Thu. Sep 19th, 2019

अर्थव्यवस्था की सुस्त गति

1 min read

“भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान चाल-ढाल बता रही है कि आने वाले दिनों में इसका संकट और गहरा हो सकता है। यह संकट ढेरों मुसीबतें लेकर आ सकता है। गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई में और अधिक इजाफा हो सकता है।”

रामकृष्ण जायसवाल 17.08.2019

हाल में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक विश्व बैंक की वर्ष 2018 की रैंकिंग में भारतीय अर्थव्यवस्था पांचवें पायदान से फिसल कर सातवें पायदान पर जा पहुंची है। निश्चित ही यह खबर चिन्ता बढ़ाने वाली है। लेकिन सवाल यह है कि अर्थव्यवस्था की मजबूती जिन कारकों पर टिकी हुई होती है उनमें कहां और कौन-सी कमजोरी आयी जिससे तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था के कदम न सिर्फ ठहर गए बल्कि आगे बढ़ते कदम पीछे की ओर लौटने लगे।

वाहन उद्योग संकट में

ध्यातव्य है कि बाजार में वाहनों की बिक्री में उद्योगों के उत्पादन में भारी गिरावट आयी है। बड़ी संख्या में कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा रहा है। वाहन निर्माता कंपनियों के संगठन सियाम का दावा है कि वाहन उद्योग के लिए यह इस सदी की सबसे बड़ी मंदी है। उधर, रेलवे ने अगले साल तीन लाख कर्मचारियों की छंटनी का इरादा जताया है। इससे मांग और पूर्ति प्रभावित हो रहा है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि किसी भी क्षेत्र में नौकरी की कटौती न केवल व्यवसाय को प्रभावित करती है बल्कि उससे जुड़े लोग तथा दूसरे कारोबार भी इससे प्रभावित होते हैं। साथ ही अर्थव्यवस्था पर भी खासा प्रभाव पड़ता है।

अत: इन समस्त कारणों से देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती की स्थिति नजर आ रही है। अर्थव्यवस्था में मांग का बेहद निम्नतम स्तर पहुंच जाने से गतिविधियों की गति को रोक देता है। साथ ही मुद्रा की स्थिति तुलनात्मक रूप से कम होती जाती है। रोजगार के अवसर भी लगातार कम होते जाते हैं जिसके कारण बेरोजगारी भी तेजी से बढ़ती है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब कारोबार को जारी रखने के लिए उत्पादकों की जबरन छंटनी होती है। कभी-कभी सुस्त अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि सरकार का अर्थव्यवस्था पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता। इन्हीं कारणों से नए निवेश और लेनदार भी हतोत्साहित रहते हैं।

अत: निवेश और मांग में कमी विकास दर में गिरावट और आर्थिक मंदी का संकेत है। पिछली तिमाही में विकास दर 5.8 प्रतिशत पर आ गयी जो मोदी सरकार के शासन का सबसे निचला स्तर है। मार्च 2017 में विकास दर 7.2 प्रतिशत रही, 2018 में 6.8 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2019-20 के लिए अनुमानित विकास दर सात प्रतिशत है। ऐसे में वर्ष 2024-25 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए कम से कम आठ प्रतिशत वृद्धि प्रति वर्ष अपेक्षित है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां तो कुछ और ही कह रही हैं।

संकट और गहराने का खतरा

सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में 0.35 प्रतिशत की कमी कर दी है। इस कमी के बाद रेपो दर 5.40 प्रतिशत रह गयी है। रेपो दर में इस कटौती के साथ रिजर्व बैंक की रिवर्स रेपो दर भी कम होकर 5.15 प्रतिशत रह गयी है। इस कटौती के बाद बैंकों पर कर्ज और सस्ता करने का दबाव बढ़ गया है। सरकार को विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए बड़ी कम्पनियों पर लगे अधिक करों पर पुन: विचार करना चाहिए। साथ ही श्रम सुधार पर भी ध्यान देना आवश्यक है। भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान चाल-ढाल बता रही है कि आने वाले दिनों में इसका संकट और गहरा हो सकता है। यह संकट भारत के मेहनतकश अवाम के लिए भी ढेरों मुसीबतें लेकर आ सकता है। गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई में और अधिक इजाफा हो सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

shares
error

Enjoy this blog? Please spread the word :)