Wed. Dec 11th, 2019

महाराष्ट्र का राजनीतिक प्रहसन और जनादेश का अपहरण – शह और मात का खेल भाजपा के लिए कड़वा सबक

1 min read

“महाराष्ट्र के राजनीतिक प्रहसन और जनादेश के अपहरण से सभी पार्टियों की प्रतिष्ठा गिरी है। मौका परस्ती की राजनीति में जिस स्तर पर शह और मात का खेल खेला गया है वह लोकतंत्र के लिए घातक है। डच दार्शनिक स्पिनोजा कहते हैं कि नारी का आकर्षण कीर्ति के आकर्षण के सामने फीका है और कीर्ति का आकर्षण धन के आकर्षण के सामने तुच्छ है, किंतु सत्ता का आकर्षण इन सब आकर्षणों से बलवान है। महाराष्ट्र के घटनाक्रम ने एक बार फिर इसे सिद्ध कर दिया है।”

“सत्ता के खेल में शरद पवार के सामने देवेन्द्र फड़णवीस बहुत हलके खिलाड़ी माने जायेंगे। शरद पवार ने बहुत धैर्य से काम लिया और कोई उतावलापन प्रदर्शित नहीं किया। सीमित ओवरों के क्रिकेट मैच में एक ऐसा मौका आता है जब मंजा हुआ बल्लेबाज रन बनाने में जल्दबाजी नहीं करता और अपना विकेट और मैच बचाने के लिए धीमा स्कोर करता है और ताबड़तोड़ बल्ला नहीं घुमाता। देवेन्द्र फड़णवीस ने इस रणनीति का अनुसरण नहीं किया।”

बलबीर दत्त

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में स्पष्ट जनादेश के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी दल शिवसेना ने इसे खंडित जनादेश बना दिया। मतदाताओं ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने लायक सीटें दी थीं, लेकिन शिवसेना ने सत्ता लिप्सा में दबाव की राजनीति की सारी हदें पार कर दीं।

भाजपा के मुकाबले आधी सीटें होते हुए भी शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद की मांग कर दी। इसी में कई दिन बीत गये। इसके बाद शिवसेना ने इसमें रियायत देते हुए मुख्यमंत्री का पद आधे-आधे काल यानी ढाई-ढाई साल तक के लिए बांट देने को कहा। लोगों का ख्याल था कि उप मुख्यमंत्री पद और कुछ बड़े मंत्रालयों को झपटने के लिए यह सौदेबाजी की जा रही है, लेकिन बाद के घटनाक्रम ने इसे गलत सिद्ध कर दिया।

वादाखिलाफी की पोल खुली

शिवसेना ने भाजपा पर आरोप जड़ दिया कि वह अपने चुनाव-पूर्व वायदे से मुकर गयी है। लेकिन उसके पास इसका कोई सबूत नहीं था कि कब, किसने यह वायदा किया था। आखिर में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को सार्वजनिक तौर पर यह कहना पड़ा कि ऐसा कोई वायदा नहीं किया गया था। पारिस्थितिक साक्ष्य भी यही जाहिर करता है।

एक तो शिवसेना के नेताओं की विश्वसनीयता का स्तर पहले ही काफी कम है, दूसरे चुनाव प्रचार अभियान के दौरान मतदाताओं को बाकायदा यही जताया गया था कि चुनाव जीत जाने पर भाजपा के देवेन्द्र फड़णवीस पुन: गठबंधन सरकार का नेतृत्व करेंगे। इस आशय के बड़े-बड़े होर्डिंग व कट आउट आदि भी लगाये गये थे। जनसभाओं में भी यही जाहिर किया गया।

पिछले सप्ताह एक टीवी चैनल ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक चुनाव प्रचार सभा की रिकार्डिंग पुन: प्रसारित करते हुए यह दिखलाया कि मंच पर शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘देवेन्द्र जी’ को पुन: मुख्यमंत्री बनाने का आह्वान किया।

कई दिन तक चलने वाले चुनाव प्रचार अभियान के दौरान शिवसेना ने इसका विरोेध क्यों नहीं किया। बल्कि उसने प्रधानमंत्री मोदी की छवि का भी लाभ उठाया और अपने हर उम्मीदवार के प्रचार अभियान में पोस्टरों पर प्रधानमंत्री मोदी का फोटो भी प्रदर्शित किया।शुरू में लोगों ने शिवसेना और भाजपा के आपसी विवाद को मात्र नूरा कुश्ती समझा था, लेकिन बाद में यह भारी कड़वाहट-भरे झगड़े में परिवर्तित हो गया।

