April 18, 2021

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दोहरे मापदंड और दायित्वहीनता की पत्रकारिता, पश्चिमी मीडिया का भारत-विद्वेष, वर्षों से जारी एक अघोषित अभियान

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बलबीर दत्त; 19.05.2019

भारत की आजादी के समय से ही ब्रिटिश व अमेरिकी मीडिया के एक बड़े वर्ग का रुख भारत के प्रति उपेक्षापूर्ण और विद्वेषपूर्ण रहा, जिसके यहां कई दृष्टांत प्रस्तुत हैं। कश्मीर समस्या पर तो उसका रुख पाकिस्तानपरस्त रहा ही। वर्ष 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रसंघ महासभा में एक महत्वपूर्ण भाषण दिया जिसकी कोई झलक भी अमेरिकी मीडिया में नहीं दिखी। वहीं उसी मंच से बोलने वाले पाकिस्तानी तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ अमेरिकी मीडिया में छाये रहे, वह भी भारत-विरोधी भाषण के साथ।

भारत में लोकसभा के आम चुनाव पर सारी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। दुनिया भर के समाचारपत्र इस चुनाव का विश्लेषण-विवेचन कर रहे हैं। कुछ जाहिरी कारणों से पश्चिम, विशेषत: ब्रिटेन व अमेरिका, का प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्वयं को इस मामले में ज्यादा जानकार व प्रामाणिक रूप से लिखने-बोलने का अधिकारी समझता है।

मोदी हटाओ, राहुल लाओ
विगत सप्ताह ब्रिटिश आर्थिक साप्ताहिक ‘दि इकॉनॉमिस्ट’ और अमेरिकी मासिक पत्रिका ‘टाइम’ ने भारत के चुनावों के बारे मे मोदी-केंद्रित सामग्री प्रकाशित की। ये दोनों प्रकाशन काफी चर्चा में आ गये। ‘टाइम’ ने तो मोदी को चौथी बार अपनी आवरण-कथा का विषय बनाया है। ये दोनों पत्रिकाएं हमारे देश के नीति-निर्धारकों द्वारा पढ़ी जाती हैं और वे कुछ हद तक इनसे प्रभावित भी होते हैं, क्योंकि गौरांग महाप्रभुओं की गुलामी झेलते-झेलते हम अभी भी अपनी मानसिक गुलामी से मुक्त नहीं हो पाये हैं। इसलिए पश्चिमी मीडिया में जो छपता है उससे स्वयं को बुद्धिजीवी समझने वाले हमारे कई देशवासी कुछ जल्दी ही प्रभावित हो जाते हैं।

‘दि इकॉनामिस्ट’ ने भारतीय मतदाताओं को 2014 की तरह एक बार फिर यह सलाह दी है कि वे कांग्रेस पार्टी को जितायें यानी मोदी की पार्टी भाजपा को हरायें। सामान्यत: कोई स्वतंत्र व मर्यादाशील अखबार किसी दूसरे देश के मतदाताओं को इस आशय की कोई सलाह नहीं देता कि वे किसे वोट दें और किसे नहीं दें। चलिये, अभिव्यक्ति की कथित स्वतंत्रता के नाम पर इसे सहन कर लिया जाये और इसे मुद्दा बनाने की कोई जरूरत नहीं समझी जाये। लेकिन बिन-मांगी सलाह देने वाले और अपने अखबार को ग्लोबल मानने वाले किसी महापंडित से यह तो अपेक्षा की ही जाती है कि वह अपनी सलाह निर्लिप्त भाव से दे, जो तथ्यात्मक होने के साथ विश्वासयोग्य भी हो। ‘दि इकॉनमिस्ट’ ने भारत के लोगों को यह भी समझाया है कि मोदी की सरकार की बनिस्बत राहुल गांधी के नेतृत्व में केंद्र में एक मिली-जुली सरकार उनके राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगी।

