Sun. Sep 27th, 2020

सिद्धपीठ गजनाधाम सिद्धपीठ गजनाधाम – शक्ति के निराकार रूप की यहां होती है पूजा

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“क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा भी ‘शक्तिपीठ’ है जो अद्भुत चमत्कारी, शक्तिशाली एवं निराकार है। आदिशक्ति माताभगवती का यहां कोई स्वरूप तथा आकार-प्रकार नहीं है। वस्तुत: माता प्रतिमा रहित हैं, बिलकुल निराकार हैं। माता की बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थापित इस शक्तिशाली पीठ को ‘गजनाधाम’ के नाम से जाना जाता है।”

शालिग्राम उन्मुक्त

क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा भी ‘शक्तिपीठ’ है जो अद्भुत चमत्कारी, शक्तिशाली एवं निराकार है। आदिशक्ति माताभगवती का यहां कोई स्वरूप तथा आकार-प्रकार नहीं है। वस्तुत: माता प्रतिमा रहित हैं, बिलकुल निराकार हैं। माता की इस शक्तिशाली पीठ को ‘गजनाधाम’ के नाम से जाना जाता है।

यह चमत्कारी एवं विचित्र धाम बिहार प्रान्त के औरंगाबाद और पलामू जिले के पूर्वी सीमा पर एक पहाड़ी नदी कारबार के तट पर स्थित है। गजनाधाम की दूरी पूर्व रेलवे के जपला स्टेशन से करीब 10 किमी तथा नबीनगर रोड रेलवे स्टेशन से दूरी 12 किमी है।

‘गजनाधाम’ एक सिद्धपीठ है। यहां एक समतल चबूतरे एवं आसन्न वस्त्र की पूजा ‘अदृश्य शक्ति’ स्थल मानकर की जाती है। माता भगवती का चढ़ावा (प्रसाद) भी विचित्र ही है। यहां मां भगवती को शुद्ध घी की पूड़ी एवं गुड़ या शक्करद्ध चढ़ायी जाती है। पूड़ी कोरी मिट्टी के बर्तन में लकड़ी के धीमी आंचों पर लकड़ी के सहारे ही बनायी जाती है। माता की चमत्कारिक शक्ति से धाम परिसर में एक किलो शुद्ध घी में दस किलो आटे की पूड़ी छान ली जाती है, जो आश्चर्यजनक ही है।

यहां प्राय: वही भक्तगण पधारते हैं, जिनकी कार्य सिद्धि हो जाती है। मनौती भक्तगण अपनी शक्तिनुसार एक से ग्यारह कढ़ाही तक पूड़ी-गुड़ चढ़ाकर पूरी करते हैं। यहां कहते हैं भक्तों, श्रद्धालुओं एवं आमजनों को प्रेत बाधा, देवबाधा एवं काल बाधा से मुक्ति मिलती है।

गजनाधाम में शारदीय नवरात्र और वासंती नवरात्र में अधिसंख्य श्रद्धालुगण एकत्रित होते हैं। नवरात्र में यहां श्रद्धालुओं की संख्या लाख-दो लाख तक प्रत्येक दिन पहुंच जाती है।

गजनाधाम का इतिहास शोधपूर्ण एवं रहस्यमय है। काशी के महाविद्धानों पं. शिवकुमार शास्त्री और पं. वामदेव शास्त्री के अनुसार यह वही स्थल है, जहां असुर गुरु शुक्राचार्य ने असुर सुरक्षा महायंत्र भूगर्भित किया था जिसको गणपति देव गजानन गणेश ने भगवान शंकर के श्राप से बचते हुए माता ललिता भगवती (पार्वती माता) की गोद में बैठकर सूंड के सहारे धरती से निकालकर विखंडित किया था। शास्त्री द्वय ने यह शोध अष्टगंध पुराण के जरिये किया है।

कुछ विद्वान एवं शास्त्रीगण गजना माता को चौसठों योगिनी में प्रथम योगिनी मानते हैं। सहस्त्रों वर्ष पूर्व ऋषि महर्षिगण यहां ऋद्धि-सिद्धि हेतु आते थे। कुछ पंड़ित लोग माता को वनदेवी कहते हैं जबकि क्षेत्रीय ग्रामीणों का कहना है कि राक्षसराज कंस ने आदि शक्ति माता का वध करने के लिए जब शस्त्र आकाश में चलाया गया था, उसी समय आदि शक्ति के सिर के बाल यहां कटकर गिरे थे। प्रतिफल यह धाम अद्भुत चमत्कारी एवं प्रत्यक्ष शक्तिशाली है।

प्रागैतिहासिक गजनाधाम मंदिर का जीर्णोद्धार समय-समय पर होता रहा है। करीब सौ वर्ष पूर्व मगध के जमींदार बाबू इन्द्रदेव सिंह ने माता की कृपा से पुत्ररत्न प्राप्ति होने पर मंदिर का नवनिर्माण कराया था और अपने पुत्र का नाम भी भगवती ही रखा था। सन 1977 में पुन: माता के मन्दिर का जीर्णोद्धार विधिवत महंत श्री त्यागी जी एवं पुजारी मुखदेव दास के अथक प्रयास से किया गया। इस प्रागैतिहासिक धाम की सुरक्षा, संरक्षण, विकास एवं समृद्धि हेतु सरकार, जिला प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन को सजग रहने की जरूरत है।

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