बेमेल अवसरवादी गठबंधन

आरंभ में एन.सी.पी. (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) और कांग्रेस के गठबंधन ने भी स्वीकार किया कि जनता ने सरकार गठन की जिम्मेदारी भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सौंपी है। लेकिन भाजपा ने जब शिवसेना द्वारा ईजाद किये गये 50-50 के फार्मूले को मानने से इंकार कर दिया तब शिवसेना ने सत्ता की साझेदारी के लिए एन.सी.पी. और कांग्रेस से सौदेबाजी शुरू कर दी और कई दिन तक पक रही खिचड़ी जब बनकर तैयार हो गयी तब शिवसेना ने जनादेश की मिथ्या व्याख्या करते हुए कहा कि यही जनादेश था।

प्रश्न है- क्या हारे हुए दलों को सरकार बनाने का जनादेश था? क्या बहुमत का कोई महत्व नहीं? वस्तुत: जनता ने भाजपा-शिवसेना के चुनाव-पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने का जनादेश दिया था न कि परस्पर विरोधी विचारधारा के हारे हुए दलों को मिलकर बेमेल सरकार बनाने का। इस विचित्र व अप्रत्याशित घटनाक्रम के कारण भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी राज्यपाल को साफ-साफ कह दिया कि वह संख्या-बल के अभाव में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। इसके बाद राज्यपाल ने दूसरी बड़ी पार्टी शिवसेना और बाद में एन.सी.पी. को सरकार बनाने का मौका दिया, लेकिन दोनों दल केवल मोहलत ही मांगते रहे।

एन.सी.पी. और कांग्रेस के साथ शिवसेना का गठबंधन एक बेमेल और मौका परस्त गठबंधन कहा जायेगा। यह गठबंधन कई दिन तक साझा-न्यूनतम कार्यक्रम नहीं बना पाया और कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर कोई निर्णय नहीं कर पाया। सबका यही कहना था कि यह सरकार यदि बन भी गयी तो अपने आंतरिक विरोधाभासों के कारण ज्यादा दिन नहीं चल पायेगी। भाजपा नेता नितिन गडकारी का कहना था कि यह सरकार छह-आठ महीने तक ही चल पायेगी।

भाजपा को चाहिए था कि वह साक्षी भाव से चुपचाप विपक्ष में बैठ जाती और सरकार के टूटने का इंतजार करती। लेकिन येन-केन-प्रकारेण सत्तासीन होने के लोभ में वह एन.सी.पी. विधायक दल के नेता अजीत पवार के चक्कर में फंस गयी। ऐसे समय में जबकि शिवसेना-एन.सी.पी.-कांग्रेस गठबंधन के बाकायदा साकार रूप ले लेने की घोषणा हो गयी अजीत पवार ने अपनी पार्टी के 54 विधायकों का समर्थन प्राप्त होने का दावा किया और विधायकों का हस्ताक्षर युक्त समर्थनपत्र देवेन्द्र फड़णवीस को दिया। भाजपा नेताओं को लगा कि उन्हें बैठे-बैठाये तश्तरी में परोसकर सत्ता का गिफ्ट मिल गया।

देवेन्द्र फड़णवीस ने आनन-फानन में सरकार बनाने का दावा ठोक दिया। राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश कर दी जिसे प्रधानमंत्री ने बिना केबिनेट की मीटिंग किये स्वीकार कर लिया और राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति शासन हटाने के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिये। रातों-रात इस कार्रवाई के बाद सुबह-सवेरे राज्यपाल ने राजभवन मे देवेन्द्र फड़णवीस को मुख्यमंत्री और अजीत पवार को उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। बुलेट ट्रेन की स्पीड में की गयी इस पूरी कार्रवाई को बिल्कुल असामान्य कहा जायेगा।

शातिर खिलाड़ी बनाम अनाड़ी

प्रश्न है- ऐसा क्या सोचकर किया गया होगा? शायद अजीत पवार ने यह विश्वास दिलाया कि 15-20 विधायक उनके साथ है (दो विधायक तो उनके साथ राजभवन भी पहुंचे)। शपथग्रहण हो जाने से बाकी विधायक भी उनके साथ आ जायेंगे। अंतत: यदि ऐसा हो जाता तो माना जाता कि भाजपा ने बहुत बड़ा करिश्मा कर दिखाया। लेकिन यह चाल उलटी पड़ गयी। महाराष्ट्र की राजनीति के धुरंधर नेता शरद पवार ने अपने भतीजे अजीत पवार पर परिवार के माध्यम से भारी मनोवैज्ञानिक दबाव डालना शुरू किया। इस बीच मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया जिसने बिना ज्यादा समय गंवाये विधानसभा में फ्लोर टेस्ट का आदेश दे दिया।

