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आबादी नियंत्रण की पहल

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“मुद्दाविहीन विपक्ष अब सरकार के उस हर फैसले के विरोध पर उतारू हो गया है, जो व्यापक देशहित में लिए गए हैं। अनुच्छेद-370 एवं 35-ए का समापन और तीन तलाक कानून बनाने का विरोध कर विपक्षी दल अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में लगे हैं।”

प्रमोद भार्गव 17.08.2019

स्वतंत्रता दिवस की 73वीं वर्षगांठ पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैसे तो अनेक मुद्दों को उठाकर देश की जनता को उनका समाधान निकालने का भरोसा जताया है। परंतु इस बार पहली मर्तबा शीर्ष स्तर पर मोदी ने जनसंख्या विस्फोट के परिप्रेक्ष्य में जागरूकता पैदा करने पर जोर दिया है।

हालांकि उन्होंने कानून बनाकर इस विस्फोट को नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं जतायी है। इसे हम मोदी की दूरदृष्टि भी कह सकते हैं, क्योंकि यदि कानून की बात कही जाती तो कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल इसे मुस्लिम आबादी पर हमला मानकर हल्ला मचाने की कोशिश करने लग जाते। बावजूद यह कोशिश अभी भी हो सकती है, दरअसल मुद्दाविहीन विपक्ष अब सरकार के उस हर फैसले के विरोध पर उतारू हो गया है, जो व्यापक देशहित में लिए गए हैं। अनुच्छेद-370 एवं 35-ए का समापन और तीन तलाक कानून बनाने का विरोध कर विपक्षी दल अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में लगे हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं की आबादी घटने पर कई बार चिंता जता चुका है। साथ ही हिंदुओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह भी संघ के सह कार्यवाहक देते रहे हैं। इन बयानों को अब तक हिंदू पक्षधरता के दायरे में समेटने की संर्कीण मानसिकता जतायी जाती रही है। जबकि इसे व्यापक दायरे में लेने की जरूरत है।

कश्मीर, केरल समेत अन्य सीमांत प्रदेशों में बिगड़ते जनसंख्यात्मक अनुपात के दुष्परिणाम कुछ समय से प्रत्यक्ष रूप में देखने में आ रहे हैं। कश्मीर में पुश्तैनी धरती से 5 लाख हिंदुओं का विस्थापन, बांग्लादेशी घुसपैठियों के चलते असम में जब चाहे तब दंगे होते रहते हैं। जबरिया धर्मांतरण के चलते पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ता ईसाई वर्चस्व ऐसी बड़ी वजह बन रही है, जो देश के मौजूदा नक्शे की शक्ल बदल सकती है। लिहाजा परिवार नियोजन के एकंगी उपायों को खारिज करते हुए आबादी नियंत्रण के उपायों पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

बेलगाम बढ़ती आबादी

हालांकि भारत में समग्र आबादी की बढ़ती दर बेलगाम है। 15वीं जनगणना के हासिलों से साबित हुआ है कि आबादी का घनत्व दक्षिण भारत की बजाए उत्तर भारत में ज्यादा है। लैंगिक अनुपात भी लगातार बिगड़ रहा है। देश में 62 करोड़ 37 लाख पुरुष और 58 करोड़ 65 लाख महिलाएं हैं। शिशु लिंगानुपात की दृष्टि से प्रति हजार बालकों की तुलना में महज 912 बलिकाएं हैं।

हालांकि इस जनगणना के सुखद परिणाम यह रहे हैं कि जनगणना की वृद्धि दर में 3.96 प्रतिशत की गिरावट आयी है। लेकिन इसकी विसंगति यह है कि पारसियों, ईसाईयों और हिंदुओं में तो जन्मदर घटी है, लेकिन मुस्लिमों में बढ़ी है, क्योंकि मुस्लिमों में यह भ्रम है कि इस्लाम उन्हें परिवार नियोजन की इजाजत नहीं देता। यह जन्मदर हिंदू परिवारों में 0-6 साल के बच्चों की उन्नति दर 1.5 फीसदी है, जबकि मुस्लिमों में 18 फीसदी है। उच्च शिक्षित व उच्च आय वर्ग के लोग एक संतान पैदा करने तक सिमट गए हैं, जबकि वे तीन बच्चों के भरण-पोषण व उन्हें उच्च शिक्षा दिलाने में सक्षम हैं।

कानून वूमेन कोड बिल-2011

आबादी नियंत्रण के परिप्रेक्ष्य में हम केरल राज्य द्धारा बनाए गए ह्यकानून वूमेन कोड बिल-2011ह्ण को एक आदर्श उदाहरण मान सकते हैं। इस कानून का प्रारूप न्यायाधीश वीआर कृष्ण अय्यर की अघ्यक्षता वाली 12 सदस्यीय समिति ने तैयार किया था। इस कानून में प्रावधान है कि देश के किसी भी नगरिक को धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर परिवार नियोजन से बचने की सुविधा नहीं है।

हालांकि दक्षिण भारत के राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर संतुलित रही है, क्योंकि इन राज्यों ने परिवार नियोजन को सुखी जीवन का आधार मान लिया है। बावजूद आबादी पर नियंत्रण के उपाय तभी सफल हो सकते हैं, जब सभी धर्मावलंबियों, समाजों, जातियों और वर्गों की उसमें सहभागीता हो। हमारे यहां परिवार नियोजन अपनाने में सबसे पीछे मुसलमान हैं। ज्यादातर रूढ़िवादी और दकियानूसी धर्मगुरू मुस्लिमों को कुरान की आयातों की गलत व्यख्या कर गुमराह करते रहते हैं।

देश में पकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और बांग्लादेशी मुस्लिमों की अवैध घुसपैठ, अलगावादी हिंसा के साथ जनसंख्यात्मक घनत्व बिगाड़ने का काम भी कर रही है। इधर, असम क्षेत्र में 4 करोड़ से भी ज्यादा बांगलादेशियों ने नाजायज घुसपैठ कर यहां का जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ दिया है। ऐसे विरोधाभासी हालात में यदि नरेंद्र मोदी ने जागरूकता के जरिए आबादी नियंत्रण की वकालत की है, तो इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।

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