Wed. Oct 23rd, 2019

सोशल मीडिया हथियार भी, सिरदर्द भी

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“भारत की 1.30 अरब जनसंख्या में लगभग 70 करोड़ लोगों के पास फोन हैं। इनमें से 35 करोड़ लोगों की जेब में स्मार्टफोन हैं। 15.5 करोड़ लोग हर महीने फेसबुक पर आते हैं और 16 करोड़ लोग हर महीने व्हाट्सऐप पर रहते हैं। इन आंकड़ों को देखें तो ये समझना मुश्किल नहीं कि राजनातिक पार्टियां ऑनलाइन कैंपेन या कहें सोशल मीडिया के इस्तेमाल को तवज्जो क्यों दे रहीं हैं। बीते कुछ सालों में चुनावों में सोशल मीडिया की भूमिका कितनी जरूरी हो गयी है, ये लैंस प्रिंस अपनी किताब ‘द मोदी इफेक्ट’ में बताते हैं। वह कहते हैं कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही समझ चुके थे कि लोगों तक सीधे पहुंचने के लिए सोशल मीडिया बेहद जरूरी है। उनके लिए ये केवल जुनून नहीं, बल्कि उनकी जरूरत बन गयी थी और साल 2014 में उनकी जीत के पीछे इसकी अहम भूमिका रही थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने जिस तरह सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया और उसका जो परिणाम मिला, उसे देखते हुए भाजपा और स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2019 में भी उसका भरपूर इस्तेमाल किया। भाजपा के पास सोशल मीडिया की बड़ी टीम है। फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप के जरिए राजनीतिक दल लोगों तक पहुंचने के लिए हर तरह की कोशिश कर रहे हैं। लोगों तक मन की बात पहुंचाने के लिए ये एक बड़े और प्रभावी माध्यम के तौर पर उभरा है। इतना ही नहीं कभी-कभी इसका इस्तेमाल अपने खिलाफ बोलने वालों को शांत करने के लिए भी किया जाता है। राजनीतिक दल कई फर्जी एकाउंट भी चलाते हैं। ये आसान भी है! क्योंकि गलत नाम और परिचय के साथ ट्विटर अकाउंट बनाया जा सकता है और आपके खिलाफ कौन बोल रहा है आपको पता तक नहीं चल पाता। वहीं, दूसरी ओर सोशल मीडिया सिरदर्द भी बन गया है। सोशल मीडिया पर फर्जी कंटेंट चलाने से कई लोग बेवजह बदनाम भी हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट तक भी यह मामला पहुंच चुका है और इस पर मुख्य न्यायाधीश भी चिंता जता चुके हैं।”

आम लोग तैयार कर रहे 79% कंटेंट

सोशल मीडिया पर आज हम और आप जो देख, पढ़ और सुन रहे हैं उसमें से 79 प्रतिशत चीजें आम लोगों द्वारा तैयार की गई हैं। बाकी हिस्सा संगठित क्षेत्रों, अभियानों और कंपनियों से आ रहा है।

खास बात है कि 2013 में इस प्रकार का कंटेंट केवल आठ प्रतिशत था। यानी इसे मुहैया करवाने में खुद यूजर्स की भागीदारी केवल पांच वर्ष में 10 गुना बढ़ चुकी है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के इंटरनेट इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार इस कंटेंट में फोटो और वीडियो जहां बढ़े हैं, वहीं ब्लॉग की संख्या कम हुई है।

अध्ययनकर्ताओं ग्रांट बैलैंड और विलियम एच डूटन के अनुसार 69 प्रतिशत इंटरनेट यूजर्स सोशल मीडिया पर अपने द्वारा ली गयी तस्वीरें और वीडियो अपलोड कर रहे हैं। लेकिन लिखने का काम 14 प्रतिशत ही कर रहे हैं। इसमें भी एक बड़ा हिस्सा फेसबुक और कुछ हिस्सा ट्विटर पर जा रहा है, ब्लॉग की संख्या आधी से भी कम रह गई है।

खतरे में आयी कमी

इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के अनुसार पहले के मुकाबले इंटरनेट उपयोग करने के खतरे घटे हैं। 12 प्रतिशत लोगां ने वायरस और मैलवेयर मिलने की बात मानी है। 2013 में यह संख्या 30 प्रतिशत थी।

52 प्रतिशत लोगों के अनुसार वायरस-मैलवेयर आज भी खतरा हैं। 2013 में 69 प्रतिशत इनकी वजह से चिंतित थे। 33 प्रतिशत यूजर्स इनसे बचने के लिए उपाय कर रहे हैं, 2013 में 76 प्रतिशत ऐसा कर रहे थे।

लेन-देन के लिए इंटरनेट पर निर्भरता बढ़ी

83 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता इसका उपयोग रुपयों के लेन-देन और खरीदारी में कर रहे हैं, 2013 में यह संख्या 59 प्रतिशत थी। 72 प्रतिशत फिल्में व टीवी सीरीज देखने के लिए इसका उपयोग कर रहे हैं, पहले यह संख्या 40 प्रतिशत थी। 76 प्रतिशत ने संगीत सुनने के लिए इंटरनेट को माध्यम बनाया, जो पहले 60 प्रतिशत था।

इसलिए ऑनलाइन नहीं आना चाहते

72 प्रतिशत यह भी मानते हैं कि इसकी वजह से उनकी निजता छिन रही है। 69 प्रतिशत का यह भी दावा है कि उन्हें इसमें रुचि नहीं है। 18 लोग इंटरनेट उपयोग करने की जानकारी नहीं रखते।

डिजिटल भेदभाव बढ़ने का भी खतरा

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार इंटरनेट उपयोग करने और न उपयोग करने वालों के बीच में डिजिटल भेदभावपूर्ण समाज का निर्माण होने का खतरा है। इसकी वजह से कई प्रकार की सुविधाओं खासतौर से सरकारी सेवाओं से एक बड़ा वर्ग वंचित रह सकता है। इनमें 40 प्रतिशत की आय सालाना 11 लाख रुपये से कम है।

डिजिटल भेदभाव बढ़ने का भी खतरा

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार इंटरनेट उपयोग करने और न उपयोग करने वालों के बीच में डिजिटल भेदभावपूर्ण समाज का निर्माण होने का खतरा है। इसकी वजह से कई प्रकार की सुविधाओं खासतौर से सरकारी सेवाओं से एक बड़ा वर्ग वंचित रह सकता है। इनमें 40 प्रतिशत की आय सालाना 11 लाख रुपये से कम है।

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