Wed. Oct 23rd, 2019

पाकिस्तान बनते ही सिंधियों का हो गया था मोहभंग – ‘एक बोगस देश है पाकिस्तान’

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“‘जिये सिंध’ आन्दोलन के प्रवर्तक गुलाम मुर्तजा वह व्यक्ति थे, जिन्होंने 1943 में सिंध असेंबली में पाकिस्तान को भारत से काटकर अलग देश बनाने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन बाद में उन्होंने कबूल किया कि यह उनकी गलती थी। भारत विभाजन के पछतावे की ज्वाला में वर्षों सुलगते रहने के बाद उन्होंने सिंधी भाषा में लिखित अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान जो माजी, हाल-ए-मुस्तकबिल’ में लिखा कि पाकिस्तान का निर्माण एक अजूबा रोजगार है। कभी-कभी कुछ बातें आकस्मिक, दुर्घटनावश, प्रकृति के नियम के विरुद्ध हो जाती हैं। उदाहरणत: नारी एक बच्चे को जन्म देती है, लेकिन यदा-कदा कोई महिला तीन बच्चों को एक साथ पैदा करती है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश इस तीन राष्ट्रों का निर्माण भी प्रकृति के नियमानुकूल नहीं हैं।”

“सैयद के अनुसार न तो कुरान में और न ही हदीस में कहीं लिखा है कि मुसलमान एक अलग कौम या राष्ट्र है। अथवा इस्लाम कोई एक राष्ट्रीयता है। उन्होंने पाकिस्तान को प्रकृति की विडंबना मानते हुए कहा कि वह विश्व के मानचित्र पर उभरा हुआ एक ‘बोगस देश’ है। ‘पाकिस्तान नहीं रहेगा, पाकिस्तान टूटना ही चाहिए’, इस शीर्षक से उनकी एक पुस्तक भी है। जिसमें वह कहते हैं कि पाकिस्तान का जन्म भारत को तोड़कर हुआ है। वह एक रह ही नहीं सकता। वह एकता की अवधारणा के ही खिलाफ है। वह खराबी की बुनियाद है और इसे जन्म देने का गुनाह मैं कबूल करता हूं।”

बलबीर दत्त

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अमेरिका के ह्यूस्टन स्थित एम.आर.जी. स्टेडियम में बड़ी संख्या में वहां मौजूद भारतवासियों को संबोधित कर रहे थे तब स्टेडियम के बाहर सिंधी, बलूच और पख्तून समूह एक साथ प्रदर्शन कर पाकिस्तान से आजादी के लिए प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मदद मांग रहे थे।

इस अवसर पर सिंधी आंदोलनकारी जफर ने कहा कि पाकिस्तान एक फासिस्ट और आतंकी देश है जिसे पाकिस्तानी फौज के अधीन काम करनेवाली बदनाम खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. द्वारा चलाया जाता है।

तीन प्रांतों के लोग क्षुब्ध

अमेरिका में बलूच नेशनल मूवमेंट के प्रतिनिधि नबी बख्स बलूच ने कहा कि हम पाकिस्तान से मांग कर रहे हैं आजादी की, ठीक वैसे ही जैसे 1971 में भारत ने बांग्लादेश के लोगों की मदद की थी, हमारी भी मदद करें।

जैसा कि सर्वविदित है बलूचिस्तान में पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान का दमन-चक्र चल रहा है और वहां स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग के समर्थन में आंदोलन चल रहा है जो काफी गंभीर रूप धारण करता जा रहा है।

उधर खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के पख्तून भी अवाम पर पाकिस्तानी फौज के जुल्म से उत्तेजित है। पाकिस्तानी फौज के विरुद्ध वहां जो आंदोलन शुरू हुआ है उसका नारा है- ‘यह जो दहशतगर्दी है, उसके पीछे वर्दी है।’ जहां तक सिंध की बात है ‘जिये सिंध’ आंदोलन के अंतर्गत अलग सिंध देश की मांग पिछले कई वर्षों से की जाती रही है।

सिंध का तो भारत और भारतीय संस्कृति से बहुत गहरा संबंध रहा है। भारत के राष्ट्रगान की पहली पंक्ति ‘पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा’ में सिंधु का उल्लेख है। हिमालय से निकलकर सैकड़ों मील भारतीय क्षेत्र में बहते हुए भारतीय पंजाब की नदियों का जलग्रहण कर समुद्र में विलीन होने वाली सिंधु नदी के तट पर भारतीय सभ्यता-संस्कृति का विकास हुआ। लेह में सिंधु तट पर प्रति वर्ष मनाया जाने वाला सिंधु दर्शन महोत्सव अनूठा एवं ऐतिहासिक महत्व ग्रहण करते जा रहा है।

