Thu. Jul 2nd, 2020

पूंजी का खेल बनते साहित्यिक आयोजन

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“साहित्य आजतक जैसे आयोजनों के सच को दूर से ही बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। जब आप इन्हें करीब से देखते हैं तो इनमें चकाचैंध अधिक दिखाई पड़ती है। ऐसा भी नहीं है कि सभी साहित्यिक आयोजन इस चकाचैंध में डूबे हैं लेकिन जहां भी आवारा पूंजी लगी होगी, वहां इस बात की संभावना अधिक होगी।”

सुधांशु गुप्त

किताब अगर आंखों के बहुत ज्यादा करीब हो तो उसे पढ़ना मुश्किल हो जाता है। भारत में यदि इस समय देखा जाए तो पूरा परिवेश साहित्य से सराबोर दिखाई पड़ेगा। पल भर को आप ठिठक सकते हैं, यह सोचने को बाध्य हो सकते हैं कि जिस देश में साहित्य के प्रति समाज की इतनी गहरी आस्था है, वह देश कितना संभ्रांत और संस्कारी होगा।

उस देश के साहित्यकार कितने समृद्ध होंगे। यह नजारे देखकर आपको अपने देश के साहित्यिक समाज पर निश्चय है फख्र होने लगेगा। हमारे पूरे देश में आज उतने उत्सव नहीं मनाए जा रहे जितने सिर्फ साहित्यिक उत्सव हम हर साल मना रहे हैं।

कहां से आते हैं इतने पैसे ?

देश में हर साल लगभग 2800 साहित्यिक उत्सवों का आयोजन होता है। देश का शायद ही कोई ऐसा शहर बचा हो जिसके नाम पर उत्सव न होता हो। इन उत्सवों में अलग-अलग प्रांतों के रचनाकार शिरकत करते हैं, अपने विचार रखते हैं, कहानी पाठ, कविता पाठ, किताबों के विमोचन तो होते ही हैं, अब इन उत्सवों को सांस्कृतिक और संगीतमय भी बना दिया गया है।

इनमें कला के प्रत्येक रूप के दर्शन होते हैं। जाहिर है इन उत्सवों में लाखों करोड़ों रुपए की पूंजी भी लगती है। यह पूंजी कहां से आती है, क्यों और किस स्वार्थ के चलते यह पूंजी लगायी जा रही है, इसके सिर्फ अनुमान ही लगाए जा सकते हैं।

इन आयोजनों में पूंजी कहां खर्च की जा रही है, यह जानना भी अहम है। लेखकों को आना-जाना, ठहरना, उनका खाना पीना और कहीं-कहीं थोड़ा बहुत पारिश्रमिक। शेष पैसा आयोजन की भव्यता पर खर्च हो रहा है। इन आयोजनों से साहित्य का कितना भला हो रहा है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली में ‘साहित्य आजतक 2019’ का आयोजन हुआ।

एक न्यूज चैनल द्वारा यह पूरा आयोजन किया गया। करीब से अगर आप पूरे आयोजन पर नजर डालेंगे तो आपको लगेगा कि यह अद्भुत आयोजन था। ग्लैमर, फिल्मी हस्तियां, गायक, शायर, लेखक, प्रकाशक, प्रकाशकों के स्टॉल (तीन दिन का लगभग 30 हजार रुपए किराया), युवा लेखकों की फौज, किताबों का विमोचन…क्या नहीं था इस महाकुंभ में।

सूत्रों के अनुसार तीन दिनों के लिए लगभग 80लाख से एक करोड़ रुपए खर्च किए गये। बहुत से लोग आए और उन्होंने अपनी अपनी बातें कहीं। अगर आप नजदीक से इस आयोजन को देखेंगे तो आपको सब कुछ सुंदर ही दिखाई पड़ेगा। इस तरह के आयोजनों में सुंदरता का विशेष ख्याल रखा जाता है, ताकि अधिक से अधिक दर्शकों को लुभाया जा सके। इन आयोजनों का यह ऐसा सच है जो करीब से दिखाई पड़ता है।

लेकिन थोड़ा सा दूर हटकर तटस्थ भाव से इन आयोजनों को देखेंगे तो सच कुछ और ही दिखायी पड़ेगा। इस आयोजन में साहित्य के जो नये चेहरे दिखाई दिए उनमें फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा, भाजपा नेता और भोजपुरी अभिनेता-गायक मनोज तिवारी, कुमार विश्वास, प्रसून जोशी, मंचीय कवि हरिओम पंवार जैसे नाम थे। इन्होंने मंच से राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति के सबक दर्शकों को सिखाए।

हरिओम पंवार ने कश्मीर और धारा 370 पर 29 साल पहले लिखी अपनी कविता पढ़ी और तालियां बटोरीं। आशुतोष राणा और मनोज तिवारी का साहित्यिक कद कितना बड़ा है, यह भी हम सब जानते हैं। लेकिन इनमें पब्लिक को खींचने की क्षमताएं तो हैं ही। इस आयोजन में पंकज उदास, अनूप जलोटा और हंस राज हंस के भजन और गीत भी सुनने को मिले। दर्शकों की प्रतिबद्धता और गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। एक सेशन के दौरान एंकर ने सामने बैठी भीड़ से पूछा, आपमें से कितने लोग नामवर सिंह और कृष्णा सोबती को जानते हैं? बमुश्किल चार या पांच हाथ खड़े हुए यानी मौजूद भीड़ में से इन्हें कोई नहीं जानता था।

मकसद साहित्य से अधिक प्रचार पाना

फिर भी अशोक वाजपेयी, निर्मला जैन और गगन गिल ने सत्र पूरा किया। युवा पीढ़ी के भी अनेक रचनाकार इस मेले में थे (इसकी वजह प्रकाशक अधिक थे)। युवा कवि और पटकथा लेखक वरुण ग्रोवर ने जरूर मीडिया को लेकर कुछ बेबाक बातें कीं। इस आयोजन में सब कुछ था-मनोरंजन, ग्लैमर, फिल्म, गीत संगीत, गजलें, शायरी, राष्ट्रप्रेम, देश भक्ति-नहीं था तो बस साहित्य। एक और विसंगति यह भी है कि अगर साहित्य आजतक के आयोजक न्यूज चैनल की प्राथमिकता में साहित्य सचमुच ऊपर के पायदान पर है तो यही चैनल साहित्य का कोई साप्ताहिक प्रोग्राम क्यों नहीं शुरू कर देता?

मूल प्रश्न वही है, अगर किसी आयोजन में बड़ी पूंजी का निवेश हो रहा है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि उनका मकसद साहित्य से अधिक प्रचार पाना है। इसलिए इस तरह के आयोजनों के सच को दूर से ही बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। जब आप इन्हें करीब से देखते हैं तो इनमें चकाचैंध अधिक दिखाई पड़ती है। ऐसा भी नहीं है कि सभी साहित्यिक आयोजन इस चकाचैंध में डूबे हैं लेकिन जहां भी आवारा पूंजी लगी होगी, वहां इस बात की संभावना अधिक होगी।

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