Wed. Dec 11th, 2019

समय से संवाद करती रतन वर्मा की कहानियां

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“लगभग पिछले चार दशकों से देश भर में रतन वर्मा के लेखन, व्यक्तित्व और कृतित्व की लगातार चर्चा हो रही है। वे लगातार लिख रहे हैं। नियमित रूप से छप रहे हैं और पाठकों की पहली पसन्द की ओर उनकी रचनाएं कदम बढ़ाती चली जा रही हैं। उनके लेखन में गंभीरता है। एक सुलझा हुआ विचार है। स्पष्ट दृष्टिकोण है।”

विजय केसरी

रतन वर्मा ने किसी वाद या विचारधारा से सदैव अपने रचनाकर्म को मुक्त रखा और लेखन के प्रति पूरी निष्ठा और प्रतिवद्धता का परिचय दिया। वह अपनी कर्मभूमि हजारीबाग में स्वस्थ साहित्यिक परिवेश के निर्माण में सदैव अग्रसर नजर आते रहे हैं। नये लेखकों को सदैव प्रोत्साहित कर आगे की पीढ़ी तैयार करते भी देखे जाते हैं। सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में सड़कों से लेकर सभाओं तक उनकी सक्रियता उन्हें भीड़ से अलग करती हैं। उनकी कई कहानियों पर प्रांतीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर नाटकों के मंचन भी हो चुके हैं । रंगकर्म के विकास में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

पुरस्कारों की लंबी सूची

पिछले चार दशकों से वह लगातार सृजन कार्य में लगे हैं। इनके लेखन को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा रहा है। पुरस्कारों की लम्बी सूची में ‘गुलबिया’ कहानी को वर्तमान साहित्य द्वारा स्थापित कृष्ण प्रताप स्मृति पुरस्कार (1990), नाट्यभूमि सम्मान (1991), ‘सबसे कमजोर जात’ कहानी आनन्द डाइजेस्ट कथा प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ (1991), ‘नेटुआ’ नाटक साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा दशक के सर्वश्रेष्ठ छह नाटकों में शामिल (1992), ‘अवसर’ सम्मान (1994), समग्र साहित्य पर ‘राधाकृष्ण पुरस्कार’ (2004), ‘निखित भारत बंग साहित्य सम्मेलन, दिल्ली द्वारा विशिष्ट सम्मान दर्ज है।

रतन वर्मा ने अपनी आत्म-कथा में दर्ज किया है छात्र जीवन से ही वे अपने बड़े भैया कामेश दीपक की कविताओं को बड़े चाव से पढ़ा करते थे। हजारीबाग में जाने-माने साहित्यकार भारत यायावर से मुलाकात के बाद ही वे एक रचनाकार बन पाये। उनसे सम्पर्क के बाद ही उनमें लेखकीय प्रतिभा का विकास हो पाया। साहित्य को समझने और परखने की दृष्टि मिली। उन्होंने आगे लिखा है कि अगर उनकी मुलाकात भारत यायावर से नहीं हुई होती तो शायद वे रचनाकार बन नहीं पाते।

सुलझे विचार, स्पष्ट दृष्टिकोण

लगभग पिछले चार दशकों से देश भर में रतन वर्मा की रचनाओं, व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा लगातार हो रही है। उनकी कृतियों की सराहना हो रही है तो आलोचना भी जम कर हो रही है। वे लगातार लिख रहे हैं। नियमित रूप से छप रहे हैं और पाठकों की पहली पसन्द की ओर उनकी रचनाएं कदम बढ़ाती चली जा रही हैं। उनके लेखन में गंभीरता है।

एक सुलझा हुआ विचार है। स्पष्ट दृष्टिकोण है। उन्होंने कभी भी किसी विचारधारा के खूंटे से बंध कर नहीं लिखा। समाज में हो रहें उथल-पुथल, बदलाव, आमजन की परेशानी, संघर्ष, शोषण आदि के ईद-गिर्द ही वर्मा जी कथानक बुनते नजर आते हैं। उनकी रचनाएं पाठकों को भटकाती नहीं है बल्कि शोषण और अत्याचार के खिलाफ उठ खड़े होने के लिये प्रेरित करती हैं। उनकी कहानियों की खासियत यह है कि अगर किसी ने एक बार पढ़ना प्रारंभ किया तो समाप्त कर ही छोड़ता है।

ऐसी पठनीयता प्रवाह बहुत कम लेखकों की रचनाओं में देखने को मिलती हैं। उनकी लगभग तमाम कहानियां समय से संवाद करती नजर आती हैं। वे एक ओर संघर्ष के लिए प्रेरित करती हैं तो दूसरी ओर सामाजिक समरसता की भी सीख देती है। देश भर की लगभग तमाम प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकीं हैं। अब तक उन्होंने दो सौ साठ के लगभग कहानियां लिखी हैं, जिसमें दो सौ बीस के आसपास प्रकाशित हो चुकी हैं।

इसके अलावा उन्होंने समय-समय पर समीक्षाएं, साक्षात्कार, कविताएं, गीत, गजलें, संस्मरण लिखें। ‘पेइंग गेस्ट’, ‘दस्तक, एवं ‘नेटुआ’ (कहानी संग्रह), ‘यात्रा में’ (काव्य संग्रह), ‘रूक्मिणी’, ‘सपना’, ‘बादल को छंटना ही है’, ‘नेटुआ करम बड़ा दुखदायी’ (उपन्यास), ‘श्रवण कुमार गोस्वामी एवं उनके उपन्यास’ (आलोचना पुस्तक) ‘बबूल’, (कहानी संग्रह), ‘भूख, भूख और भूख’ (कहानी संग्रह), ‘चाँदनी रात की गजल’, (उपन्यास), ‘सपना’ (उपन्यास), आदि उनकी कृतियों में उनका लेखकीय व्यक्तित्व पूरी सघनता के साथ निखर कर सामने आया है।

मूल्य परक कहानियां

अपनी कहानियों में रतन वर्मा जिन मूल्यों को स्थापित करते हैं, उस पर सदा चलने की कोशिश भी करते रहते हैं। उनकी एक कहानी ‘आईस्क्रीम’ बाल मनोविज्ञान पर आधारित है। इस कहानी के घटना क्रम की परिधि में समाज की आधी आबादी से ज्यादा लोग आते हैं। जहां अभाव ज्यादा है, मेहनत भी ज्यादा करनी पड़ती है तभी लोग पैसा-पैसा जोड़ कुछ खरीद पाते हैं।

वह बालक कई दिनों तक पैसा जमाकर अपने पिता से ही आईसक्रीम खरीदने के बदले मुट्ठी भर पैसा देने के लिए हाथ बढ़ाता है। पिता की आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं। लेखक ने इस संवेदना को इतनी खूबसुरती से दर्ज किया है कि शब्द भी अश्रूपूरित हो जाते हैं। एक ओर लेखक ‘भूख’, भूख और भूख’ की बात कहते है तो दूसरी ओर संवेदना भी दर्ज करते हैं। समाज के सर्वहारा के शोषणा के खिलाफ आवाज उठाते हैं। आज की राजनीति के बदलते परिदृश्य पर चोट भी करते हैं।

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