Tue. Oct 27th, 2020

लालू-राबड़ी से नाता तोड़ साधु यादव ने थामी बासपा की डोर, कांग्रेस कार्यकर्ता नाराज

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गोपालगंज : बिहार की सियासत ने ऐसी करवट ली कि गोपालगंज के कई कद्दवार नेता के टिकट कट गए। समता पार्टी के स्थापना काल से नीतीश कुमार के खासमखास रहे बैकुंठपुर विधानसभा क्षेत्र के मंजीत कुमार सिंह को इस बार जदयू का टिकट नहीं मिला। यह सीट भाजपा के खाते में जाने के बाद नीतीश कुमार ने अपना पीछा उनसे छुड़ा लिया।

भाजपा के खाते में सीट जाने के बाद नाराज मंजीत कुमार सिंह ने कहा कि 30 साल से नीतीश कुमार के साथ रहने के बाद भी तीर ने मुझे घायल कर दिया। बैकुंठपुर की जनता ही इसका जबाव देगी। वहीं सत्ता से आरजेडी के बेदखल होते ही लालू-राबड़ी ने साधु यादव से अपना पीछा छुड़ा लिया। इसके बाद से साधु यादव कांग्रेस सहित तमाम राजनीतिक ठिकाने तलाशते रहे, लेकिन अपना पुराना रुतबा वापस नहीं पा सके। ऐसे में साधु यादव इस बार बसपा के टिकट पर गोपालगंज विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे हैंं। साधु यादव और मंजीत कुमार सिंह ने शुक्रवार को अपने समथकों के साथ नामांकन किया।

जानकार बताते है कि राजद के शासन काल में अनिरुद्ध प्रसाद यादव उर्फ साधु यादव की तूती बोलती थी। गोपालगंज में उनकी मर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलता था। अधिकारियों की पोस्टिंग उनके कहने पर होती थी। साधु यादव पर उनकी बहन राबड़ी देवी और बहनोई लालू यादव के हाथ होने के कारण उन्होंने जो भी चाहा किया। मुखिया बनाने से लेकर प्रमुख बनाने में उनकी सहभागिता होती थी।

साधु यादव पर 6 आपराधिक मामले कोर्ट में लंबित हैं। साधु गोपालगंज से सांसद और विधायक भी रह चुके हैं। इसके पूर्व साधु यादव ने 2015 में बरौली विधानसभा सीट से गरीब जनता दल सेकुलर से चुनाव लड़ा था जहां से हार का मुंंह देखना पड़ा था। इस बार साधु यादव ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन जब उन्हें कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला तो बसपा के टिकट से साधु यादव ने चुनाव लड़ने का फैसला किया और शुक्रवार को अपना नामांकन दाखिल किया।

सूत्रों की माने तो साल 2009 में साधु यादव का उनकी बहन और बहनोई के साथ रिश्ता पूरी तरह से टूट गया था। वर्ष 2010 के चुनाव में गोपालगंज की सीट को लेकर साले और बहनोई में टिकट को लेकर ऐसी ठनी कि दोनों की राहें अलग हो गईं।

आरजेडी से मतभेद होने के बाद साधु यादव ने कांग्रेस के हाथ का सहारा लिया था। कांग्रेस से भी नहीं जीत सके तो 2015 में बसपा के हाथी की सवारी भी की, लेकिन कोई काम नहीं आया। आरजेडी से नाराजगी के कारण जिले के यादव मतदाताओं ने उन्हें नहीं अपनाया जिससे साधु यादव राजनीति में स्थान नहीं बना सके। गोपालगंज की जनता ने साधु यादव को किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ने पर स्वीकार नहीं किया।

लेकिन इस बार गोपालगंज विधानसभा सीट से चनाव में साधु यादव को एम वाई समीकरण का फायदा मिलने की उम्मीदें दिख रही हैंं। कांग्रेस की झोली में गोपालगंज विधानसभा सीट जाने के बाद कई नेता टिकट के लिए दिल्ली -पटना एक किए हुए थे।लेकिन हवा हवाई नेता आसिफ गफूर को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया जिसको लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जमकर बवाल मचाया और राहुल -सोनिया का पुतला जलाया।

इसका लाभ साधु यादव को मिलता नजर आने लगा है।मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 15 वर्षो में जब भी गोपालगंज आए वे मंजीत सिंह के घर ही रुके। मुख्यमंत्री के उनके घर रुकने के कारण जिले के आलाअधिकारियों के बीच उनका दबदबा कायम रहा। हालांकि वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू-नीतीश के टिकट पर लड़े मंजीत कुमार सिंह चुनाव हार गए थे। उसके बाद भी वे क्षेत्र में नीतीश कुमार के झंडे के नीचे काम करते रहे।

भाजपा और जदयू में पिछले पांच साल में रहा छतीस का आंकड़ा। लालू के पार्टी से नीतीश कुमार के हटने के बाद भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद भाजपा विधायक मिथिलेश कुमार तिवारी और मंजीत कुमार सिंह के बीच लगातार वाक्य युद्व होता रहा। एक दूसरे पर सोशल मीडिया पर आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला लगा रहा। इतना ही नहींं इन दोनों की लड़ाई के कारण विकास कार्यों में भी प्रशासनिक पदाधिकारियों को परेशानी उठानी पड़ी।

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