Wed. Oct 28th, 2020

शहीदों के लिए थोड़ा ईमानदार हो जाएं

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सरकारें बदलती हैं, सत्ता का चरित्र नहीं। यही वजह है कि लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है। अन्ना आंदोलन के दौरान यह गुस्सा चरम पर था। फिर जनआंदोलन ऐसी सियासत में तब्दील हुआ कि उस सामूहिक गुस्से की हवा निकल गई।

सुधीर मिश्र; 20.02.2019

अकबर इलाहाबादी का शेर है-
कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ
कुछ महीने पहले नगालैंड जाना हुआ। एक ऐसा राज्य जहां बरसों से अलगाववाद पसरा है। हमारे देश के सरकारी कर्मचारी अलगाववादी संगठनों को टैक्स भरते हैं। अपने वेतन से। वहां के सबसे बड़े होटल में एक मित्र ने खाना खाने के लिए आमंत्रित किया। देखकर ताज्जुब हुआ कि वहां लोग बीयर और शराब का लुत्फ खुलेआम ले रहे थे। चौंकने वाली बात इसलिए थी कि राज्य में शराबबंदी है और शराब की बोतल पर लिखा था, सिर्फ सेना के इस्तेमाल के लिए, बिक्री के लिए नहीं।

इससे भी ज्यादा हैरतअंगेज यह कि होटल राज्य के सबसे जिम्मेदार नेता का बताया गया। आप सोच रहे होंगे कि इस घटना का प्रसंग क्या है?
दरअसल, पुलवामा आतंकी हमले के बाद हम आप सभी बहुत दुखी हैं। इस हद तक कि एक-दूसरे पर भी गुस्सा निकाल रहे हैं। तुमने डीपी क्यों नहीं बदली या मोमबत्ती क्यों नहीं जलाई? राष्ट्रवाद के प्रकटीकरण के तरह-तरह के बिम्ब सामने आ रहे हैं। नाराजगी इस हद तक है कि पाकिस्तान पर हमला करके तुरंत नेस्तनाबूद कर देने की बात हो रही है।

अमेरिका का उदाहरण दिया जा रहा है कि कैसे कड़ाई से उन्होंने 9/11 घटना के बाद आतंकवाद पर काफी हद तक काबू पा लिया, पर वहां कानून पूरी सख्ती से हरेक पर लागू होता है। अब वापस आते हैं नगालैंड पर। आजादी के बाद से अब तक वहां हमेशा अलगाववादियों की समानान्तर सरकार चल रही है। दिल्ली से हजारों करोड़ रुपयों का बजट हर साल सेहत, सड़क और डेवेलपमेंट के नाम पर वहां जाता है। इसमें से ज्यादातर की बंदरबांट अलगाववादियों, राजनेताओं, सरकारी बाबुओं और सेना-सुरक्षा बलों से जुड़े कुछ भ्रष्ट बड़ों के बीच होती है। ये सब खुल्लमखुल्ला है।

70 से है यह हालात
ऐसे ही हालात उत्तर पूर्व के कुछ राज्यों व कश्मीर में सत्तर साल से हैं। हर सरकार कूटनीति के नाम पर ब्यूरोक्रेसी के सुझाए टालू तरीकों से बस इस कोशिश में रहती है कि हालात और ज्यादा न बिगड़ें। कुछ ऐसा ही मिलता जुलता हाल देश के बाकी राज्यों में भी है। सरकारें बदलती हैं, सत्ता का चरित्र नहीं। यही वजह है कि लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है। अन्ना आंदोलन के दौरान यह गुस्सा चरम पर था। फिर जनआंदोलन ऐसी सियासत में तब्दील हुआ कि उस सामूहिक गुस्से की हवा निकल गई। भ्रष्टाचारी काकस फलता-फूलता रहा। पुलवामा हमले की जांच इमानदारी से होने दीजिए।

यही सामने आएगा कि कोई अपना बेईमान बहादुर जवानों की मौत का कारण बना। लोग समझ नहीं रहे कि पाकिस्तान की कोई औकात नहीं। बशर्ते, हमारे देश के भ्रष्ट लोग उनके साथ मिले न हों। कंधार हाइजैक में भी भीतर के लोगों की मिलीभगत थी। अब सवाल यह कि आखिर हम क्या करें? जवाब यह है कि कोई सरकार तब तक आपके प्रति पूरी तरह से इमानदार नहीं हो सकती, जब तक समाज खुद इमानदार व सच्चा न हो। गरम रजाई के भीतर से फेसबुक व ट्विटर पर वीर रस उड़ेलते रहने से कुछ होने वाला नहीं। शुरुआत छोटे बदलावों से होगी।

यहां इमानदारी जरूरी
तय कीजिए कि सैनिकों, सुरक्षा बलों से जुड़े किसी भी काम में हम घूस कमिशन नहीं लेंगे। उनको मिलने वाला मुआवजा पूरे का पूरा उन तक पहुंचने देंगे। उनकी फाइलें नहीं लटकाएंगे। जवानों के सीमा पर रहने पर उनकी जमीनों पर कब्जा नहीं करेंगे। धरने-कैंडल मार्च में फोटो खिंचवाने की बजाय किसी एक शहीद के घर जाकर जो संभव मदद होगी, वह करेंगे। कुछ ऐसा करना आपके हाथ में है। दूसरे देश को नेस्तनाबूद करना और एटम बम फोड़ना सेना-सरकार का काम है। उसके लिए काफी कुछ सोचना और विचारना पड़ता है। आप रोक सकते हैं तो कम से कम नकली प्रमाणपत्र बनना रोकें। घूस देकर आतंकवादियों के भी आधार कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट इस देश में बनते रहे हैं, इन्हें रोकिए। पर इस तरह से सोचना आसान नहीं। बात खत्म नरेश कुमार शाद के इस शेर के साथ-
महसूस भी हो जाए तो होता नहीं बयां
नाजुक सा है जो फर्क गुनाह हो सवाब में

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