Wed. May 27th, 2020

महात्मा गांधी और हिन्दू धर्म

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“हिन्दू धर्म समाज को गांधीजी की सबसे बड़ी देन है। दलित वर्ग को हिन्दुओं से अलग करने के ब्रिटिश सरकार के षडयंत्र को विफल करता। 1932 में अंग्रेजों ने ‘बांटो और राज करो’ नीति के अंतर्गत पृथक निर्वाचन प्रणाली के जरिये दलित वर्ग को पृथक निर्वाचन की मान्यता दी। गांधीजी ने उक्त निर्णय के विरोध में आमरण अनशन आरम्भ कर दिया। जिनके बाद एक निर्णीत समझौते के अंतर्गत दलितों के लिए संयुक्त निर्वाचन प्रणाली को मान्यता देते हुए उनके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विधानसभाओं में स्थान सुरक्षित कर दिये गये।”

बलबीर दत्त

दुनिया का कोई भी व्यक्ति इस बात का उत्तर नहीं दे सकता कि भारत में हिन्दुत्व का प्रारंभ कब हुआ, जबकि ईसाइयत और इस्लाम के बारे में इस तरह के प्रश्न का उत्तर देना कठिन नहीं है। इसी तरह हमारे लिए यह बताना कठिन है कि हिन्दुत्व की परिभाषा क्या है। हिन्दुत्व कोई पूजा पद्धति नहीं है।

हिन्दुत्व कोई संकीर्ण विचार नहीं है। हिन्दू धर्म वस्तुत: कोई मजहब या रिलीजन नहीं है। इससे किसी विशेष पूजा पद्धति, विशेष महापुरुष अथवा विशेष पुस्तक को मानने का बोध नहीं होता। यह भारत के अनेक मत-पंथों का महापरिवार (कामनवेल्थ) है।

वट वृक्ष के समान धर्म

इसके अंतर्गत सैकड़ों पूजा पद्धतियां हैं और सबको मान्यता प्राप्त है। मूर्ति पूजा मानने वाला भी हिन्दू है, अनीश्वरवादी भी हिन्दू है। ईश्वर में विश्वास करें तो वांछनीय है, पर यह आवश्यक नहीं है। पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत में उनका विश्वास होना चाहिए।

महान क्रांतिकारी और वीर सावरकर, जो छह बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने और जिन्होंने हिन्दुत्व की राष्ट्रीयता के सिद्धांत को प्रस्थापित किया, नास्तिक थे। हिन्दू धर्म वट वृक्ष के समान है जिसमें सभी को छाया देने की क्षमता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रतिपादित किया है कि हिन्दू कोई मजहब नहीं है तथा हिन्दुत्व भारत की जीवन शैली है। हिन्दू, हिन्दुत्व अथवा हिन्दुवाद की कोई विशेष परिभाषा नहीं की जा सकती और ये शब्द रिलीजन या मजहब की सीमित परिभाषा में नहीं आते।

इन शब्दों में भारत की संस्कृति तथा वर्षों से चली आ ही परम्पराओं, जिसमें सभी को समाहित करने की क्षमता है, का ही बोध होता है।

गांधीजी स्वयं को सनातनी हिन्दू कहते थे। उनके सन्त पंत में निर्गुण, वैष्णव भक्ति की धारा थी, जो उनके प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड़ परायी जाने रे’ भाव से अनुप्रेरित थी।

लेकिन वह आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द का बड़ा आदर करते थे। उन्हीं से प्रेरित होकर उन्होंने हिन्दू समाज में छूआछूत, जातपात, बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों को दूर करने का अभियान छेड़ा।

हिन्दू धर्म समाज को गांधीजी की सबसे बड़ी देन है। दलित वर्ग को हिन्दुओं से अलग करने के ब्रिटिश सरकार के षडयंत्र को विफल करता। 1932 में अंग्रेजों ने ‘बांटो और राज करो’ नीति के अंतर्गत पृथक निर्वाचन प्रणाली के जरिये दलित वर्ग को पृथक निर्वाचन की मान्यता दी।

गांधीजी ने उक्त निर्णय के विरोध में आमरण अनशन आरम्भ कर दिया। जिनके बाद एक निर्णीत समझौते के अंतर्गत दलितों के लिए संयुक्त निर्वाचन प्रणाली को मान्यता देते हुए उनके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विधानसभाओं में स्थान सुरक्षित कर दिये गये।

यह समझौता ‘पूना पैक्ट’ कहलाया। गांधीजी ने कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर तथा अन्य मित्रों की उपस्थिति में अपना दो सप्ताह का अनशन समाप्त करते हुए जो वक्तव्य दिया उसमें उन्होंने आशा प्रकट की कि ‘अब मेरी ही नहीं, बल्कि …..’