शरद पवार ने इससे पहले ही नवगठित गठजोड़ ‘महा विकास अघाड़ी’ के सभी दलों के विधायकों को मीडिया को सामने पेश कर पासा पलट दिया। स्पष्ट हो गया कि अजीत पवार के साथ एन.सी.पी. का कोई विधायक नहीं है। उन्होंने उप मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और पार्टी में वापस लौट गये यानी उनकी हालत ‘लौट के बुद्धू घर को आये’ वाली हो गयी। लेकिन भाजपा के बुद्धू बन जाने से उसकी प्रतिष्ठा भी गयी और साख भी।

जिस उतावले और गुपचुप ढंग से उसने सरकार बनाने का प्रयास किया उससे वह जनता की निगाह में अन्य सत्तालोभी दलों की श्रेणी में आ गयी। लंबी मशक्कत के बाद जोड़-तोड़ से बनी तिरंगी सरकार अपने आंतरिक विरोधाभासों के कारण ज्यादा दिन नहीं टिक पाती, लेकिन भाजपा की हरकत ने इस तिकड़ी को एकजुट कर दिया है और गठबंधन को मजबूती प्रदान कर दी है। भाजपा के लिए कहा जा सकता है कि उसकी जीभ भी जल गयी और स्वाद भी नहीं आया। सत्ता के अनावश्यक उतावलेपन ने उसकी किरकिरी कर दी। उसने महाराष्ट्र में चुनाव मे जो सद्भावना अर्जित की थी उसे वह गंवा बैठी।

शिवसेना की मौकापरस्ती

पिछली बार यानी 2014 में भाजपा ने महाराष्ट्र में शिवसेना से समझौता न हो पाने के कारण अकेले चुनाव लड़ा था और अच्छी-खासी सीटें प्राप्त की थी। इस बार उसने शिवसेना को तुष्ट करने के लिए कम सीटों पर चुनाव लड़ा हालांकि उसका ‘स्ट्राइक रेट’ शिवसेना के मुकाबले बहुत बढ़िया रहा। फिर भी समस्या उत्पन्न हुई। पिछली बार भाजपा ने सरकार में शामिल होने की शिवसेना की शर्ते नहीं मान कर अकेले ही शपथ-ग्रहण कर लिया था और एन.सी.पी. के अप्रत्यक्ष सहयोग से विश्वास मत प्राप्त कर लिया था। शिवसेना को मजबूर होकर भाजपा की सरकार में शामिल होना पड़ा था।

इस बार भी भाजपा यदि अकेले ही चुनाव लड़ती तो ज्यादा ठीक रहता। उसने अपने कई नेताओं को टिकट नहीं देकर उन्हें नाराज भी कर दिया। शिवसेना केंद्र और महाराष्ट्र में सरकार में शामिल रहने के बावजूद किसी विपक्षी दल की तरह भाजपा की आलोचना करती रही है। उसने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा। उसका मुखपत्र ‘सामना’ वक्त-बेवक्त भाजपा को खरोंच मारता रहा है। ऐसी दोस्ती किस काम की?

कुछ लोगों का कहना है कि राष्ट्रीय राजनीति के चाणक्य कहलाने वाले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को राजनीति के एक अन्य चाणक्य शरद पवार ने हरा दिया। लेकिन बात ऐसी नहीं लगती। चुनाव उपरांत चुनाव गठन का मामला जो बहुत सरल प्रतीत होता था, प्रदेश प्रभारी भूपेन्द्र यादव और कार्यवाहक राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के जरिये प्रदेश नेतृत्व को सौंप दिया गया था।

सत्ता के खेल में शरद पवार के सामने देवेन्द्र फड़णवीस बहुत हलके खिलाड़ी माने जायेंगे। शरद पवार ने बहुत धैर्य से काम लिया और कोई उतावलापन प्रदर्शित नहीं किया। सीमित ओवरों के क्रिकेट मैच में एक ऐसा मौका आता है जब मंजा हुआ बल्लेबाज रन बनाने में जल्दबाजी नहीं करता और अपना विकेट और मैच बचाने के लिए धीमा स्कोर करता है और ताबड़तोड़ बल्ला नहीं घुमाता। देवेन्द्र फड़णवीस ने इस रणनीति का अनुसरण नहीं किया।

