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गांधीजी ने पृथ्वी के 2 चक्कर के बराबर पैदल यात्राएं कीं, 35 साल में 79 हजार किमी सफर किया

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बापू के 150वें जयंती वर्ष पर उनकी सेहत का रिकॉर्ड प्रकाशित, गांधी शांति प्रतिष्ठान के दस्तावेज और सरकारी रिकॉर्ड से जानकारी मिली, उन्हें तीन बार मलेरिया हुआ, ब्लड प्रेशर भी दो बार 220/110 पहुंचा, तनाव के बावजूद गांधीजी को कभी हार्ट की कोई समस्या नहीं आई

27.3.2019

नई दिल्ली : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 35 साल में देशभर में 79 हजार किमी की यात्राएं कीं। यह पृथ्वी के एक चक्कर (40 हजार किलोमीटर) का लगभग दो गुना है। यानी अगर वे इस अवधि में धरती का चक्कर लगाते, तो दो बार इसकी परिक्रमा कर लेते। गांधी शांति प्रतिष्ठान में मौजूद दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड को खंगालने के बाद इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की मदद से गांधीजी की सेहत पर रिसर्च के बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई है।

  1. बापू रोजाना18 किमी पैदल चलते थे-150वें जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में सोमवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, वे रोजाना करीब 18 किमी पैदल चलते थे। सुबह चार बजे जगने के बाद एक घंटे की सैर और रात में सोने से पहले भी 30 से 45 मिनट पैदल चलते थे।
  2.  गांधी की अपेंडिक्स की सर्जरी हुई थी
    गांधीजी ने 1913-48 तक79 हजार किमी की यात्रा की। उन्हें 1925, 1936, 1944 में 3 बार मलेरिया हुआ। 1919 में पाइल्स की भी सर्जरी हुई थी। चौरी-चौरा कांड के बाद 1922 में जब गांधीजी जेल गए, उसके बाद पेट में तेज दर्द हुआ था। जांच के बाद 1924 में उनकी अपेंडिक्स की सर्जरी डॉ. मैडोक ने की थी। सर्जरी के दौरान बिजली चली गई थी, तब लालटेन की रोशनी में सर्जरी की गई थी।
  3.  गांधीजी जब 70 वर्ष के थे, उस समय उनकी लंबाई 5 फीट 5 इंच और वजन 46.7 किलोग्राम था जबकि उनका बॉडी मास इंडके्स 17.1 था।
  4. लंबाई के अनुपात में गांधीजी का वजन कम था, हालांकि उनका हीमोग्लोबिन 14.96 था। उनका ब्लड प्रेशर हमेशा सामान्य से ज्यादा रहता था, लेकिन दो बार (26 अक्टूबर 1937 और 19 फरवरी 1940) ऐसी स्थिति आई थी, जब उनका ब्लड प्रेशर 220/110 रिकॉर्ड किया गया था।
  5.  शारीरिक परिश्रम करना बेहद जरूरी है
    वे शाकाहारी थे। वे कहते थे जो मानसिक परिश्रम करते हैं, उनके लिए भी शारीरिक परिश्रम करना बेहद जरूरी है। गांधीजी एलोपैथी दवा के विरोधी नहीं थे। वे नेचुरोपैथी और आयुर्वेदिक दवाओं का सेवन करना ज्यादा पसंद करते थे।
  6.  इतने तनाव के बाद भी गांधीजी के हार्ट में कभी कोई समस्या नहीं आई। 1937 में उनकी ईसीजी जांच से यह तथ्य स्पष्ट होता है। उनका मानना था कि प्रकृति के विरोध में जाने से जो गड़बड़ी हुई है, वह प्रकृति के साथ रहने से ही ठीक होगी। वे यह भी कहते थे कि जो मानसिक परिश्रम करते हैं, उनके लिए भी शारीरिक परिश्रम करना बेहद जरूरी है।
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