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विधायकों, सांसदों व मंत्रियों के प्रशिक्षण की जरूरत – अनुशासन, दायित्वभावना और विशेष ज्ञान की कमी

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“हमारे बहुत-से ऐसे संसद सदस्य हैं, जिन्हें संसद की गैलरी में लगे भारत के महान निर्माताओं के चित्र पहचानने में कठिनाई होती है। विधानमंडलों के कई सदस्यों को शपथ दिलाना कठिन हो जाता है। इससे अधिक विचित्र बात और क्या हो सकती है कि सदन में मतदान के बाद कई विधायकों व सांसदों के वोट रद्द करने पड़ते हैं, यह स्थिति राष्ट्रपति पद के चुनाव तक में होती है। राजीव गांधी ने सांसदों व मंत्रियों के विशेष प्रशिक्षण शिविर चलाये थे, जिनमें बहुत कम सदस्यों ने भाग लिया। वर्षों पूर्व राजाजी फाउंडेशन ने विधायकों व सांसदों के लिए एक इंस्टीट्यूट खोलने की योजना बनायी थी। वह नहीं खुला, पर अब उसका समय आ गया है।”

“इधर संसद और विधानमंडलों का काम पहले से अधिक जटिल होता जा रहा है। उनके सुचारू रूप से कार्य संचालन के लिए यह जरूरी है कि उनके सदस्य सुशिक्षित हों और इतना स्वाध्याय कर चुके हों कि देश के स्वर्णिम अतीत, उसके पतन के कारण, वर्तमान स्थिति, विश्व के इतिहास और वर्तमान प्रगति की उन्हें जानकारी हो। फिर विषयों का क्षेत्र भी पहले से बहुत बढ़ गया है। आज ऐसे सदस्यों की जरूरत है जो ‘होम वर्क’ करके आयें और संसद व विधानमंडलों में होनेवाली बहसों में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकें।”

बलबीर दत्त  21.07.2019

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 17वीं लोकसभा का पहला सत्र आरंभ होने से एक दिन पूर्व नवनिर्वाचित सांसदों का स्वागत करते हुए यह आशा व्यक्त की कि वे संसद को नया उत्साह और नयी ऊर्जा प्रदान करेंगे। उन्होंने सभी दलों के सदन-नेताओं को संबोधित करते हुए सभी राजनीतिक दलों से सदन की कार्यवाही के निर्विघ्न संचालन में सहयोग देने की अपील की। प्रधानमंत्री ने संसद का बजट सत्र शुरू होने पर दो अलग-अलग दिन संसद के सभी दलों के नेताओं और फिर दोनों सदनों के सांसदों को कहा कि वे सरकार के साथ मुक्त भाव से संपर्क में रहेें और विचारों का आदान-प्रदान करते रहें। यह अपने आप में एक अनूठा आइडिया है। अब देखना यह है कि इसका कितना असर होता है।

नयी लोकसभा में 267 नये सांसद

अब तक नयी संसद का पहला सत्र कुल मिलाकर काफी सुचारू रूप से चल रहा है। बड़े स्तर पर व्यवस्था भंग की कोई स्थिति उत्पन्न नहीं हुई, लेकिन आगे क्या होगा कहना कठिन है। क्योंकि यह तो शुरुआत ही है। पहले भी सर्वदलीय बैठकों में संसद की गरिमा को बनाये रखने के लिए अनुशासन का पालन करने के कई फैसले किये गये लेकिन उनका पालन नहीं हुआ।

17वीं लोकसभा के 542 सांसदों में 16वीं लोकसभा के मुकाबले अधिक युवा सांसद हैं। पिछली लोकसभा में 40 वर्ष से कम उम्र के सांसद आठ फीसदी थे जबकि इस बार इनकी संख्या 12 फीसदी है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 542 में से 23 फीसदी यानी 125 सांसदों का पेशा बिजनेस है।

