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परिवार से दूर, तनहाइयों में गुजरा लालू का जन्मदिन

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राणा गौतम 12.06.2019

रांची : एक समय यह जुमला खूब जोरों पर था, जब तक समोसे में आलू तब तक बिहार में लालू..। लालू प्रसाद एक ऐसी शख्सियत का नाम है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं। आज वही लालू प्रसाद अपने परिवार वालों से दूर हैं। मंगलवार को रिम्स के पेईंग वार्ड की तनहाइयों में उनका 72वां जन्मदिन गुजरा। रिम्स के सूत्र बताते हैं कि बर्थ डे को लेकर कोई धमा-चौकड़ी नहीं। कुछ समर्थक जरूर आये, मगर वे लालू से नहीं मिल पाये। लालू से सप्ताह में एक ही दिन शनिवार को मुलाकात की इजाजत जेल प्रशासन ने दी है।

चारा घोटाले के चार मामलों में सजायाफ्ता लालू रिम्स में इलाजरत हैं। वह कई बीमारियों से जूझ रहे हैं। राजद की गिरती राजनीतिक साख, खुद की बीमारी और बेटे तेजप्रताप यादव की तलाक की अरजी से कभी न टूटने और झुकने वाला यह शख्स परेशान हाल में अब नजर आ रहा है। हालांकि लालू के समर्थकों का कहना है कि लालू प्रसाद एक विचारधारा हैं। विचारधारा न कभी टूटती है, न कभी झुकती है। लालू को नजदीक से जानने वाले अनिल सिंह आजाद कहते हैं : इंसान के जीवन में ऊंच-नीच लगा रहता है। मगर, लालू प्रसाद एक ऐसे शख्स हैं, जो किसी भी आंधी को संभालने की ताकत रखते हैं। भले ही साजिश के चलते वह जेल के अंदर हैं, मगर वह सामाजिक क्रांति के लाखों हिमायतियों के लिए हमेशा प्रेरणा श्रोत बने रहेंगे।

दो धूरी पर रहे हैं लालू

यह विवंडना रही है कि लालू प्रसाद हमेशा राजनीति की दो धूरी पर रहे हैं। एक ओर उन्हें गरीब-गुरबों का मसीहा मानने वालों की संख्या लाखों में है, तो दूसरी ओर राजनीति में भ्रष्टाचार के वह केंद्रबिन्दु में भी रहे हैं। लालू प्रसाद को चाहने वाले लोगों का कहना है कि देश की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था में उनके योगदान को कमतर आंकना एक बड़ी भूल होगी। लालू ने पिछड़े तबके के लोगों को संवल दिया और ऐसे तबके को उन्होंने अपनी ताकत का अहसास कराया। वह सामाजिक क्रांति के सबसे बड़े झंडादार बने। यह लालू का ही कमाल था कि बिहार जैसे राज्य में उन्होंने पिछड़ों को अगड़े के मुकाबले खड़ा होने का साहस दिया। वहीं, लालू के विरोधियों का कहना है कि सामाजिक क्रांति के बहाने लालू ने सिर्फ अपने वोटबैंक का दायरा बड़ा किया। वह सत्ता और राजनीति का बेजा इस्तेमाल करने में हिचके नहीं।

अस्तित्व का सवाल

लालू प्रसाद ने तनहाइयों के बीच अपना बर्थडे मंगलवार को मनाया। लालू को लेकर राजनीतिक पंडितों का कहना है कि गुजरते वक्त के साथ अब लालू के समक्ष अस्तित्व का सवाल मुंह बाये खड़ा है। न्यायिक व्यवस्था में उन्हें कब राहत मिलेगी, इसे लेकर कोई भी पूरे इत्मिनान के साथ कह नहीं सकता है। सजायाफ्ता होेने के चलते वह चुनावी राजनीति से दूर हो चुके हैं। ऐसे में उनकी आशा के केंद्रबिन्दु में पुत्र तेजस्वी यादव हैं। लालू को चाहने वाले लोगों का कहना है कि विचारधारा कभी मरती नहीं है। लालू का विरासत संभालने के लिए पुत्र तेजस्वी यादव राजनीतिक रूप से परिपक्व हो चुके हैं।

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