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पाकिस्तान विच मौजां ही मौजां ‘जिथे देखो फौजां ही फौजां!’

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“पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने सेना के दो जनरलों द्वारा रिटायरमेंट के बाद दो साल के भीतर विदेश में सेवाग्रहण करने को कानून का उल्लघंन बताकर सरकार से कैफियत तलब की है। लेकिन ऐसी कोई संभावना प्रतीत नहीं होती कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई कठोर आदेश देगा। इतिहास बताता है कि पाकिस्तान की न्यायपालिका अक्सर फौज से दबती रही है। हर सरकार के पास एक फौज होती है लेकिन पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है जिसकी फौज के पास एक सरकार होती है। पाकिस्तान के आम-चुनाव के शोर-शराबे और नयी सरकार बनने की सरगरमी के बीच एक काफी महत्वपूर्ण समाचार दब-सा गया है।”

बलबीर दत्त; 12.08.2018

समाचार यह है कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि रिटायरमेंट के तुरंत बाद सेना के दो पूर्व जनरलों को विदेश में सेवाग्रहण की अनुमति कैसे दी गयी। कोर्ट ने दोहरी नागरिकता के एक मामले में सुनवाई करते हुए यह जानना चाहा कि पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल राहिल शरीफ और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई के पूर्व डाइरेक्टर जनरल शुजा पाशा विदेश में सर्विस कैसे करने लगे, जबकि पाकिस्तान के कानून के अनुसार सेवानिवृत्ति के दो साल तक वे ऐसा नहीं कर सकते। जनरल राहिल शरीफ सऊदी अरब के नेतृत्व में गठित मुस्लिम देशों के सैनिक गठबंधन के मुखिया बन गये, जबकि जनरल शुजा पाशा संयुक्त अरब अमीरात में एक मल्टीनेशनल कंपनी मे चले गये।

कोर्ट ने तख्ता पलट को सही ठहराया !

अदालत के समक्ष सफाई देते हुए पाकिस्तान के रक्षा सचिव ने कहा कि दोनों सेना अधिकारियों ने रक्षा मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र ले लिया था जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इससे अपनी असहमति जताते हुए कहा कि कैबिनेट से मंजूरी ली जानी चाहिए थी। उच्च पदों पर रह चुके अधिकारियों के पास कई संवेदनशील जानकारियां रहती हैं इसलिए उनको छूट देने का निर्णय सर्वोच्च स्तर पर होना चाहिए। इस प्रकार यह अपने आप में एक विरल मामला है जिसमें पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने फौज से संबंधित मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार से कैफियत तलब की है। लेकिन पाकिस्तान का पिछला रिकार्ड बताता है कि वहां की न्यायपालिका फौज से दबती रही है। फौज उसे लुभाती- धमकाती रही है। यहां तक की सुप्रीम कोर्ट ने जनरल अयूब खान (1958), जनरल जिया-उल-हक (1977) और जनरल परवेज मुशर्रफ (1999) द्वारा किये गये तख्ता पलट को यह कहते हुए जायज ठहरा दिया था कि हालात ऐसे हो गये थे कि फौज को हुकूमत की बागडोर संभालनी पड़ी यानी निर्वाचित सरकार गिराकर फौजी सरगना का खुद तख्त पर जलवा अफरोज हो जाना पाकिस्तान के आईन (संविधान) के खिलाफ नहीं है!

फौज की सहायक न्यायपालिका?
हाल के वर्षों में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने बीच-बीच में अपनी स्वंतत्रता का कुछ प्रर्दशन किया है। लेकिन उसकी डंडी फिर फौज की ओर झुकती नजर आ रही है। पाकिस्तान की सियासत में इमरान खान को आगे बढ़ाने और नवाज शरीफ को पीछे धकेलने, सलाखों के पीछे धकेलने, में सुप्रीम कोर्ट ने प्रकारांतर से फौज की जो मदद की है उससे उसकी प्रतिष्ठा गिरी है। शरीफ बंधुओं ने खुले आम आरोप लगाया है कि न्यायपालिका छद्म ढंग से फौज का अंग बन गयी है। इस्लामाबाद हाई कोर्ट के एक जज ने भी फौज पर दखलअंदाजी करने, न्यायपालिका पर दबाव डालने का आरोप लगाया है। पाकिस्तान में आम चुनाव के लिए मतदान के बाद वहां के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ‘डॉन ‘में वरिष्ठ पत्रकार नदीम पराचा ने लिखा है कि पाकिस्तान तहरिक-ए-इंसाफ(पीटीआई) पार्टी 115 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप मे उभरी लेकिन यदि चुनाव अधिक स्वंतत्र और निष्पक्ष ढंग से होते तो पीटीआई को 90 से 95 तक ही सीटें मिलतीं, हालांकि ये भी दो अन्य विपक्षी पार्टियों पाकिस्तान मुस्लिम लीग(नवाज)और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी से तब भी अधिक ही होतीं।