पाकिस्तान से मोह भंग

संयुक्त भारत में सिंध ही एकमात्र ऐसा प्रांत था, जिसकी असेंबली ने 1943 में पाकिस्तान संबंधी प्रस्ताव का अनुमोदन किया। सिंध में मुस्लिम लीग की सरकार थी। प्रस्तावक थे इसके शीर्ष नेता गुलाम मुर्तजा सैयद।

लेकिन 1947 में पाकिस्तान बनने के कुछ अरसा बाद ही इन्हीं जीएम सैयद का पाकिस्तान निर्माण से पूरी तरह मोह भंग हो गया। बात इतनी बढ़ गयी कि उन्होंने सिंध प्रांत को, जिसकी राजधानी कराची राष्ट्रीय राजधानी बना दी गयी थी, पाकिस्तान से अलग करने की मांग करते हुए ‘जिये सिंध’ आंदोलन शुरू कर दिया।

इस आंदोलन के जनक जीएम सैयद ने अलग ‘सिंधु देश’ की मांग की। इस आंदोलन में एक बार ऐसा उग्र दौर आया कि अनेक लोगों को यह लगने लगा कि सिंध भी बांग्लादेश की तरह पाकिस्तान से अलग हो जायेगा।

लेकिन सिंध की भौगोलिक स्थिति और कतिपय अन्य प्रतिकूलताओं के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका। हालांकि अभी भी आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

जीएम सैयद का 1995 में 92 वर्ष की अवस्था में इंतकाल हो गया। आखिरी दम तक वह अपने आंदोलन को लेकर सघर्षरत रहे। विसंगतियों की बुनियाद पर खड़े पाकिस्तान में वह ऐसी बहस छेड़ गये हैं, जो शायद ही कभी दम तोड़ पायेगी। उनकी पुरजोर राय थी कि कौमें मजहब से नहीं, भौगोलिक परिस्थतियों से बनती हैं।

उनकी यह धारणा धीरे-धीरे एक बड़ा सवाल और फिर एक आंदोलन बनती गयी। उन्होंने ये उद्गार अपने कस्बे ‘सान सिंध’ में अपनी 84वीं वर्षगांठ पर एक समारोह में व्यक्त किये थे।

इसमें उन्होंने यह भी कहा था कि सिंध में आम मुसलमान का (उनका आशय विशुद्ध सिंधी मुसलमानों से था) पाकिस्तान से मोह भंग हो गया और अब वे यहां घुटन महसूस कर रहे हैं। उससे मुक्ति पाना चाहते हैं।

सूफी सिंध बनाम इस्लामिक पाकिस्तान

सैयद ने कहा था कि मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि 1947 में देश का बंटवारा एक बहुत बड़ी गलती थी। जिन्ना ने इस्लाम का नाम लेकर हमें धोखा दिया। हम नहीं मानते कि मुसलमान एक कौम हैं। कौम मजहब से नहीं, वरन भौगोलिक परिस्थितियों से बनती हैं।

महाराजा दाहिर सिंध के हीरो थे, जिन्होंने बिन कासिम के हमले का विरोध किया था। 1946 में सात इस्लामिक संस्थाओं ने पाकिस्तान की मांग का विरोध करते हुए कहा था कि भारत के तीन महासंघ बनाकर उनका एक परिसंघ कायम किया जाये, लेकिन जिन्ना ने एक न सुनी।

हमें इस्लाम के नाम पर धोखा देकर अल्पसंख्यक बनाया जा रहा है। पंजाब इस्लाम के नाम पर हमें लूट रहा है। हम आजाद होकर भारत के साथ परिसंघ बनायेंगे।

‘जिये सिंध’ आंदोलन के प्रवर्तक सैयद ने अपनी 84वीं सालगिरह के अवसर पर अपने प्रकाशित भाषण में यह भी कहा था कि इस महान देश की एकता को अशोक, महान विक्रमादित्य और अकबर ने मजबूत किया था और भगवान कृष्ण, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरु नानक, संत कबीरदास, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, बुल्लेशाह, अचल सरमस्त और रहमान बाबा ने मानवता का उपदेश देकर इसकी रक्षा की।

हम सिंधी इसी रास्ते पर चलना चाहते हैं, हम इकबाल और जिन्ना की इस्लामी व्याख्या को नहीं मानते। सूफी सिंध और इस्लामी पाकिस्तान के बीच पटरी बैठ पाना कठिन है।

अपने सोच को बिना किसी संकोच के उजागर करने के अभ्यस्त गुलाम मुर्तजा सैयद ने अपने इसी सोच की अभिव्यक्ति सिंधी भाषा में लिखित अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘पाकिस्तान जो माजी, हाल-ए-मुस्तकबिल’ (पाकिस्तान का अतीत, वर्तमान और भविष्य) में खुल कर की थी। इस पुस्तक में उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान का निर्माण एक अजूबा रोजगार है।

