Thu. Jul 2nd, 2020

फिरोज खान के संस्कृत पढ़ाने का विरोध करने वालों को भेजो जेल

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“बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में पहली बार मुस्लिम प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति पर जिस तरह से विरोध हुआ है, इसको इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। वो कौन लोग हैं जो समाज में इस तरह के दुराव और नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं। आखिर वो किस तरह का देश और समाज बनाना चाहते हैं। यह एक गंभीर विचारणीय प्रश्न है। अगर आज ऐसे लोगों को रोका नहीं गया तो देश का धार्मिक सद्भाव और सामाजिक ताना बाना ही नष्ट हो जाएगा।”

“फिरोज खान की नियुक्ति पर विवाद शर्मनाक है। यह बात हर किसी को समझ लेना चाहिए कि कोई भी भाषा किसी जाति या धर्म की जागीर नहीं होती। सभी भाषाएं मनुष्यता की पोषक होती हैं। संस्कृत भाषा के अलोकप्रिय होने, विलुप्त होने का बड़ा कारण भी यही रहा है कि इसे ब्राह्मणों की भाषा बता दिया गया। जब कि ऐसा नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे उर्दू मुसलमानों की भाषा नहीं है।”

आरके सिन्हा

भारत वर्ष की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी स्थित महान शिक्षा के केंद्र काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्कृत विभाग में एक मुसलमान शिक्षक फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद हैरान करने वाला है। तीन लोक से न्यारी काशी की पावन धरती पर ऐसी छोटी मानसकिता का प्रमाण शायद ही पहले कभी देखने और सुनने में आया हो।

गंगा-जमुनी संस्कृति और तहजीब की आत्मा काशी में बाबा विश्वनाथ मंदिर से निकलने वाली बारात और प्रमुख कार्यक्रम उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई के बगैर न तो शुरू होती थी न समाप्त। धार्मिक सद्भाव की अद्भुत मिसाल पेश करने वाली काशी और यहां के निवासियों ने गंगा-जमुनी तहजीब का सदा खुले दिल से स्वागत कर आत्मसात किया।

नफरत को बढ़ावा देने वाले लोग

बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में पहली बार मुस्लिम प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति पर जिस तरह से विरोध हुआ है, इसको इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। वो कौन लोग हैं जो समाज में इस तरह के दुराव और नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं। आखिर वो किस तरह का देश और समाज बनाना चाहते हैं। यह एक गंभीर विचारणीय प्रश्न है।

अगर आज ऐसे लोगों को रोका नहीं गया तो देश का धार्मिक सद्भाव और सामाजिक ताना बाना ही नष्ट हो जाएगा। क्या सोचकर फिरोज खान के पिता रमजान खान ने उन्हें संस्कृत पढ़ाया होगा। जब संस्कृत पढ़ाने पर बिरादरी उनसे रिश्ता नहीं रखने की धमकी दी थी, तब रमजान खान ने समाज और रिश्तेदारों की परवाह किए बिना फिरोज खान सहित अपने चारों बेटों को संस्कृत की ही पढ़ाई करायी।

देश के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन एपीजे कलाम ने देश की सुरक्षा के लिए एक से एक मिसाइल का निर्माण किया। उनको ये विचार वेद, पुराण और हिंदू धार्मिक ग्रंथों से मिला था। जिसको उन्होंने सार्वजिनक मंचों पर भी बताया भी था।

राम जन्मभूमि पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट के साक्ष्यों के आधार पर ही माना था कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर था। इस बात को साबित पुरातत्ववेता (आर्कियोलॉजिस्ट) के. के. मोहम्मद ने ही किया था। केरल में जन्मे डॉ. के. के. मोहम्मद भी मानते हैं कि संस्कृत भाषा के अध्ययन के कारण ही उनको काम करने में आसानी हुई और ये सफलता भी मिली।

बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में कबीर दास और रविदास जैसे महान संतों की परंपरा आज भी जारी है। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने जिस भावना और मूल्यों के साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, उसको फिरोज खान की नियु्क्ति के विरोध से चोट अवश्य पहुंची होगी। हालांकि, बीएचयू के चांसलर के. गिरधर मालवीय जी ने भी माना कि फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध करना गलत है।