सैकड़ों-हजारों समाज सुधारकों की यह जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ गयी है कि जब तक अस्पृश्यता का ुउन्मूलन नहीं हो जाता इस कलंक से हिन्दू धर्म को मुक्त नहीं कर लिया जाता, तब तक कोई चैन से बैठ नहीं सकता। यह ना मान लिया जाये कि संकट टल गया है। सच्ची कसौटी के दिन तो अब आने वाले हैं।
दलितों के उद्धार का आन्दोलन

गांधीजी का विश्वास था कि पृथक निर्वाचन को मान लेने से हिन्दू समाज के दो टुकड़े हो जायेंगे, और उसका यह अंग-भंग लोकतंत्र तथा राष्ट्रीय एकता के लिए बड़ा घातक सिद्ध होगा।

अस्पृश्यता को मानकर सवर्ण हिन्दुओं ने जा प्राप्त किया है उसका प्रायश्चित करने का अवसर उनके हाथ से चला जायेगा। दलित वर्गों को ‘हरिजन’ नाम गांधीजी ने ही दिया। एक गुजराती भजन में हरिजन ऐसे व्यक्ति को कहा गया है, जिसका इस संसार में हरि के अतिरिक्त कोई दूसरा सहायक नहीं है।

‘पूना पैक्ट’ के बाद गांधीजी और पंडित मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में एक देशव्यापी अभियान छेड़ा गया। सभी सार्वजनिक कुएं, धर्मशालाएं, श्मशान घाट, मंदिर इत्यादि दलित वर्गों के लिए खुले घोषित किये जाने लगे।

अनगिनत लोगों ने छूआछूत को छोड़ा, दलितों को गले लगाया। दलितों में अपना जन्मजात अधिकार प्राप्त करने का साहस पैदा हुआ। देश स्वतंत्र होने के बाद संविधान सभा ने डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में जो संविधान बनाया उसने अस्पृश्यता को ‘निषिद्ध’ ठहरा दिया।

दलित वर्ग के अनेक सुयोग्य व्यक्तियों को केन्द्र और विभिन्न प्रांतों में मंत्रियों के उत्तदायित्वपूर्ण पद दिये गये। विभिन्न सरकारी विभागों में उनकी नियुक्तियां हुईं, जिससे उनमें स्वाभिमान जागा। अस्पृश्यता का सर्वथा उन्मूलन नहीं हुआ है, लेकिन धीरे-धीरे यह समाप्ति की ओर है।

आधुनिक भारत के राष्ट्रीय जागरण में गांधीजी का योगदान अतुलनीय था। उन्होंने हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करके राम नाम, राम राज्य, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, ईमानदारी और त्याग का जो वेदों, उपनिषदों तथा गीता का सार है, उसका प्रचार करके तथा हिन्दू समाज के आपसी भेदभाव दूर करके उसके उत्थान तथा सर्वांगीण प्रगति का प्रयास किया।

गांधीजी की प्रिय राम धुन ‘रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम’ उनके दैनिक जीवन का अभिन्न अंग थी। प्रतिदिन अपनी प्रार्थना सभा में वह रामधुन का प्रयोग किया करते थे।

राम नाम के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा और विश्वास था। इसके जप से उनमें साहस, विश्वास और निर्भीकता का संचार होता था। वह सर्वधर्म-सम्भाव को मानने वाले थे। जाति, धर्म, वर्ग का भेद वह नहीं मानते थे।

सनातनी हिन्दू

‘यंग इंडिया’ (28 सितम्बर, 1920 का अंक) में उन्होंने लिखा था, मैं अपने आप को सनातनी हिन्दू कहता है क्योंकि-
1. मैं वेदों, उपनिषदों, पुराणों और सभी हिन्दू धर्म-ग्रंथों को मानता हूं।
2. गो-रक्षा धर्म पर भी मेरा विश्वास है।
3. मूर्ति-पूजा पर मेरा अविश्वास नहीं है।

गांधी जी का कहना था कि हिन्दू नाम दैशिक जरूर है, किन्तु यह कोई साम्प्रदायिक धर्म और देशकाल की सीमाओं में बंधा धर्म नहीं है। यह तो सभी के लिए सुख चाहने वाली एक जीवन पद्धति है।

साध्य-साधन और सत्य-अहिंसा पर गांधीजी की सोच, उनके राजनीतिक दर्शन और रीति-नीतियों से पूरी तरह सहमत न होते हुए भी अधिकतम लोग इस पर सहमत होंगे कि गांधीजी का व्यक्तिगत जीवन धर्म के उच्च आदर्शों से प्रेरित था, धर्म को वह कर्म-स्फूर्ति मानते थे और इसी कारण लाखों-करोड़ों लोगों पर अपने छाप छोड़ गये।

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