वहीं सर्वाधिक 39 फीसदी सांसदों का पेशा राजनीति व समाजसेवा है। कुल 38 फीसदी सांसद खेतीबाड़ी से जुड़े हैं। अन्य पेशे वाले सांसदों में मात्र दो फीसदी शिक्षक, तीन फीसदी कलाकार, चार फीसदी चिकित्सक और चार फीसदी ही वकील है। संविधान सभा और पहली लोकसभा मे कायदे-कानूनों के जानकार और वकालत के पेशे से संबद्ध सदस्यों की संख्या अच्छी-खासी थी।

वर्तमान में सदस्यों की पेशेवाराना पृष्ठभमि के परिप्रेक्ष्य में यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि नये सदस्य और यहां तक कि कई पुराने सदस्य भी संसदीय परंपराओं व कार्यपद्धति से भली-भांति वाकिफ हैं। अनुभव, लगनशीलता और संसदीय कार्यपद्धति की जानकारी के अभाव के कारण संसद सदस्य अपने दायित्व का पालन ठीक से नहीं कर पाते। हर बार लोकसभा में बड़ी संख्या ऐसे सदस्यों की होती है जो पहली बार जीतकर आते हैं। इस बार पहली बार संसद में पहुंचने वाले सांसदों की संख्या 267 है, जबकि पिछली बार 315 थी। सबसे बड़ी संख्या इमरजेंसी के आखिरी दौर में 1977 में हुए आम चुनाव में जीतकर आने वालों की थी। उस बार 376 सदस्य पहली बार चुनकर आये थे।

बहुत समय से यह महसूस किया जा रहा है कि विधायकों, सांसदों और मंत्रियों के लिए एक विशिष्ट प्रकार की पढ़ाई के कोर्स, संसदीय तौर-तरीके तथा मंत्री पद के दायित्व की जानकारी की महती आवश्यकता है। 1980 की लोकसभा में बड़ी संख्या में कई ऐसे सदस्य थे, जिन्हें संसद की गैलरी में लगे भारत के महान निर्माताओं के चित्र पहचानने में कठिनाई होती थी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मुंह से सहसा यह निकल पड़ा था कि ऐसे कैसे चलेगा संसद का काम। लेकिन स्थिति आज उससे बेहतर नहीं है, भले ही सदस्यों की शैक्षणिक योग्यता कुछ बढ़ गयी हो। इस बीच महापुरुषों के चित्रों की संख्या भी बढ़ गयी है।
सुनने में यह विचित्र लगेगा लेकिन यह एक तथ्य है कि भाजपा की एक महिला सांसद डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का चित्र देखकर यह पूछने लगीं कि यह किनका चित्र है!

विधानमंडलों की स्थिति और दयनीय

जहां तक संसदीय नियमों की जानकारी का सवाल है, नये सदस्यों का उनसे कुछ अनभिज्ञ होना अस्वाभाविक नहीं। लेकिन संसदीय आचरण के मामले में नियमों की जानकारी की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी सहज-सामान्य शिष्टाचार व मर्यादा का पालन करने की आवश्यकता है। इस मामले में नये सदस्यों के साथ पुराने सदस्य भी दोषी हैं, जो मर्यादा का उल्लंघन करने से कतराते नहीं। पिछले कुछ वर्षों के अनुभव को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदा-कदा मर्यादा के उल्लंघन के मामले में नये-पुराने का कोई भेद ही नहीं रह गया है। संसद से अधिक बुरी स्थिति विधानमंडलों की है। अनभिज्ञता का आलम यह है कि कभी-कभी कई नये सदस्यों को शपथ दिलाना भी कठिन हो जाता है।