अमित शाह के बारे में कहा जा सकता है कि उनके लिए संसद में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के साथ गृह मंत्रालय जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विभाग का संचालन और साथ ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी निबाहना बहुत व्यावहारिक नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ‘दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए पार्ट टाइम नहीं, फुलटाइम, बल्कि ‘ओवरटाइम’ काम करने वाला अध्यक्ष चाहिए।

शरद पवार का शातिर खेल

इस प्रकरण में इस बात की बड़ी चर्चा है कि राजनीति के घाघ खिलाड़ी शरद पवार ने पहले से तय योजना के अंतर्गत चारा डालने के लिए अपने भतीजे अजीत पवार को भाजपा के खेमे में भेजा। भाजपा जाल में फंस गयी और एक ऐसे व्यक्ति को उप मुख्यमंत्री बनाने को तैयार हो गयी जिस पर भ्रष्टाचार के कई संगीन आरोप थे। भाजपा को यदि समर्थन चाहिए था तो बड़े पवार से बात करनी चाहिए थी। शरद पवार ने एक तीर से कई निशाने साध लिये।

चुनाव में तीसरे नंबर पर आनेवाली उनकी पार्टी सत्ता की न केवल हकदार हो गयी, बल्कि उसकी डोर भी उनके हाथ में आ गयी। केंद्र राष्ट्रपति शासन हटाने पर मजबूर हो गया और सरकार गठन का दरवाजा खुल गया। अजीत पवार का शुद्धीकरण भी हो गया, जिसके साथ भ्रष्टाचार का मुद्दा भी खत्म हो गया। शरद पवार का राष्ट्रीय स्तर पर रुतबा बढ़ गया। हो सकता है यह पटकथा शरद पवार ने न लिखी हो, लेकिन इसका अंतिम परिणाम तो वही हुआ जो चर्चा में है।

शिवसेना की जहरीली वाणी

ऐसे तो पहले भी भांति-भांति के दलों की कई खिचड़ी सरकारें बनी हैं, लेकिन चुनाव उपरांत गठजोड़ से बनी बेमेल विचारधारा की सरकारें ज्यादा रोज नहीं चल पायीं। कट्टर हिंदुत्ववादी कहलाने वाली शिवसेना और सेक्यूलरवाद के नाम पर खुद को मुसलमानों का उद्धारक बतानेवाली कांग्रेस पार्टी और उनके खेमों के कार्यकर्ता और समर्थक कब तक अपने नेताओं की दलीलें हजम करते रहेंगे?

ऐसा लगता है कि हमारे देश की राजनीति में गैरत नाम की कोई चीज नहीं रह गयी। शिवसेना जो कभी पानी-पी-पीकर कांग्रेस और सोनिया गांधी को कोसती थी, अब सोनिया के नाम पर शपथ लेकर सत्ता भोगने जा रही है। मात्र दो माह पूर्व उद्धव ठाकरे ने सार्वजनिक सभा में कहा था कि राहुल गांधी को जूते मारे जाने चाहिए। शायद इसी कारण राहुल गांधी और सोनिया गांधी काफी अनुनय-विनय के बावजूद शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुए। शिवसेना की राजनीतिक समझ का यह नमूना है कि उसने मुसलमानों पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए उनका वोटिंग अधिकार छीन लिये जाने की वकालत की थी!

महाराष्ट्र में आने वाले दिन शांत और सामान्य होने की संभावना कम है। रिमोट कंट्रोल स्व. बाल ठाकरे के निवास स्थान ‘मातो श्री’ में नहीं ‘सिल्वर ओक’ में शरद पवार के हाथ में होगा। देखना यह है कि शिवसेना कितने अनुशासन में रहती है और सत्ता की मलाई के बंटवारे में सबको कैसे तुष्ट किया जाता है।

महाराष्ट्र के राजनीतिक प्रहसन और जनादेश के अपहरण से सभी पार्टियों की प्रतिष्ठा गिरी है। मौका परस्ती की राजनीति में जिस स्तर पर शह और मात का खेल खेला गया है वह लोकतंत्र के लिए घातक है। डच दार्शनिक स्पिनोजा कहते हैं कि नारी का आकर्षण कीर्ति के आकर्षण के सामने फीका है और कीर्ति का आकर्षण धन के आकर्षण के सामने तुच्छ है, किंतु सत्ता का आकर्षण इन सब आकर्षणों से बलवान है। महाराष्ट्र के घटनाक्रम ने एक बार फिर इसे सिद्ध कर दिया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

shares
error

Enjoy this blog? Please spread the word :)