Thu. Nov 26th, 2020

मिथिलांचल की मनमोहक लोक संस्कृति और प्रगाढ़ प्रेम की याद दिलाता है सामा-चकेवा

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बेगूसराय : दूसरे राज्यों की तरह मिथिलांचल में भी तेजी से बढ़ रहे बाजारी और शहरीकरण के बावजूद यहां के लोग अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये हुए हैं। तभी तो यहां सूर्योपासना के महापर्व छठ के साथ ही विभिन्न लोक संस्कृति और लोक पर्व को अपनी धारा में बसाए मिथिलांचल में लोक पर्व सामा-चकेवा की भी तैयारी शुरू हो गई है। भाई-बहन के कोमल और प्रगाढ़ रिश्ते को बेहद मासूम अभिव्यक्ति देने वाला यह लोक पर्व मिथिला की संस्कृति की समृद्धता और कला का एक अभिन्न अंग है, जो कि सभी समुदायों के बीच व्याप्त बाधाओं को भी तोड़ता है। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू होने वाले इस लोक पर्व की समाप्ति कार्तिक पूर्णिमा की रात होती है।

सामा-चकेवा के चटख रंग की मूर्ति से सजा बाजार

भाई-बहन के अनमोल प्यार के प्रतीक में दस दिनों तक रात भर युवती और महिलाएं सामा खेलती हैं और अंतिम दिन चुगला का मुंह जलाने के साथ समापन होता है। इस उत्सव के दौरान बहनें सामा, चकेवा, चुगला, सतभइयां, टिहुली, कचबचिया, चिरौंता, हंस, सतभैंया, चुगला, वृदावन की मूर्ति को बांस से बने डाला में सजाकर पारंपरिक लोकगीतों के जरिये भाइयों के लिए मंगलकामना करती हैं। पहले महिलाएं अपने हाथ से ही मिट्टी की सामा-चकेवा बनाती थीं, विभिन्न रंगों से उसे सवांरती थीं। लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाता है क्योंकि बाजार में बने रंग-बिरंगे मिट्टी से बनी हुई सामा-चकेवा की मूर्तियां सहज उपलब्ध हैं। गांव में हाथ की कलाकारी से बने और चटख रंग से रंगे सामा-चकेवा की मूर्तियों से बाजार पटा हुआ है।

जलाया जाता है चुगलखोर चुगला का मुंंह

शाम के समय गीत एवं जुमले के साथ जब महिलाएं चुगला को जलाती हैं तो यह दृश्य मिथिलांचल की मनमोहक पावन संस्कृति की याद ताजा कर देती है। प्रत्येक आंगन में नियमित रूप से महिलाएं समदाउन, ब्राह्मण गीत, गोसाउनि गीत, भजन आदि गाकर मूर्तियों को ओस चटाती है। इसके बाद कार्तिक पूर्णिमा की रात बेटी के विदाई की तरह समदाउन गाते हुए विसर्जन के लिए समूह में घर से निकलती हैं और नदी, तालाब के किनारे या जुताई किए गए खेत में चुगला के मुंह में आग लगाया जाता है। मिट्टी तथा खर से बनाए वृदावन में आग लगाकर बुझाती हैं और सामा-चकेवा सहित अन्य मूर्ति को फिर अगले साल आने की कामना के साथ विसर्जित कर दिया जाता है।

मिथिला से दूर-दूर तक फैल चुका है यह लोक पर्व

सामा खेलते समय महिलाएं मैथिली लोक गीत गाकर आपस में हंसी-मजाक भी करती हैं। भाभी ननद से और ननद भाभी से लोकगीत की ही भाषा में खूब मजाक करती हैं। अंत में चुगलखोर चुगला का मुंह जलाया जाता है और सभी महिलायें लोकगीत गाती हुईं अपने-अपने घर वापस आ जाती हैं। हालांकि अब सामा-चकेवा मिथिला से निकलकर दूर तक फैल चुका है। हिमालय की तलहट्टी से लेकर गंगासागर तट तक और चम्पारण से लेकर मालदा और दीनजापुर तक मनाया जाता है। दीनजापुर में बंगला भाषी होने के बाद भी वहां की महिलाएं एवं युवतियां सामा-चकेवा पर मैथिली गीत ही गाती हैं। जबकि चम्पारण में भोजपुरी और मैथिली मिश्रित सामा-चकेवा के गीत गाए जाते हैं।

क्या है इस लोक पर्व की पौराणिक कहानी

भगवान श्रीकृष्ण की पुत्री श्यामा का विवाह ऋषि कुमार चारुदत्त से हुआ था। श्यामा ऋषि मुनियों की सेवा करने सखी डिहुली के साथ जाया करती थी। दुष्ट स्वभाव के मंत्री चुरक को यह रास नहीं आया और उसने श्यामा के विरुद्ध राजा कृष्ण का कान भरना शुरू किया तो श्यामा को पक्षी बनने का श्राप दे दिया गया। जिसके बाद श्यामा का पति चारुदत्त भी महादेव की अर्चना कर उन्हें प्रसन्न करते हुए स्वयं भी पक्षी का रूप प्राप्त कर लिया।

श्यामा के भाई शाम्भ ने अपने बहन-बहनोई की इस दशा से मर्माहत होकर अपने पिता की आराधना की। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि श्यामा रूपी सामा एवं चारुदत्त रूपी चकेवा की मूर्ति बनाकर उनके गीत गाये और चुरक की कारगुजारियों को उजागर करें तो वे दोनों फिर से अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त कर सकेंगे। तभी से बहनों द्वारा अपने-अपने भाई के दीर्घायु होने की कामना के लिए सामा-चकेवा पर्व मनाया जाता है। मिथिला में लोगों का मानना है कि चुगला ने ही कृष्ण से सामा के बारे में चुगलखोरी की थी। तभी से इस पर्व को मनाने की परंपरा चली आ रही है।

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