शिक्षा-ज्ञान किसी की बपौती नहीं

मशहूर अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने 19वीं सदी में कहा था,’-बनारस इतिहास से भी प्राचीन है, परंपरा से भी पुराना है और मिथकों से भी पहले से है। इतिहासए परंपरा और मिथ को साथ मिला दें तो बनारस और प्राचीन लगने लगता है।’ लेकिन लगता है कि बनारस अब नया हो चुका है। इस नए बनारस के छात्रों को किसी फिरोज खान का संस्कृत पढ़ाना लोगों को रास नहीं आ रहा।

ये अड़े हुए हैं कि फिरोज खान मुसलमान हैं और एक मुसलमान संस्कृत कैसे पढ़ा सकता है? एक मुसलमान गीता और वेद कैसे पढ़ा सकता है? भला शिक्षा, ज्ञान, तालीम कब से किसी धर्म, समुदाय विशेष की बपौती हो गयी। अगर ऐसा होता तो सदियों से आजतक सिर्फ एक वर्ग, समुदाय को जीवन, शिक्षा का अधिकार ही मिलता। शेष सभी पशुवत रहते। ऐसे तो समाज आगे बढ़ने की बजाय और पीछे चला जाएगा।

फिरोज खान की नियुक्ति पर विवाद शर्मनाक है। यह बात हर किसी को समझ लेना चाहिए कि कोई भी भाषा किसी जाति या धर्म की जागीर नहीं होती। सभी भाषाएं मनुष्यता की पोषक होती हैं। संस्कृत भाषा के अलोकप्रिय होने, विलुप्त होने का बड़ा कारण भी यही रहा है कि इसे ब्राह्मणों की भाषा बता दिया गया।

जब कि ऐसा नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे उर्दू मुसलमानों की भाषा नहीं है। अरबी, फारसी भी अरबों और मुसलमानों की भाषा नहीं है। जैसे अंग्रेजी अंग्रेजों की भाषा नहीं है। फिराक गोरखपुरी साहब कायस्थ परिवार में जन्में थे। उनका असली नाम रघुपति सहाय था। वे उर्दू भाषा के महान रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। अरबी, फारसी और अंग्रेजी पर भी उनकी अद्भुत पकड़ थी। अगर इन नासमझ लोगों को की मानें तो क्या उनको हिंदू होने के नाते सिर्फ संस्कृत पढ़ना चाहिए था।

भाषाएं मनुष्यता की हामीदार

देश के मशहूर शायरों में शुमार गुलजार देहलवी साहब का असली नाम आनंद मोहन जुत्शी गुलजार है। आपकी उर्दू की सेवा और शायरी को कौन नहीं जानता। पंडित जगन्नाथ आजाद उर्दू के बड़े शायरों में शुमार हैं। एक समय प्रकाश पंडित के संपादन में प्रकाशित बहुत से उर्दू शायरों के दीवान देवनागरी में हमने पढ़े हैं।

रहीम, रसखान, खुसरो हमारी साझी धरोहर हैं। ऐसे ही बहुत से मुसलमान हैं जिन्हें वेद, उपनिषद की बढ़िया जानकारी रखने के साथ संस्कृत से भी दिली मुहब्बत है। वे संस्कृत में लिखते, पढ़ते हैं, सम्भाषण भी करते हैं। इस लिए कि सभी भाषाएं आपस में बहने हैं मनुष्यता की हामीदार हैं और हमारी साझी धरोहर हैं। फिरोज खान के पिता तो रामायण और भजन भी गाते हैं झूम कर। मॅंदिर की गौशाला में प्रतिदिन सपरिवार घंटों नि:स्वार्थ सेवा करते हैं। फिरोज खान का बीएचयू में विरोध करने वालों की जगह सिर्फ और सिर्फ जेल है।

कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता

देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित महामना मालवीय ने कहा था, यह देश केवल हिन्दुओं का नहीं है बल्कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसियों का भी है। हमें सभी धर्म, भाषा का समान रूप से आदर और करना चाहिए। आज अगर ऐसे लोगों के विरोध को मान लिया गया तो इस तरह की घटनओं का दौर पूरे देश में शुरू हो जाएगा।

इससे योग्यता के बजाय धर्म, जाति को नियुक्ति का आधार बनाया जाएगा। जिससे देश में सामाजिक सौहार्द का वातावरण बिगड़ेगा। इस तरह की घटनाओं और विरोध करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाने की आवश्यकता है। योग्यता के आधार पर नियुक्ति और सामाजिक सद्भाव के लिए कड़े कदम की आवश्यकता है।

(लेखक राज्य सभा सदस्य हैं)
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