‘जिथे देखो फौजां ही फौजां’
पाकिस्तान में आज जो स्थिति है उसमें मीडिया भी फौज की नाराजगी से बचकर चल रहा है। फिर भी जब पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा स्थापित वहां का सर्वाधिक शक्तिशाली और स्वतंत्र अखबार ‘डॉन’ जब यह कहता है कि यदि चुनाव अधिक स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से होते तो इसका निहितार्थ सहज समझा जा सकता है। जानकर सूत्रों का कहना है कि मतदान के दिन ऊपरी तौर पर देखने से तो यह लगता था कि कुल मिलाकर सब कुछ ठीक-ठाक ढंग से हो रहा है। लेकिन फौज की दखलअंदाजी के कारण चुनाव वास्तव मे सही ढंग से नहीं हुए। इसमें फौज के छलयोजन की बडी भूमिका रही।

इस बार चुनाव कराने में फौज ने प्रत्यक्षत

बड़ा रोल अदा किया। चुनाव में सुरक्षा के लिए 4,49,465 पुलिसकर्मियों के अतिरिक्त 3,70,000 की बड़ी तादाद में फौज के जवानों और अफसरों के साथ फौजी गाड़ियां नजर आ रही थीं। प्रश्न है- किसी लोकतांत्रिक देश में मतदान के दिन फौज कहां होती है? उत्तर है- बैरकों में। लेकिन इस्लामी जम्हूरिया-ए-पाकिस्तान मे ऐसा नहीं होता। 25 जुलाई को मतदान के दिन फौज सड़कों पर, गलियों में, मतदान केद्रों के अंदर और बाहर यानी सर्वत्र नजर आ रही थी। इस नजारे को देखकर लोगों को एक बार फिर पंजाबी भाषा में विनोद और कटाक्ष के पुट के साथ प्रचलित एक पुरानी लोकप्रिय फिकराबंदी दोहराने का मौका मिला। वह है– पाकिस्तान विच मौजां ही मौजां, जिथे देखो फौजां ही फौजां ।

(पाकिस्तान में खूब मौज-मस्ती है, जहां देखो फौज ही फौज नजर आती है।) इस तुकबंदी का बिस्मिल्लाह जनरल जिया की हुकूमत के दौरान हुआ था। 25 जुलाई को मतदान के दिन लोगों को ऐसा लग रहा था कि मतदान चुनाव आयोग नहीं फौज करा रही है। और उसकी कमान मुख्य चुनाव आयुक्त मुहम्मद रजा खान के हाथ में नहीं सेना प्रमुख जनरल बाजवा के हाथ में है। है न अजीब बात! ऐसी सूरत में पाकिस्तान के लोगों को फौज का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने जम्हूरियत की हिफाजत के लिए संगीनों के साये में चुनाव कराकर दिखला दिया।

वर्दीवालों का भय
लेकिन हकीकत यानी अदंरूनी वास्तविकता क्या है? पाकिस्तान में सबको मालूम हो चुका था कि इमरान खान पाकिस्तानी फौज की नयी पंसद हैं और ‘मोदी का यार'(‘जो मोदी का यार है, वो गद्दार है, गद्दार है’) पाकिस्तानी फौज के लिए अग्राहृय व्यक्ति हो चुका है। बहुत लोगों को गलत या सही, अंदर ही अंदर यह भी डर सता रहा था कि इन वर्दीवालों को पता लग जायेगा कि किसने किसको वोट डाला।

