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जम्मू-कश्मीर में नया अध्याय

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A convoy carrying captured Indian pilot Wing Commander Abhinandan Varthaman arrives at the border post of Wagah in Pakistan, on Friday, ahead of his release

“आजाद भारत के 70 साल बाद भी कई समुदायों के लोग जम्मू्-कश्मीर के स्थायी नागरिक नहीं बन पाए हैं। जिस अनुच्छेद 370 ने इनके सभी रास्ते बंद कर रखे थे, उसकी समाप्ति की घोषणा के साथ उनकी उम्मीदें जाग उठी हैं।”

डॉ. मयंक चतुर्वेदी 07.08.2019

जिस अनुच्छेद 370 की बात करने भर से जम्मू-कश्मीर में दंगे भड़क उठते थे। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला एवं अलगाववादी नेता आए दिन यह धमकी देते थे कि अगर केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 370 और 35 ए को खत्म करती है तो जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच का रिश्ता भी खत्म हो जाएगा।

उन्हें अजय भाषा में पूर्ण विश्वास के साथ आज सरकार ने जवाब दे दिया है। दरअसल, अनुच्छेद 370 और 35 ए कुछ समय के लिए ही लागू किया गया था लेकिन कांग्रेस सरकारों की अदूरदर्शिता और वोटबैंक के कारण यह देश के गले की फांस बन गया था। उसे हटाना बर्रे के छत्ते में कंकड़ मारने जैसा था। लेकिन मोदी सरकार ने उसे खारिज कर निश्चित ही नया इतिहास रच दिया है। साथ ही दुनिया को बता दिया कि देशहित के फैसले किसी से पूछकर नहीं किये जाते। अनुच्छेद 370 हटाकर सरकार ने जो कर जो नया अध्याय लिखा है उससे पूरे देश में जश्न का माहौल है। दुनिया अचंभित है और पाकिस्तान स्तब्ध है।

‘मोदी है तो मुमकिन है’

अब यह साफ हो गया है कि लोकसभा चुनाव के समय लगाया जा रहा नारा व्यर्थ नहीं था कि ‘मोदी है तो मुमकिन है।’ केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। साथ ही लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर दिया है। उससे उन तमाम लोगों को राहत मिली है जिनकी कई पीढ़ियां इस राज्य में अन्याय सहती आ रही हैं। आजाद भारत के 70 साल गुजर आने के बाद भी कई समुदाय के लोग जम्मू्-कश्मीर के स्थायी नागरिक नहीं बन पाए हैं। जिस अनुच्छेद 370 ने इनके सभी रास्ते बंद कर रखे थे, उसकी समाप्ति की घोषणा के साथ उनके लिए आशा की उम्मीदें जाग उठी हैं। जो अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर में उनके मौलिक अधिकारों का हनन कर रही थी, अब आगे नहीं कर पाएगी।

जम्मू-कश्मीर में दर्द के रोजमर्रा के भुक्तभोगी सिर्फ वाल्मीकि समुदाय के अलावा पश्चिमी पाकिस्तान से 1947 में बंटवारे के वक्त हजारों की संख्या में अपनी जान बचाकर आए वे हिन्दू भी हैं जो यहां आकर बस गए थे। तब उन्हें भरोसा दिया गया था कि उनका जीवन और भविष्य सब सुरक्षित है। पूरे जम्मू-कश्मीर में उस वक्त पश्चिमी पाकिस्तान से करीब तीन लाख शरणार्थी आये थे। लेकिन उन्हें आज तक अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 ए के तहत वह अधिकार नहीं मिल सके हैं जो राज्य के मूल निवासियों को प्राप्त हैं। इस कारण वे लोग निर्वासित जीवन भोगने को मजबूर हैं। ऐसे तमाम लोग आज जम्मू-कश्मीर में मोदी और अमित शाह को दिल से दुआएं दे रहे हैं।

देखा जाए तो यह कष्ट सहने का सिलसिला यहीं नहीं थमता है। कभी उनके पूर्वज राजा-महाराजाओं के दौर में यहां सेवादारी के लिए आकर बस गए थे। उन्होंने सोचा नहीं था कि नए आजाद भारत में उन्हें मूल निवासी की परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ेगा। ये गोरखे आज भी इस राज्य के अपने नहीं माने जाते हैं। संसदीय चुनाव में वोट डालने का अधिकार रखते हैं किंतु स्थानीय विधानसभा, नगरीय या पंचायती चुनावों में इनके कोई स्थानीय मूल मताधिकार नहीं हैं। सरकार के निर्णय से इन सभी गोरखाओं को भी इस राज्य में अपने लिए सुनहरा भविष्य नजर आ रहा है।

भारतीय कानून पूरी तरह से लागू

अब जम्मू-कश्मीर अनुच्छेद 370 से मुक्त राज्य है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अब वहां पर भारतीय कानून पूरी तरह से लागू हो चुके हैं। राज्य के पुनर्गठन के प्रस्ताव पर मुहर लग चुकी है। जम्मू-कश्मीर अब केंद्र शासित प्रदेश बन गया है। लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर दिया गया है। लद्दाख के लोग लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे। इसके बाद शेष यदि कुछ बचता है कि तो वह सिर्फ और सिर्फ देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के समय सदन में रखा गया वह संकल्प, जिसमें यह बात कही गयी है कि हम पाकिस्तान से अधिकृत कश्मीर की एक-एक इंच भूमि लेकर रहेंगे। आशा बलवती है। काश, अब वह दिन भी आ जाए कि यह संकल्प भी मोदी सरकार में पूरा होता दिखे। इस 15 अगस्त के पूर्व मोदी-शाह का यह फैसला आनेवाले सशक्त भारत की ओर संकेत देने के साथ बहुत कुछ कहता है।

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