ब्रिटिश उपनिवेशवादी अहंकार
दूसरी ओर ‘टाइम’ की कवर स्टोरी के पाकिस्तानी मूल के ज्ञानी-ध्यानी लेखक आतिश तासीर ने अपने लेख को , जो पूर्वाग्रह और दुराग्रह से ग्रस्त है और अधकचरी जानकारी पर आधारित है, अपने नाम के अनुरूप आतिशबाजी वाला इकबाल प्रदान करने का प्रयास किया है। उनके लेख का सार-तत्व क्या है, यह कवर स्टोरी के टाइटल ‘डिवाइडर-इन-चीफ’ यानी ‘विभाजनकारियों का सरदार’ से ही जाहिर हो जाता है।

ये दोनों प्रसंग अपने आप में कोई इक्के-दुक्के प्रसंग नहीं हैं। इन्हें ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। अगर आप किसी अंग्रेज को, विशेषत: पुरानी पीढ़ी के किसी अंग्रेज को, कुरेदिये तो आपको महसूस होगा कि उसके अंदर भारत को, जो कभी उनके विस्तृत साम्राज्य का सर्वाधिक दीप्तिमान मणि था, खो देने की पीड़ा है। इस तरह की पीड़ा स्वयं को शासक वर्ग समझने वालों को ज्यादा होती है, आम नागरिकों को नहीं। दो देशों के बीच बदलती परिस्थितियों में कूटनीतिक और व्यावहारिक कारणों से बनने वाले रिश्ते अपनी जगह पर हैं, पर गहरी जड़ें जमाये हुए किसी सोच में आंतरिक बदलाव जल्दी नहीं होता।

यह ब्रिटिश अहंकार का ही नमूना है कि 100 साल बीत जाने पर भी वह जलियांवाला बाग कत्लेआम के लिए माफी मांगने को तैयार नहीं। आप यदि उनसे कोहिनूर हीरा वापस लौटाने की बात चलायें तो वे कहेंगे कि यह आपका नहीं, हमारा है। हमें महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारी दिलीप सिंह से गिफ्ट में मिला था। तथ्य यह है कि एक 11- वर्षीय नाबालिग को मजबूरन यह हीरा महारानी विक्टोरिया को सौंपना पड़ा था। फिर भी अंग्रेज इसे एक विधिसम्मत ‘भेंट’ मानते हैं। अंग्रेजों की नैतिकता और विधि-नियम पालनशीलता के दोहरे मापदंड का यह एक नमूना है।

अंग्रजो भारत लौटो!
जहां तक अमेरिका की बात है, अमेरिका कभी स्वयं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का शिकार था। लेकिन उसके बाद अब एक आंग्ल-अमेरिकी गुट ((Anglo American bloc)) बन चुका है। किसी समय दुनिया भर में ब्रिटेन की तूती बोलती थी, अब अमेरिका की तूती बोलती है। हमारे देश के गुलाम मानसिकता के जो लोग पहले ब्रिटेन के दीवाने थे, अब अमेरिका के दीवाने हैं। अमेरिका और ब्रिटेन दोनों के सुर ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की शैली पर एक ही मीटर बैंड पर आकर मिलते हैं। अमेरिका को यदि अफगानिस्तान या इराक पर हमला करना हो तो समझिए कि ब्रिटेन का साथ पक्का है, अन्य किसी देश का हो या नहीं।

अब आंग्ल-अमेरिकी मीडिया के सुर-ताल की बात की जाये। वर्ष 1947 में ब्रिटिश हुक्मरानों को भारत जैसा महादेश जिस विवशता में छोड़ना पड़ा वह सबको मालूम है। चर्चिल जैसे कट्टर भारत-विरोधी राजनेता का यह कहना था कि अंग्रेजों के भारत छोड़ते ही वहां अराजकता मच जायेगी। कुछ ऐसे विपरीतदर्शी गौरांग महाप्रभु भी थे जो यह सोचते थे कि अराजकता तो मचनी ही है, भारत के लोग उनसे अनुरोध करेंगे कि आप आइये और फिर से राज चलाइये। इस बात का उल्लेख इसलिए किया जा रहा है ताकि एक ब्रिटिश दैनिक में आजादी के तत्काल बाद प्रकाशित एक विचित्र समाचार को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके।

