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जन विश्वास और भारतीय नेतृत्व

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“सामान्य जनता जिस नेतृत्व पर विश्वास करती है, उसे देश की बागडोर सौंप कर निश्चिन्त हो जाती है। यदि वह विश्वास अगले चुनाव तक कायम रहा, तो प्राय: फिर उसी नेतृत्व को सत्ता सौंप देती है, अन्यथा विक्षुब्ध होकर उसे धूल भी चटा देती है।”

सुरेन्द्र कुमार मिश्र 12.06.2019

आम तौर पर भारत की सामान्य जनता राजनीति में हस्तक्षेप करने या करत रहने से परहेज करती है और चुनाव के वक्त जिस नेतृत्व पर विश्वास करती है, उसे देश की बागडोर सौंप कर निश्चिन्त हो जाती है। यदि वह विश्वास अगले चुनाव तक कायम रहा, तो प्राय: फिर उसी नेतृत्व को सत्ता सौंप देती है, अन्यथा विक्षुब्ध होकर उसे धूल भी चटा देती है। सहस्त्राब्दियों से राजतंत्र की अभ्यस्त जनता लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सात दशक तक अनुभव करने के बाद भी राजनीतिक टोका-टोकी से प्राय: तटस्थ रहती है। यहां राजनीतिक सफलता का मूलमंत्र है-नेतृत्व पर आस्था व विश्वास या किसी लंबे समय तक नेतृत्व करने वाले नेता की पार्टी को अपना समझना। थोड़ी भूल-चूक से न तो लोग विक्षुब्ध होते हैं, न विचलित।

भारतीय जनता की प्रवृति

भारतीय जनता की यह प्रवृति, रूचि व विश्वसनीयता को-अंगीकार करने की आदत स्वतंत्रता संग्राम के समय से आज तक कायम है। चाहे महात्मा गांधी पर अटूट विश्वास कायम होने का संदर्भ हो या नेहरू, इंदिरा पर अपना भविष्य गढ़ने की आस्था हो, भारतीय जनमानस का यह स्वभाव तब से लेकर आज तक पोषित पालित है। और, आज यही बात मोदी पर आकर टिक गयी है। मोदी के प्रति आमजन की मुख्य धारा का यह एक प्रबल विश्वास है कि मोदी के नेतृत्व की छांह में देश पूर्णतया सुरक्षित है, रहेगा और आगे विकास का काम भी होगा व जनता के दुख भी, धीरे-धीरे ही सही, हटते रहेंगे। मोदी के प्रति यही जन-विश्वास एक आस्था बनकर देश की जनता के दिलों का स्पंदन बन गया है। भीतर ही भीतर एक धारा बह रही है कि अब निश्चिंत रहा जा सकेगा और मोदी हैं तो सब कुछ मुमकिन है।

ऐसा नहीं है कि इस विश्वास के विरोध का स्वर इस देश में नहीं है, किन्तु राजनीति से प्राय: किनारे पर रहनेवाली आम जनता की मुख्य व वेगवती धारा इसी सोच से प्रभावित है। इसीलिए विरोध का स्वर कमजोर पड़ जा रहा है और जनमत की अंत:विद्युत धारा मोदी की झोली को अपने आशीर्वाद मतों से पूरी तरह भर दे रही है। इस विश्वास को कायम रहना और कायम रखना भारतीय राजनीति की सफलता का मूलमंत्र है।

इतिहास का सच

यह इतिहास का सच है कि भारतीय आजादी की लड़ाई गांधी के नेतृत्व में लड़ी गयी और कई दशकों तक लड़ी गयी। आजादी के मूल्य के रूप में देश विभाजन के भयंकर घाव का भयंकर दर्द सहना पड़ा, असंख्य लोगों की हत्या भी हुई, बहुत तबाही भी झेली गयी और एक भारी कीमत पर बंटी हुई आजादी मिली, बंटा हुआ देश मिला। किन्तु आम जनता की गांधी जी के प्रति श्रद्धा आज तक अक्षुण्ण है, उस पर खरोंच तक नहीं लगी। पंडित नेहरू भारत के प्रथम प्रधान मंत्री बने और जब तक जीवित रहे, इसी पद पर रहे।

उन्होंने इस पद पर रहते देश के लिए बहुत कुछ किया, किन्तु उनसे कुछ ऐसी भयंकर भूलें हुईं कि आज तक उन भूलों से यह देश प्रताड़ित है। उनकी कश्मीर नीति और तिब्बत व चीन नीति का दंड आज तक यह देश भुगत रहा है। किन्तु इन मामलों पर आज भी उंगली उठाना या नेहरू जी की छवि पर दाग लगाना अच्छा नहीं माना जाता।

इंदिरा जी का अलोकतांत्रिक ‘इमरजेन्सी पीरियड’ कोई राष्ट्रीय हेतु से नहीं था, राजनीतिक हेतु से ही था, किन्तु उनकी कई उपलब्धियां आज भी उनकी कमियों पर भारी पड़ती हैं और जनता इंदिरा गांधी पर सवाल उठाने पर कुपित हो जाती है। उनकी सिक्किम विलय वाली नीति व 71 की युद्ध-विजय जनता में उनके आदर को अब भी प्रतिष्ठित किये हुए है। जन-विश्वास का एक ऐसा दायरा होता है कि राष्ट्रीय हानि के बाद भी नेतृत्व पर आस्था नहीं डिगती।

मोदी के खाते में तो अब तक एक भी राष्ट्रीय हानि की चोट नहीं है। इन पर जन-विश्वास भला क्यों मद्धिम पड़े? तमाम आलोचनाओं को नकार कर यह जन-विश्वास तब ही तो इनके कंधों पर ढोने भर गठरी बांध दिया है। जन – विश्वास के बूते ही भारतीय राजनीति किसी नेतृत्व को सफल करती है और नेता को देवता तक बना देती है। मोदी भाग्यशाली हैं कि इस जन-विश्वास से इनका पलड़ा भारी है और इनका नेतृत्व अजेय व अक्षुण्ण है।

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