कभी-कभी कुछ बातें प्रकृति के नियम के विरुद्ध आकस्मिक, दुर्घटनावश हो जाती हैं, उदारहणत: नारी एक बच्चे को जन्म देती है, लेकिन यदा-कदा कोई महिला तीन बच्चों को एक साथ पैदा करती है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश इन तीन राष्ट्रों का निर्माण भी प्रकृति के नियमानुकूल नहीं है।

न इतिहास, न भूगोल

उन्होंने यह भी लिखा कि हजारों वर्षों का इतिहास होने से कोई देश बनता है। पाकिस्तान का न तो अपना कोई इतिहास है और न ही अपना कोई भूगोल। ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टि से वह भारत के इतिहास और भूगोल के साथ है। चूंकि अजूबा रोजगार प्रकृति के नियमानुसार नहीं होता, इसलिए वह स्थायी भी नहीं होता।

जिस तरह गुलाम मुर्तजा सैयद के विचारों में आया बदलाव इतिहास का एक अध्याय है, उसी तरह सैयद की इस पुस्तक की पांडुलिपि किसी तरह 1973 में भारत पहुंची थी और भारत में ही यह प्रकाशित भी हुई। अहमदाबाद के एक सिंधी लेखक और पत्रकार गंगाराय सम्राट सैयद के मित्रों में थे।

उन्होंने ‘यूनाइटेड न्यूज’ को बताया कि उन्हें एक दिन सैयद की पुस्तक की पांडुलिपि प्राप्त हुई। उन्होंने उसे मुद्रित कराया, जिससे विश्व पाकिस्तान की स्थिति से अवगत हो सके।

गंगाराय सम्राट सिंध के इतिहास के अध्येता थे। उन्होंने ‘सिंधु सौवीर’ नाम से सिंध का प्राचीन इतिहास लिखा है। उनकी यह पुस्तक सिंध के इतिहास के अनुसंधान में उनके श्रम की परिचायक हैं।

गुलाम मुर्तजा सैयद 1987 के जुलाई माह में दिल्ली आये थे। यह उन दिनों की बात है, जब खान अब्दुल गफ्फार खान इलाज के लिए नयी दिल्ली में आयुर्वज्ञिान संस्थान में भर्ती हुए थे, उन दिनों गुलाम मुर्तजा सैयद भी दिल्ली आये थे और कनिष्क होटल में ठहरे थे।

तब तक यह सिंधी समुदाय में ‘सान जे साईं’ के तौर पर एक विशेष स्थान बना चुके थे। वरिष्ठ पत्रकार सूर्यकांत बाली ने एक भेंटवार्ता में उनसे पूछा कि क्या आपको अपने उस प्रस्ताव पर पश्चाताप नहीं होता, जिसमें आपने सिंध प्रांत की असेंबली में पाकिस्तान को भारत से काट कर अलग देश बनाने की मांग की थी।

सैयद ने संतप्त मन से कहा कि पाकिस्तान की जेलों में लगभग 26 वर्षों तक नजरबंद रह कर क्या मैंने उसका पर्याप्त प्रायश्चित नहीं कर लिया है? वास्तव में उस प्रस्ताव को रखने के दो साल बाद ही मेरा मन पाकिस्तान की धारणा से डिग गया था।

यह पूछे जाने पर कि आपने तभी इसका विरोध क्यों नहीं किया, उन्होंने कहा, ‘मैंने तभी इसका प्रबल विरोध किया था। पंडित नेहरू और सरदार पटेल से मैंने काफी अनुरोध भरे स्वर में बात भी की थी, पर तब तक सभी कांग्रेसी नेता परिस्थितियों के इस कदर शिकार हो गये थे कि मेरी एक न चली और पाकिस्तान बन गया।’

पाकिस्तान से उनका मोह भंग क्यों हुआ? इस बारे में कई तरह के सवाल-जवाब करने के बाद दो बातें सामने आयीं। एक, ‘इस्लामी कौमियत’ (राष्ट्रीयता) का सिद्धांत उन्हें रास नहीं आया और वह लगातार इससे दूर हटते रहे।

दूसरे, सिंध की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत, उनके महानता बोध और पंजाबी-बहुल पाकिस्तानी शासकों द्वारा उस संस्कृति को खत्म करने और उनके वारिसों का आर्थिक शोषण करने के भय ने उन्हें अलगाववादी बना दिया।

