग्रेस अगर अपने ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को लोगों को समझा सके, इसे मूर्त रूप दे सके तब शायद कुछ हो सकता है। दूसरा तरीका ये है कि जिन राज्यों में उसकी सरकार है, वहां सकारात्मक और जन कल्याणकारी प्रयोग किए जाएं। ये इसलिए फायदेमंद होगा क्योंकि भाजपा शासित राज्यों और कांग्रेस शासित राज्यों की स्थिति में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। ऐसे में भारतीय जनमानस के बीच अच्छा और स्वस्थ संदेश प्रसारित होगा। अगर कांग्रेस अपने बेहतर प्रशासन और योजनाएं से साबित कर दे कि वो लोगों को बेहतर जि़ंदगी दे सकती है तो शायद लोग उसकी ओर एक बार फिर रुख करें। (बीबीसी से साभार)

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