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भारत के साथ तिजारती संबंधों में पाक सेना रोड़ा

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“भारत-पाकिस्तान के बीच मात्र सालाना 2.7 अरब रुपये का ही व्यापार हो रहा है। भारतीय उद्योग परिसंघ मानता है कि अगर दोनों देशों की सरकारों की तरफ से आपसी व्यापार को गति देने की पहल हो जाये तो 2.7 अरब रुपये का आंकड़ा 10 अरब रुपये तक पहुंचाया जा सकता है।’

आर.के.सिन्हा;06.08.2018

इमरान खान ‘नया पाकिस्तान’ निर्माण करने का सपना देख रहे हैं। उन्होंने लगभग 30 वर्षों से चले आ रहे पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) की सरकारों के राज को अंतत: समाप्त कर ही दिया। इमरान खान के प्रभामंडल के चलते उनकी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी (पीटीआई) अब पाकिस्तान की सत्ता पर काबिज होने के कगार पर है। इमरान खान ने देश के नाम दिये अपने पहले ही संदेश में ही भारत-पाकिस्तान संबंधों में तिजारत यानी आपसी व्यापार के बिन्दु पर चर्चा करके एक सकारात्मक संदेश दिया। शायद उन्हें ज्ञान हो गया है कि अब दुनिया युद्ध के रास्ते पर नहीं चल सकती है। क्योंकि युद्ध पूर्ण विनाश का पर्यायवाची बन गया है।

उनके सामने भारत-चीन का ताजा शानदार उदाहरण सामने है। दोनों दिग्गज एशियाई मुल्क अपने जटिल सीमा विवाद को सुलझाने की चेष्टा करते हुए आपसी व्यापार को आगे लेकर जा रहे हैं। वर्तमान में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब रुपये के आसपास पहुंच रहा है। अब जरा भारत-पाकिस्तान के आपसी व्यापार की दयनीय हालत भी जान लीजिए। इनके बीच मात्र सालाना 2.7 अरब रुपये का ही व्यापार हो रहा है। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) मानता है कि अगर दोनों देशों की सरकारों की तरफ से आपसी व्यापार को गति देने की पहल हो जाये तो 2.7 अरब रुपये का आंकड़ा 10 अरब रुपये तक पहुंचाया जा सकता है।

संकट ही संकट
निस्संदेह पाकिस्तान की रसातल में जाती अर्थव्यवस्था को पंख लगाने के लिए इमरान खान को जीतोड़ कोशिश करनी होगी। पाकिस्तानी रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है। एक अमेरीकी डॉलर की तुलना में पाकिस्तानी रुपये की कीमत 120 रुपये तक चली गयी है। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार भी खाली होता जा रहा है। पाकिस्तान की मुश्किलें अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद तेजी से बढ़ी हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ उनके देश के संबंध कतई सामान्य नहीं हैं। यानी पाकिस्तान के सामने संकट ही संकट है। इमरान खान को इनसे अपने देश को उबारने के उपाय खोजने ही होंगे। इमरान खान को अपनी सेना को समझाना होगा कि भारत के साथ शांति के रास्ते पर चलकर ही उनका मुल्क विकास कर सकेगा। उसका एक बड़ा पक्ष व्यापारिक संबंध मजबूत करना भी है।

दरअसल पाकिस्तानी सेना के हुक्मरानों ने देश की प्राथमिकताएं ही बदल दी हैं। पाकिस्तान के विद्वान राजनयिक हुसैन हकीकी कहते हैं कि उनके देश के शिक्षा बजट से सात गुना अधिक है रक्षा बजट। इस गलत मानसिकता और प्राथमिकता के चलते पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पटरी से पूरी तरह उतर चुकी है। वहां पर विकास का चक्का लंबे समय से जाम है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था संसार की 25वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, पर उसकी सेना का इस लिहाज से छठा स्थान है। वहां पर सेना का दखल हर स्तर पर है। कहते हैं कि पाकिस्तान को तीन ‘ए’ चलाते हैं। अल्लाह, आर्मी और अमेरिका। अमेरिका से तो अब उसके संबंध पहले जैसे नहीं रहे। कारगिल की जंग के बाद अमेरिका के तब के राष्ट्रपति बिल क्लिटंन ने भारत के पक्ष को माना था। उन्होंने पाकिस्तान को लताड़ भी लगायी थी कारगिल में घुसपैठ करने के लिए। तब से पाक-अमेरिका संबंध सामान्य नहीं हैं। आप उपर्युक्त उदाहरण से समझ सकते हैं कि पाकिस्तान में सेना की किस तरह की हैसियत है। उसने कारगिल ऑपरेशन चुनी सरकार से बिना पूछे ही कर दिया था। ले-देकर इमरान खान के पास अपने अवाम को बेहतर जिंदगी देने का एक ही रास्ता बचता है कि वे अपने देश में इस तरह का माहौल बनाएं ताकि वहां अन्य देशों से निवेश आए।

कश्मीर राग बंद करना होगा
फिलहाल पाकिस्तान में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नाममात्र ही आता है। उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि जिस देश की इमेज आतंकवादियों की फैक्ट्री की हो जाएगी वहां पर कोई भी निवेशक नहीं आएगा। क्या वे हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे खतरनाक मानवता के गुनाहगारों पर लगाम लगा सकेंगे? इन दोनों को सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई ही खाद-पानी देती हैं। ये वास्तव में उनके लिए बड़ी चुनौती होगी। इसलिए उनका इस मोर्चे पर सफल होना संदिग्ध ही लगता है। इमरान खान को भारत से आपसी व्यापारिक संबंधों को मजबूती देते हुए कश्मीर का राग अलापना अब तो बंद करना ही होगा। अगर उन्होंने यह नहीं किया तो फिर उनकी तिजारत की बातें जुमलेबाजी ही लगेंगी। निर्विवाद रूप से दोनों देशों में अमन की राह पर चलने वालों की तेजी से संख्या बढ़ी है।

यह अहसास जोर पकड़ रहा है कि इस उपमहाद्वीप में खुशहाली के लिये शांतिपूर्ण माहौल बेहद जरूरी है। जब सैकड़ों साल लड़ाई लड़ने के बाद सारा यूरोप सौहार्दपूर्ण तरीके से रह सकता है, तो भारत और पाकि स्तान अपनी अदावत क्यों नहीं भूल सकते हैं।पाक में बेरोजगारी व महंगाई से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। बिजली की सख्त कमी व लोडशेडिंग से अवाम का जीना मुहाल हो चुका है। अगर आप पाकिस्तान के अखबारों को पढ़ें तो पाएंगे कि वहां पर बिजली की किल्लत दंगों का कारण बन रही है। देश की आर्थिक दशा बिल्कुल चरमरा गई है। बेशक, भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापार में बढ़ोतरी से वे ताकतें मजबूत होंगी, जो शांति चाहती हैं और उनको नुकसान होगा, जो चरमपंथ के रास्ते पर हैं। अब भारत-पाकिस्तान के संबंधों की नयी इबारत लिखे जाने का वक्त है। इमरान खान पर यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी आन पड़ी है कि वे दोनों देशों के संबंधों को सौहार्दपूर्ण बनाएं। इमरान खान यह जाने लें कि उनके सकारात्मक कदमों को तो भारत हाथों-हाथ ले लेगा। लेकिन यदि चाल टेढ़ी हुई तो खुदा हाफिज!

(लेखक राज्यसभा सांसद हैं)

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