April 18, 2021

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वित्तीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा चुनौतियां

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मोदी सरकार ने वित्त व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के मोर्च पर अनेक सकारात्मक बदलाव किए थे। उन बदलावों को सही दिशा देने का काम मुख्य रूप से वित्त मंत्रालय का ही था, लेकिन उन कामों को सही तरीके से अंजाम नहीं दिया जा सका।

उपेन्द्र प्रसाद; 06.05.2019

नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अपना दूसरा कार्यकाल शुरू कर दिया है। पहले कार्यकाल की सरकार से यह अनेक मामलों में भिन्न है। इसकी भिन्नता तो यह है कि इस सरकार में अरुण जेटली नहीं हैं। भारतीय जनता पार्टी को 23 मई को बहुमत मिलते ही इस बात की चर्चा शुरू हो गयी थी कि इस बार जेटली को वित्त मंत्रालय नहीं दिया जाएगा। उन्हें किसी अन्य मंत्रालय से संतुष्ट होना होगा। उसके बाद अरुण जेटली की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखा एक पत्र जारी हुआ, जिसमंे उन्होंने सरकार में फिर से शामिल होने में असमर्थता जतायी। असमर्थता की वजह यह बतायी गयी कि उनका स्वास्थ्य खराब रहता है और इसके कारण वे मंत्री की जिम्मेदारी निभाने में समर्थ नहीं हैं।

जेटली की विदाई
अरुण जेटली के स्वास्थ्य के बारे में लोगों को पहले से ही पता है। गुर्दा खराब होने के बाद उन्हें किसी और का गुर्दा लगाया गया है। खराब स्वास्थ्य के कारण वे कुछ महीनों तक बिना विभाग के मंत्री थे और उनकी जगह पर पीयूष गोयल उनके मंत्रालय का भार संभाल रहे थे। लेकिन खराब स्वास्थ्य के बावजूद अरुण जेटली अपने ब्लॉग के द्वारा चुनाव अभियान में शामिल थे। वे नरेन्द्र मोदी का बचाव कर रहे थे और विरोधियों की खबर ले रहे थे। इसलिए यह अनुमान लगाया जा रहा था कि वे इतने ज्यादा बीमार भी नहीं हैं कि सरकार की जिम्मेदारियांे को निभा न सकें। लेकिन उन्होंने खुद सरकार में शामिल होने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी और इस तरह मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के एक महत्वपूर्ण मंत्री से दूसरा कार्यकाल वंचित हो गया है।

आज सबसे ज्यादा चुनौती वित्त मंत्रालय के सामने ही है। पूरी वित्तीय व्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अनेक बैंक रुग्न हो चुके हैं और उन पर भारतीय रिजर्व बैंक ने तरह-तरह की पाबंदियां लगा रखी हैं। कुछ बैंकों को आपस में मिला भी दिया गया है और कुछ अन्य बैंकों को आपस में मिलाने की प्रक्रिया जारी है। बैंकों का नन परफॉमिंर्ग एसेट बढ़ता जा रहा है। बैंकों के खराब स्वास्थ्य का देश की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना लाजिमी है।

बैंकों से ज्यादा बदहाल तो नन बैंकिंग वित्तीय संस्थान हैं। उनमें भी लाखों करोड़ रुपये देश के लोगों ने निवेश कर रखे हैं। उनके निवेश पर खतरे मंडरा रहे हैं। यदि इन संस्थानों को पटरी पर नहीं लाया गया, तो चैतरफा तबाही होगी। इसके कारण न केवल व्यवस्था में लोगों का विश्वास घटेगा, बल्कि बाजार में मांग मे भारी कमी आएगी। कमजोर मांग देश को आर्थिक मंदी की ओर भी धकेल सकता है।

नये वित्तमंत्री की चुनौतियां
इस पर कोई दो मत नहीं कि देश की वित्तीय व्यवस्था वास्तव में लड़खड़ाहट के दौर में है। सरकार और वित्तीय संस्थानों के अपने-अपने आंकड़े इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। सच यह भी है कि यदि वित्तीय व्यवस्था खराब रही, तो देश की अर्थव्यवस्था भी बहुत अच्छी नहीं रह सकती। ऐसे में उद्योगों को संकटों का शिकार होना पड़ सकता है क्योंकि उद्योगों का वित्त पोषण वित्तीय व्यवस्था से ही होता है। मोदी सरकार ने वित्त व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के मोर्च पर अनेक सकारात्मक बदलाव किए थे। उन बदलावों को सही दिशा देने का काम मुख्य रूप से वित्त मंत्रालय का ही था, लेकिन उन कामों को सही तरीके से से अंजाम नहीं दिया जा सका। अब नये वित्तमंत्री के सामने देश को मौजूदा वित्तीय व्यवस्था की लड़खड़ाहट से बाहर निकालने की बड़ी चुनौती है।

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