नियम-कायदों व प्रक्रियाओं को समझाने पर भी कई सदस्य, जिनमें नये-पुराने दोनों शामिल रहते हैं, उन्हें ठीक से समझ नहीं पाते। इससे अधिक विचित्र बात और क्या हो सकती है कि हर बार राष्ट्रपति पद के चुनाव में भी मतदान के बाद कई विधायकों व सांसदों के वोट रद्द करने पड़ते हैं, क्योंकि उन्हें ठीक से वोट डालना भी नहीं आता। भारत में पांच हजार से अधिक विधायक व सांसद हैं। इनमंे से अनेक सदस्यों में अज्ञानता, अनुशासनहीनता व समस्याओं की समझ का अभाव पाया जाता है। अत: यह जरूरी है कि उन्हें सक्षम विधायक व सांसद बनाने के लिए एक बुनियादी पाठ्यक्रम एवं रिफ्रेशर कोर्स आदि की व्यवस्था की जाये।

कई सदस्य सदन में नियमित तौर पर आते ही नहीं या हाजिरी लगाकर कुछ देर बाद चले जाते हैं। बड़ी संख्या में सदस्यों की कुर्सियां खाली नजर आती हैं। ‘गणपूर्ति’ या कोरम के अभाव में कार्यवाही चलती रहती है। जब कोई अति उत्साही सदस्य इस ओर ध्यान दिलाता है तब कोरम की घंटी बजायी जाती है। तब कैंटीन में या इधर-उधर गप मारनेवाले या गलियारों में चहलकदमी करनेवाले सदस्य प्रकट होते हैं। इसके बावजूद यह जरूरी नहीं कि तत्काल गणपूर्ति हो ही जाये औैर सदन की कार्यवाही को स्थगित नहीं रखना पड़े।

संसद सदस्यों के प्रशिक्षण की जरूरत को समझ कर राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में कांग्रेस के संसद सदस्यों व मंत्रियों के विशेष प्रशिक्षण शिविर चलाये थे। ये प्रशिक्षण शिविर सूरजकुंड, नैनीताल, माउंट आबू व बेंगलूर जैसे देश के विभिन्न स्थानों में आयोजित किये गये थे। लेकिन बहुत कम सदस्यों ने इन प्रशिक्षण शिविरों में भाग लिया। उन्होंने इन्हें कोई उचित महत्व नहीं दिया। राजीव गांधी ने इस पर नाराज होकर नैनीताल के शिविर में उद्घाटन के क्रम में कहा था –
‘कुछ लोग ऐसे हैं, जो चुनाव के समय या कुछ लेने के समय ही आगे रहते हैं। कुछ सीखने के समय वे आगे नहीं आते। अगर वे भविष्य में होने वाले कैंपों में नहीं आयेंगे, तो उनके विरुद्ध कार्रवाई की जायेगी।’ यदि प्रधानमंत्री को ऐसी चेतावनी देने की नौबत आये, तो यह स्पष्ट है कि अनेक संसद सदस्य अपने महान दायित्व के प्रति संजीदा नहीं हैं और शायद इसे वे एक खेल-तमाशा समझते हैं।

कांग्रेस सांसदों के इन प्रशिक्षण शिविरों में संसदीय प्रक्रियाओं, परंपराओं, आचार-व्यवहार, संसद के अंदर व बाहर की भूमिकाओं, संसद में सही सवाल उठाने की समझ आदि का प्रशिक्षण दिया गया था। बाद में इस तरह के और भी एक-दो गंभीर प्रयास हुए। भारतीय जनता पार्टी ने भी इस दिशा में कुछ सक्रियता प्रदर्शित की। लेकिन इस तरह के छिटपुट शिविरों के आयोजन का वांछित लाभ होता प्रतीत नहीं होता।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नये-पुराने सदस्यों को स्कूल टीचर की तरह समझा चुके हैं। कहते हैं समझदार व्यक्ति को इशारा ही काफी होता है, लेकिन इसका असर नहीं होने के कारण प्रधानमंत्री को महत्वपूर्ण मौकों पर भी बेवजह संसद से गैर हाजिर रहने वाले अपनी पार्टी के सांसदों के विरुद्ध एक कठोर स्कूल मास्टर का रवैया अपनाना पड़ा है। यह तो हद है कि कई मंत्री जिन्हें रोस्टर (नामावली) डयूटी के कारण सदन में हाजिर रहना चाहिए हाजिर नहीं रहते। उन्हें प्रधानमंत्री की फटकार और यह चेतावनी सुननी पड़ी कि ‘अगर ये लोग खुद नहीं सुधरे तो हम इन्हें सुधार देंगे।’ प्रधानमंत्री को संसदीय कार्यमंत्री से यह कहना पड़ा कि जो मंत्री रोस्टर डयूटी में उपस्थित नहीं रहते, उनके बारे में उसी दिन शाम को बताया जाये।

