April 18, 2021

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गायब होती छोटी नदियां

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भारत के नीति नियंताओं ने प्रकृति के स्रोतों का निरंतर दोहन कर उन्हें पूर्ण रूप से समाप्त करने का ही निरंतर प्रयास किया है। उनके संरक्षण, संवर्धन के लिए कभी कोई प्रयास नहीं किया। फलस्वरूप प्रकृति के ये स्रोत निरंतर समाप्त हो रहे हैं।

डॉ. दिनेश प्रसाद मिश्र; 10.05.2019

भूगर्भ के जल का असीमित दोहन छोटी नदियों के जीवन को छीनने का प्रयास कर रहा है। दूसरी ओर शासकीय व्यवस्था में हो रहे विकास के कारण इन छोटी नदियों पर बांध बनाकर उनका जीवन छीना जा रहा है। फलस्वरूप देश की कई छोटी नदियां लुप्तप्राय हो गयी हैं। जो बची हैं, वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। इन छोटी नदियों के जीवन संघर्ष की ओर प्रयागराज में आयोजित कुंभ के दौरान एक अद्भुत दृश्य ने जनमानस का ध्यान खींचा जब मुस्लिम युवतियों का एक समूह 100 छोटी नदियों का जल कलश में लेकर मेला क्षेत्र में उपस्थित हुआ।

युवतियों का यह समूह मेला क्षेत्र के काली मार्ग पर स्थित नाले के ऊपर बने हुए अस्थायी पुल पर एकत्रित हुआ जहां जगद्गुरु शंकराचार्य ने आकर इन युवतियों से कलश लिया। इसके बाद वहां उपस्थित लोगों ने गंगा के साथ छोटी नदियों की रक्षा का संकल्प दोहराया। यह दृश्य नीर और नारी के रिश्ते को समझ कर छोटी नदियों की समस्या एवं उनकी सुरक्षा की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया।

भूगर्भ जल खतरे में
यहां पर इस तथ्य की ओर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि जिस प्रकार शरीर का तंत्रिका तंत्र पूरे शरीर से जल को एकत्र कर धमनियों को प्रेषित कर जीवन को संचालित करता है, उसी प्रकार से इन छोटी नदियों द्वारा जल की अपार राशि का संग्रह कर तथाकथित बड़ी नदियों को प्रेषित किया जाता है। उसी के बल पर बड़ी नदियां विशाल स्वरूप को ग्रहण करती हैं। आज भारत का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहा छोटी नदियों का अस्तित्व समाप्तप्राय: न हो। इन छोटी नदियों के अस्तित्वहीन हो जाने से पीने के पानी की समस्या उत्पन्न हो रही है। साथ ही भूगर्भ जल भी निरंतर समाप्त होता जा रहा है। भारत का सौभाग्य रहा है कि उसके पास प्रकृति के अनन्य उपहार के रूप में छोटी-बड़ी नदियों का विशाल संजाल विद्यमान है। किंतु भूगर्भ के जल के निरंतर दोहन से संकट उत्पन्न हो रहा है और समस्त राष्ट्र के समक्ष जल संकट का भयंकर खतरा सामने है।

दुर्भाग्य से भारत के नीति नियंताओं ने प्रकृति के स्रोतों का निरंतर दोहन कर उन्हें पूर्ण रूप से समाप्त करने का ही निरंतर प्रयास किया है। उनके संरक्षण, संवर्धन के लिए कभी कोई प्रयास नहीं किया। फलस्वरूप प्रकृति के ये स्रोत निरंतर समाप्त हो रहे हैं। आज उन्हें संरक्षण एवं संवर्धन हेतु शासकीय एवं सामाजिक सहयोग की अपेक्षा है, किंतु जैसे सहयोग एवं संरक्षण की अपेक्षा, आवश्यकता है, वैसा व्यापक संरक्षण एवं सहयोग कहीं से प्राप्त होता दिख नहीं रहा। प्रकृति के स्रोतों को बनाए रखने के लिए छिटपुट प्रयास तो देखे जा रहे हैं किंतु शासकीय स्तर पर व्यापक प्रयास नहीं किए जाने से उनका परिणाम सामने नहीं आ रहा है।

संकट की चेतावनी
छोटी-छोटी नदियों पर सिंचाई की सुविधा बढ़ाने के लिए बांध बनाने का कार्य व्यापक रूप से किया जा रहा है। लेकिन छोटी नदियों को प्रवाहमान बनाए रखने के लिए कोई योजना नहीं बनायी गयी है। जल ही जीवन है को चरितार्थ कर तथा उसके निहितार्थ को समझकर जीव-जंतुओं सहित प्रकृति को जीवन प्रदान करने वाली छोटी-छोटी नदियों को सुरक्षा, संवर्धन एवं प्रदूषण से संरक्षण ही उनको जीवन प्रदान कर सकता है। इसके साथ ही समाप्त होती जा रही छोटी नदियां धरती से समाप्त हो रहे जल की सूचना प्रदान कर आगे आने वाले जीवन के समक्ष उपस्थित होने वाले संकट की चेतावनी भी दे रही हैं।

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