एक ‘बोगस’ देश पाकिस्तान

सैयद ने सिंध के ‘भव्य और गौरवशाली अतीत’ की बातें बड़े भावुक होकर की। मोहन-जो-दड़ो की सभ्यता से शुरू करके सिंध को आर्यों, बौद्धों, जैनों, जरथुस्त्रवादियों, मुसलमानों और ईसाइयों की संस्कृति का साझा घर मानते हुए उन्होंने कहा, ‘आज के सिंधी हम सभी संस्कृतियों की सम्मिलित संतान हैं, अकेले इस्लाम की नहीं, सिंधी कवियों पर मुझे कृष्ण के वेदांत और सूक्तियों की विविधता में एकता का भारी असर नजर आता है।

इसलिए मैं सिंध को भारत की ही नहीं, पूरी मानव जाति की एकता का प्रतीक मानता हूं।’ यह पूछे जाने पर कि आखिर मुसलिम राष्ट्रवाद और द्विराष्ट्रवाद से उनका मोह भंग कब हुआ। उन्होंने कहा, ‘1945 में ही हमें इस सिंद्धांत का थोथापन मालूम पड़ गया था।’

डॉक्टर मुहम्मद इकबाल की खुले शब्दों में भर्त्सना करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने (डॉ. इकबाल ने) मुसलमानों को मुस्लिम राष्ट्रवाद का और अलग राष्ट्रीयता का भ्रामक और दिशाहीन कर देने वाला नारा दिया। सैयद के अनुसार न तो कुरान में और न ही हदीस में कहीं लिखा है कि मुसलमान एक अलग कौम या राष्ट्र है।

अथवा इस्लाम कोई एक राष्ट्रीयता है। उनका मानना था कि कुरान तो धार्मिक एकता की बात करता है न कि किसी अलग धार्मिक राष्ट्रीयता की। इसलिए हम इकबाल के उस राष्ट्रवाद को क्यों मानें, जिसने एक राष्ट्र को दो हिस्सों में बांट दिया।

प्रकृति की विडंबना

इसी मनोभाव में सैयद ने इस बात से भी इनकार किया कि उर्दू मुसलमानों की धर्मभाषा है। उनका मानना था कि किसी धर्म की कोई भाषा होती ही नहीं और अगर मुसलमानों की कोई धर्मभाषा हो सकती है, तो अरबी हो सकती है। उर्दू भला कैसे हो सकती है।

उर्दू तो मुगलों की लश्करी भाषा थी, उसे धर्मभाषा कैसे मानें? जब उनसे यह पूछा गया कि कभी सिंधु देश बना और वहां लोकतंत्री शासन व्यवस्था खड़ी की गयी, तो क्या आप इस्लाम को वहां राज्यधर्म के रूप में नहीं देखना चाहेंगे? उन्होंने जोर देकर कहा, ‘नहीं, हमारा देश धर्मनिरपेक्ष होगा।’

वह पाकिस्तान के भविष्य के बारे में निराश और क्षुब्ध प्रतीत हुए। उन्होंने पाकिस्तान को प्रकृति की विडंबना मानते हुए कहा कि वह विश्व के मानचित्र पर उभरा हुआ एक ‘बोगस देश’ है।

‘पाकिस्तान नहीं रहेगा, पाकिस्तान टूटना ही चाहिए’, इस शीर्षक से उनकी एक पुस्तक भी है। जिसमें वह कहते हैं कि पाकिस्तान का जन्म भारत को तोड़कर हुआ है। वह एक रह ही नहीं सकता। वह एकता की अवधारणा के ही खिलाफ है। वह खराबी की बुनियाद है और इसे जन्म देने का गुनाह मैं कबूल करता हूं।

भारत-यात्रा के अवसर पर गुलाम मुर्तजा सैयद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से भी भेंट की थी। अपनी भारत-यात्रा के बारे में उन्होंने कराची के प्रमुख सिंधी साप्ताहिक ‘बरसात’ के प्रधान संपादक को एक इंटरव्यू भी दिया था जिसके अनुसार उन्होंने ‘सिंधु देश’ आन्दोलन के लिए भारत के समर्थन का अनुरोध किया था।

हालांकि इसका कोई परिणाम नहीं निकला। भारत विभाजन के पछतावे की ज्वाला में वर्षों सुलगते रहने के बाद ‘जिये सिंध’ आन्दोलन के प्रवर्तक गुलाम मुर्तजा सैयद का निधन हो गया।

इसे परिस्थितियों की एक विडंबना ही कहा जायेगा कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन का प्रथमार्द्ध भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने में होम दिया, उसी ने 1943 में सिंध प्रांत की असेंबली में पाकिस्तान को भारत से खंडित कर अलग देश बनाने का सर्वप्रथम प्रस्ताव रखा और बाद में हताश होकर सिंध को पृथक देश बनाने तथा हो सके तो उसे विशाल भारत महासंघ का स्वायत्त हिस्सा बनाने का पुरजोर प्रयास किया, जो निष्फल हो गया। लेकिन अलग ‘सिंधु देश’ की मांग फिर जोर पकड़ने लगी है।

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