जहां तक आम सदस्यों की बात है सदन में सभी सदस्यों, विशेषकर पहली बार जीत कर पहुंचने वाले सदस्यों के लिए प्रशिक्षण के आयोजन की आवश्यकता है। तो पुराने सदस्यों के लिए आवश्यकता है वर्कशॉप और रिफ्रेशर कोर्स जैसे आयोजनों की ।

तमीज और तहजीब की कमी

जहां तक संसदीय आचार-व्यवहार अथवा आचरण की बात है, यह मुख्यत: शालीन भावनाओं व संवेदनाओं का विषय है, सदस्यों के संस्कारवान होने का विषय है। पिछले कुछ अरसे से संसद और विधानमंडलों में जिस प्रकार की घटनाएं होती रही हैं, वे अत्यंत शर्म का विषय हैं। देश की सर्वोच्च लोकतंत्री संस्था संसद में दूसरों को न बोलने देने, हाथापाई करने, गाली-गलौज तक उतर आने के बाद एक नयी परिपाटी चल पड़ी, मुठ्ठी भर सदस्यों द्वारा कोई विधेयक पेश होने से रोकना और सदन की कार्यवाही नहीं चलने देना। इतना ही नहीं, कुछ सदस्य स्पीकर के हाथ से कागजात छीन लेने और किसी मंत्री के हाथ से विधेयक या अन्य दस्तावेज छीन कर फाड़ डालने को अपने जुझारूपन का प्रतीक समझने लगे। ऐसे सदस्यों को समझाने-बुझाने के बजाय उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने की आवश्यकता है। विधानमंडलों के समक्ष यदि संसद के दायित्वपूर्ण ढंग से संचालन का आदर्श होता तो वे गलत हरकतों से बाज आते। लेकिन संसद के दोनों सदन कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सके।

पहले असंसदीय आचरण की हरकतें राज्यसभा में, जिसे ‘हाउस ऑफ एल्डर्स’ (प्रौढ़जनों का सदन) कहा जाता है, बहुत कम होती थीं, लेकिन अब यह बीमारी छूत की बीमारी की तरह वहां भी फैल गयी है। सर्वाधिक अफसोस की बात यह है कि दोनों सदनों में आपराधिक छवि के अनेक सांसद हैं।

हाल के दिनों में ही क्यों, पिछले कई वर्षों से संसद के दोनों सदनों में यह रिवाज चला आ रहा है कि जो सदस्य ज्यादा जोर से चीखता-चिल्लाता है या जिसके फेफड़ों में अधिक दम है, उसी को बोलने का अधिक मौका दिया जाता है। 11वीं लोकसभा में विश्वास मत के दौरान लोकसभाध्यक्ष पीए संगमा को एक बार टीवी कैमरामैनों से अनुरोध करना पड़ा कि वे कैमरों के स्विच ‘ऑफ’ कर दें और टेलीप्रसारण रोक दें, ताकि राष्ट्र को सांसदों के अशोभनीय आचरण को देखने की जहमत न उठानी पड़े।