हुआ यह कि भारत की आजादी के बाद मेरठ छावनी में काफी बड़ी संख्या में मौजूद ब्रिटिश सैनिकों को ब्रिटेन वापस भेजने की प्रक्रिया आरंभ की गयी। इन फौजियों को दिल्ली में रुक कर बंबई की ट्रेन पकड़नी थी और वहां से समुद्री जहाज से ब्रिटेन के लिए रवाना हो जाना था। इन्हें छूट दी गयी थी कि वे इस अवधि में कनाट प्लेस में शापिंग कर सकते हैं। लंदन के एक टेब्लायड। (सांध्य दैनिक) के दिल्ली में पदस्थापित संवाददाता ने, अचानक कनाट प्लेस पहुंचने पर देखा कि वहां बड़ी संख्या में ब्रिटिश सैनिक मौजूद हैं। उसने आव देखा न ताव, तुरंत अपने होटल में लौटकर लंदन में अपने अखबार को सूचना दी। संवाददाता ने जो समाचार भेजा उसका शीर्षक इस प्रकार छपा- India’s 10-day old Independence in peril, British troops called out.

(भारत की 10 दिन पुरानी आजादी संकट में, ब्रिटिश सैनिकों को बुला लिया गया।)
देश के बंटवारे के साथ ही कई जगहों पर दंगे-फसाद छिड़ गये थे। ऐसी अवस्था में लंदन में बैठे समाचार संपादक ने भी शायद सोचा होगा कि ‘फील्ड’ से भेजा गया यह समाचार सही होगा। यह उसके लिए खुशफहमी-का भी कारण रहा होगा।

यह दृष्टांत इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि हमारे देश में बहुत से लोगों को इस बात की गलतफहमी है कि पश्चिमी देशों के अखबार बड़े जिम्मेदाराना ढंग से चलते हैं।

सनसनीखेज, अप्रामाणिक खबरें
इस प्रसंग में एक दिलचस्प किस्सा है। बात 1980 के दशक की है। रांची में सेंट्रल कोलफील्डस में मुख्य जन संपर्क अधिकारी के रूप में कार्यरत प्रभाकर भट्ट ने ‘बी.बी.सी.’ (ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कोरपोरेशन लंदन) की हिंदी सेवा में कार्यभार ग्रहण किया था। उन दिनों बीबीसी से एक साप्ताहिक कार्यक्रम प्रसारित होता था- ‘ब्रिटिश समाचारपत्रों में भारत की चर्चा।’ इसमें ब्रिटिश समाचारपत्रों में भारत से संबंधित समाचारों, लेखों, टिप्पणियों आदि का उल्लेख रहता था। श्री भट्ट ने बताया कि सेवाग्रहण के शुरुआती दौर में जब उन्हें अगले सप्ताह के लिए यह कार्यक्रम तैयार करने को कहा गया तो उनके टेबल पर अन्य अखबारों के अतिरिक्त सांध्य दैनिक देखकर प्रसारण सेवा के अंग्रेज मुखिया ने कहा- ‘मिस्टर भट्ट, इस कार्यक्रम के लिए सांध्य दैनिक अखबारों का कोई उल्लेख नहीं करना है। इनकी कोई सामग्री नहीं लेनी है, क्योंकि इनके समाचारों की कोई प्रामाणिकता या विश्वसनीयता नहीं होती। ये हर समाचार को सनसनीखेज बनाने का प्रयास करते हैं।’

ब्रिटेन में ब्राडशीट साइज में प्रात:कालीन अखबार ‘क्वालिटी’ अखबार कहलाते हैं और टेब्लाएड साइज में सांध्यकालीन अखबार ‘पापुलर’ अखबार कहलाते हैं। इनमें उल्लेखनीय हैं ‘डेली मेल’, ‘डेली मिरर, डेली स्टार’, ‘डेली एक्सप्रेस’, ‘दि सन’, ‘टुडे’ आदि। इनका सरकुलेशन अच्छा-खासा है। मसलन ‘डेली मेल’ (1856 में स्थापित) का सरकुलेशन 12 लाख से अधिक है। इससे भी अधिक सरकुलेशन के अखबार हैं। ‘डेली मेल’ के विषय में लॉर्ड राबर्ट सेसिल ने कहा था- Newspaper for office boys, written by office boys (दफ्तर के नौकरों द्वारा, दफ्तर के नौकरों के लिए लिखा गया अखबार)।