जहां तक साफ-सुथरे चुनाव की बात है, इस तथ्य को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है कि ठीक चुनाव के पूर्व विचित्र जल्दबाजी में संदिग्ध और अनुपयुक्त न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान मुस्लिम लीग(नवाज) के अध्यक्ष नवाज शरीफ और उनकी करिश्माई बेटी मरियम को चुनाव लड़ने से रोकते हुए उन्हें जेल का पंछी बना दिया गया। न केवल यह बल्कि फौज के दबाब पर उनकी पार्टी के 100 से अधिक उम्मीदवारों ने दलबदल किया या चुनाव से हट गये। चुनाव कानून तोड़ने के आरोप में नवाज शरीफ की पार्टी के 17,000 से अधिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे ठोक दिये गये, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कई जगह दफा 144 की आड़ में सभाएं नहीं करने दी गयी।

मीडिया में फौज की शह पर नवाज शरीफ के विरुद्ध भ्रष्टाचार के बहुत से अतिरंजित और झूठे आरोप भी लगाये गये। वैसे भ्रष्टाचार के संगीन आरोप पूर्व राष्ट्रपति व पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता आसिफ अली जरदारी समेत कई राजनीतिज्ञों पर लगे हुए हैं। खुद पाकिस्तान के फौजी कमाडरों के खिलाफ भ्रष्टाचार के ढेर-सारे संगीन आरोप हैं। लेकिन किसी भी कानूनी कार्रवाई से वे मुक्त हैं।

पाकिस्तान के मालदार फौजी अफसर
पाकिस्तान में विभिन्न कारखानों, संस्थानों और कंपनियों पर फौज के नियंत्रण, प्रतिरक्षा विभाग के ठेकों तथा साजो-सामान और हथियारों की सप्लाई में कमीशन आदि कारणों से फौज के बड़े अफसर इतने मालामाल हो चुके हैं कि पाकिस्तान मे कई लोग फौज के कोर कमांडरों को मजाक में करोड़ कमांडर कहने लगे हैं अर्थात ऐसे कमांडर जिन्होंने लाखों-करोड़ों रुपये कमाये हैं।

राष्ट्रपति जनरल अयूब के शासनकाल में पाकिस्तान के दस सबसे अधिक धनी परिवारों में एक खुद अयूब परिवार था। अयूब खान पुश्तैनी तौर पर अमीर नहीं थे। वह रावलपिंडी के निकट एक गांव में जन्मे घुड़सवार सेना में रिसालदार मेजर की पांचवी संतान थे। 1962 में अयूब के बेटे गौहर अयूब ने सेना से अपने कैप्टन पद से इस्तीफा दे दिया और देखते ही देखते अरबपति उद्योगपति बन गया, उसने कई जागीरें हथिया लीं।

पाकिस्तान के सार्वजनिक जीवन में सेना का दबदबा एक स्थायी वस्तु बन चुका है। पाकिस्तान में सैनिक फाउंडेशन सबसे बड़ा व्यापारिक और औद्योगिक संस्थान है। बीबीसी के संवाददाता रहीम उल्ला ने एक बार बताया था कि पाकिस्तानी सेना के दो संस्थानों ने कई कारखानों और कंपनियों पर कब्जा किया हुआ है। खैबर पख्तूनख्वा में कस्टम ड्यूटी की वसूली के लिए, पंजाब में बोगस स्कूलों का पता लगाने, टेक्नीकल कालेजों में दाखिले के लिए टेस्ट की निगरानी करने, जनगणना और अन्य कामों के लिए भी सेना को बुलाया जाता रहा है। लगता है सिविलियन सरकार और सिविलियन संस्थान पूरी तरह विफल हो गये हैं।

ऐसी संभावना कम है कि सुप्रीम कोर्ट सेना के दो रिटायर्ड जनरलों द्वारा कानून का उल्लंघन कर विदेश में सेवाग्रहण करने के विरुद्ध कोई कड़ा आदेश देगा या ऐसा आदेश देने की स्थिति में वह है। ज्यादा संभावना यह है कि इसकी लीपापोती हो जायेगी और कैबिनेट सेे मंजूरी प्राप्त कर इसे गतकालिक प्रभाव से लागू माना जायेगा। ताज्जुब तब होगा जब सुप्रीम कोर्ट इन जनरलों को विदेश में सर्विस करने से रोक दे।

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