संसद की कार्रवाई के सीधे टीवी प्रसारण के भी अनेक खतरे हैं। इससे सांसदों का ‘कच्चा चिट्ठा’ सबके सामने आता ही रहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ सदस्य संसद की कार्रवाई को सर्कस या तमाशा बनाने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। संसद में तत्कालीन राष्ट्रपति वेंकटरमण के एक अभिभाषण के समय एक विपक्षी सांसद ने इतनी टोका-टोकी की कि कुछ क्षणों के लिए राष्ट्रपति को अपना अभिभाषण रोक कर उक्त सांसद से अनुरोध करना पड़ा कि वह चुप रहे। टीवी दर्शकों को पहली बार महसूस हुआ कि राष्ट्र के सर्वोच्च पद की गरिमा बनाये रखने की तमीज और तहजीब हमारे अंदर अभी विकसित नहीं हुई हैं।

शिक्षा व स्वाध्याय की जरूरत

स्वाधीनता के स्वर्ण जयंती वर्ष में संसद का जो विशेष अधिवेशन हुआ था, उसमें अन्य बातों के अतिरिक्त यह संकल्प भी व्यक्त किया गया था कि संसद की गरिमा को बनाये रखा जायेगा। सांसदों ने संसद की गरिमा और मर्यादा बनाये रखने के लिए सदन में संयमपूर्ण व्यवहार, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हस्तक्षेप एवं टोका-टोकी न करने, धरना न देने, गाली-गलौज न करने, अध्यक्ष के आदेश-निदेश की अवहेलना न करने और बिना अनुमति के न बोलने पर आम सहमति व्यक्त की थी। लेकिन इन सारे संकल्पों की जिस तरह धज्जियां उड़ायीं जाती रही हैं उससे संसदीय गरिमा की समूची बात ही फीकी लगने लगी है। लोकतंत्र की सफलता चुने हुए प्रतिनिधियों व मंत्रियों के आचरण पर निर्भर करती है।

चाणक्य ने, जिनकी कूटनीति और चंद्रगुप्त मौर्य के परस्पर सहयोग से इस उपमहाद्वीप में विशाल मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई थी, मंत्री की नियुक्ति के बारे में कहा है। श्रुतवंतमुपधाशुद्धं मंत्रिणं कुर्वीत, अर्थात, विद्वान और लोभ रहित व्यक्ति को मंत्री पद पर नियुक्त करो। मंत्री विद्वान हो, यह आवश्यक है। मूर्ख मंत्री ‘जी हुजूर’ बन सकते हैं। मंत्रणा के योग्य नहीं हो सकते, लेकिन आज हमारे देश में स्थिति क्या है? प्राय: राजनीतिक मजबूरियों के कारण मंत्रियों का चयन योग्यता के आधार पर न होकर जातीय, क्षेत्रीय व अन्य बातों को ध्यान में रख कर किया जाता है। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मंत्री बन जाने के बाद वे गंभीरता से कुछ सीखने-समझने का प्रयास भी नहीं करते, जबकि नये और जूनियर मंत्रियों को इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत हैं।

इधर संसद और विधानमंडलों का काम पहले से अधिक जटिल होता जा रहा है। उनके सुचारू रूप से कार्य संचालन के लिए यह जरूरी है कि उनके सदस्य सुशिक्षित हों और इतना स्वाध्याय कर चुके हों कि देश के स्वर्णिम अतीत, उसके पतन के कारण, वर्तमान स्थिति, विश्व के इतिहास और वर्तमान प्रगति की उन्हें जानकारी हो। फिर विषयों का क्षेत्र भी पहले से बहुत बढ़ गया है। आज ऐसे सदस्यों की जरूरत है जो ‘होम वर्क’ करके आयें और संसद व विधानमंडलों में होनेवाली बहसों में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकें।

फिर चाहे वह बजट हो या आधुनिक विज्ञान व तकनीक, समुद्री विकास, पर्यावरण, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक्स या अन्य क्षेत्र। हमारे सांसदों, विधायकों व मंत्रियों में सादगी व जनसेवा के प्रति प्राथमिकता व विचारशक्ति का गुण भी होना चाहिए। कुछ वर्ष पूर्व राजाजी फाउंडेशन ने इन सब जरूरतों को दृष्टिगत रख कर विधायकों व सांसदों के लिए एक अकादमी इंस्टीच्यूट खोलने की योजना बनायी थी। वह नहीं खुला, पर अब उसका समय आ गया है।