न्यूज एजेंसी को किया शर्मिंदा
अब अमेरिका का नजारा देखा जाये। यह बात भी आजादी के कुछ दिन बाद की है। पाकिस्तान में भीषण दंगों की प्रतिक्रिया में दिल्ली में दंगे छिड़ चुके थे। एक दिन 26 लोग मारे गये। दो-तीन जगह आगजनी हुई। लेकिन अमेरिकी दैनिक ‘शिकागो टाइम्स’ (Chicago Times) में रायटर न्यूज एजेंसी के हवाले से समाचार छपा – Delhi is a sea of flames with blood gushing down the gutter. (दिल्ली नगर बन गया है आग की लपटों का सागर, खून बह निकला है नालियों में)। इस समाचार के प्रकाशन पर पंडित नेहरू और लार्ड माउंटबेटन चिंतित हो गये। एक सूचना अधिकारी ने रायटर के दिल्ली संवाददाता को बुला भेजा। उसे अखबार की कापी दिखायी गयी (उन दिनों किसी देश के महत्वपूर्ण समाचार भारतीय दूतावासों के माध्यम से विमान सेवा से दिल्ली पत्र पहुंचाये जाते थे।) रायटर के संवाददाता ने समाचार पत्र पढ़ने के बाद कहा कि यह मेरे द्वारा लंदन भेजे गये समाचार से बिल्कुल मेल नहीं खाता। उसने अपने समाचार की कापी दिखायी। बाद में रायटर द्वारा की गयी छानबीन से पता चला कि रायटर के उत्तर अमेरिका डेस्क पर कार्यरत प्रभारी कर्मचारी को लगा कि प्राप्त समाचार नीरस है। उसने एक दैनिक में अतिरंजित रूप से सनसनीखेज ढंग से दिल्ली के दंगे पर प्रकाशित समाचार को रायटर के नाम से जारी कर दिया, जो अमेरिका और कनाडा के कई अखबारों में छप गया। अब आप समझ लीजिये अंतरराष्ट्रीय स्तर की न्यूज एजेंसी के स्टाफ की दायित्व भावना का स्तर। रायटर को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा।

पाकिस्तान -परस्त, भारत-विरोधी मीडिया
अमेरिका और ब्रिटेन में भारत के संबंध में नकारात्मक समाचार भारत की आजादी से पहले और वर्षों बाद भी छपते रहे हैं। भारत को एक पिछड़ा, गरीब, अंधविश्वासी देश के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। उसका मजाक भी उड़ाया जाता रहा है। लोगों को सकारात्मक समाचार जानने के लिए खोज-बीन की आवश्यकता पड़ती रही है। धीरे-धीरे स्थिति में सुधार हुआ। भारत की स्थिति मजबूत हुई, लेकिन पूर्वाग्रह किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान है। पचास व साठ के दशक में कश्मीर समस्या पर ब्रिटिश व अमेरिकी अखबारों ने अक्सर पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया। उन्होंने एक लोकतांत्रिक देश के बजाय एक और तानाशाह कट्टरवादी मजहबी देश को समर्थन प्रदान किया।