एक सांसद ऐसा भी…

सांसदों और मंत्रियों में दायित्व भावना के अभाव के बीच एक सुखद और बेजोड़ समाचार यह है कि गुजरात के नवसारी निर्वाचनक्षेत्र से भाजपा के सांसद सीआर पाटिल कामकाज में तकनीक का खूब इस्तेमाल करते हुए क्षेत्र के लोगों से हमेशा संपर्क में रहते हैं। वह पहले और एकमात्र सांसद हैं जिनका आफिस 2015 में ही आई.एस.ओ.(150) अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन से प्रमाणित है। यह प्रमाणपत्र उन्हें सरकारी सुविधाओं के बेहतर प्रबंधन और निगरानी के लिए दिया गया।

‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित समाचार के अनुसार श्री पाटिल ने 54 कार्यों की पहचान कर रखी है। बुजुर्गों की अलग सूची है जिनका हालचाल चिठ्ठी भेजकर लिया जाता है। श्री पाटिल के दफ्तर में 47 लोगों का अच्छा-खासा स्टाफ है। यह स्टाफ सरकारी अफसरों तथा राज्य व केन्द्र से जुड़े मामलों पर जनता का काम करता है।

उनके दफ्तर से रोज सैकड़ों चिठ्ठियां क्षेत्र को लोगों को भेजी जाती हैं। सरकारी योजनाओं के लिए उन्होंने ऐसा मोबाइल एप बनवा रखा है जिसमें सब लाभार्थियो की सूची है। इसके साथ ही किसे, किस योजना का लाभ मिल रहा है, यह एप पर होता है।

श्री पाटिल सभी मतदाताओं को उनके जन्मदिन से लेकर शादी की सालगिरह तक की बधाई का संदेश भेजते हैं। गांव के लोगों को शहर न आना पड़े इसलिए सप्ताह में एक दिन मोबाइल आफिस वैन नवसारी लोकसभा निर्वाचनक्षेत्र के सातों विधानसभा क्षेत्रों में जाती है।

यह बात सही है कि सांसद पाटिल साधन-संपन्न व्यक्ति हैं। लेकिन सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं और सांसद निधि आदि के सटीक उपयोग और जन सहयोग से अन्य सांसद भी काफी कुछ कर सकते हैं। वैसे यह भी एक तथ्य है कि वर्तमान संसद में करोड़पति सांसद भरे हुए हैं।

…और भी हैं ऐसे सांसद

समाचार के अनुसार राजस्थान के भीलवाड़ा से भाजपा सांसद सुभाष बहेड़िया ने भी अपना आफिस बना रखा है और साल में 250 से ज्यादा दिन क्षेत्र में ही रहते हैं। अपना फोन खुद उठाते हैं। उनका कहना है कि वह हजारों बूथ कार्यकर्ताओं को उनके नाम से जानते हैं।

गुजरात के वडोदरा से भाजपा सांसद रंजनबेन भट्ट का कहना है कि वडोदरा के सभी गांवों और शहरी इलाकों में हर घर में लोगों के पास उनका फोन नंबर है। लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उन्हें फोन करते रहते हैं।

हरियाणा के फरीदाबाद से भाजपा सांसद कृष्णपाल गुर्जर हर व्यक्ति का फोन खुद उठाते हैं और सप्ताह में तीन दिन क्षेत्र के लोगों के बीच रहते हैं। वह सिर्फ वही वादा करते हैं जिसे पूरा कर सकें। इस कारण लोगों का भरोसा उन पर बढ़ा है। अपने कार्यालय का नाम उन्होंने ‘सांसद सेवा केन्द्र’ रखा है। उनके स्टाफ में 20 लोग कार्यरत हैं।

 

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