1965 के भारत और पाक युद्ध के बाद ब्रिटेन के अपने अनुभवों पर शशि मित्तल (‘धर्मयुग’ 20 जनवरी 1966) ने लिखा- ‘यह तो सर्वविदित है कि ब्रिटेन की तमाम सरकारी मशीनरी तथा समाचारपत्रों एवं टेलीविजन ने इस युद्ध के समय प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तौर पर पाकिस्तान का साथ दिया। कुछ बुद्धिजीवियों और विद्यार्थियों ने भारत का नैतिक साथ दिया। लेकिन अखबारों और टेलीविजन के कारण जनता की जो विचारधारा बनी वह बड़ी खेदजनक थी। कुछ लोगों का कहना था कि भारत गरीबों का देश है, वह दूसरों के दिये पर खाता है, और फिर झगड़ा करता है।’ शशि मित्तल ने तथ्यों से समझाया कि भारत ब्रिटेन पर कतई निर्भर नहीं है। साथ ही यह भी कहा कि आप अपने बड़े-बूढ़ों से पूछें तो वे बतायेंगे कि विश्व युद्ध के समय ब्रिटेन में डबल रोटी का चूरा तक बिकता था। धन से गरीब देश को मन से गरीब न होने का पाठ चर्चिल ने भी सिखलाया था। कुछ और लोगों का कहना था कि यह झगड़ा हिंदू और मुसलमानों का झगड़ा है और क्योंकि लाल बहादुर शास्त्री कट्टर हिंदू हैं, उन्होंने मौका देखकर झगड़ा शुरू कर दिया! एक अखबार ने तो यहां तक छाप दिया कि यह सूअर और गाय की लड़ाई है, वे हमेशा लड़ते आये हैं और लड़ते रहेंगे।

मानवाधिकार हनन के दोहरे पैमाने
इसका उल्लेख यहां इसलिए किया गया है ताकि भारत की वर्तमान पीढ़ी को यह पता चले कि पश्चिम के कई अखबार क्या कारस्तानी करते रहे हैं और करते आ रहे हैं।
1971 के भारत-पाक युद्ध में अमेरिकी अखबारों ने प्रारंभ में पाकिस्तान का ही साथ दिया। अमेरिकी अखबारों को अपनी सरकार की तरह पाकिस्तान से काफी इश्क रहा है, जो अब टूटना शुरू हुआ है।

2002 में गोधरा कांड की प्रतिक्रिया में गुजरात में छिड़े सांप्रदायिक दंगों पर अमेरिकी अखबारों ने मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की छवि धूमिल करने का जो पुरजोर अभियान चलाया था, वह सर्वविदित है। इन्हीं अखबारों ने 1984 में सिखों के कत्लेआम पर कोई तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। मोदी को अमेरिका का वीजा नहीं मिले इसके लिए भी पूरा प्रयास किया गया। भारत में छिट-पुट घटनाओं पर मानवाधिकारों के हनन का रोना रोने वाले अमेरिकी अखबार अपने देश में अमेरिका के मूलवासी रेड इंडियंस पर होने वाले अत्याचारों और रंगभेद समस्या, अश्वेतों से भेदभाव, के कारण बार-बार होते रहने वाले उपद्रवों पर अपना नजरिया बदल देते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के समय अगस्त 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर एटम बम गिरा कर 2 लाख से अधिक निर्दोष नागरिकों को मौत की नींद सुला देने और हजारों को जीवन भर के लिए अपंग बना देने वाले अमेरिका और उसके अखबारों को इस कारस्तानी पर मानवाधिकार हनन होने का कोई अहसास नहीं हुआ।

BBC पर इंदिरा गांधी की हत्या की धमकी
कुछ इसी तरह के दोहरे मापदंड स्वयं को दुनिया की सबसे बड़ी और स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रसारण संस्था मानने वाले बी.बी.सी. द्वारा भी अपनाये जाते रहे हैं। बी.बी.सी. ने वर्ष 1985 में ब्रिटेन से अलगाव की मांग करने वाले उत्तरी आयरलैंड के उग्रवादी संगठन आयरिश रिपब्लिकन आर्मी के कमांडर से लिये गये साक्षात्कार का प्रसारण तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के निर्देश पर रोक दिया। इसका कारण यह बताया गया कि इसके प्रसारण से आतंकवाद को बल मिलेगा। लेकिन इसी बी.बी.सी. ने गंगा सिंह ढिल्लों और जगजीत सिंह चौहान जैसे चरमपंथियों के लिए अपने दरवाजे खुले रखे।

चौहान को तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर देने की बात प्रसारित कर देने की सुविधा भी प्रदान की गयी। बी.बी.सी. ने पंजाब से अलगाव की मांग करने वाले ब्रिटेन में रहने वाले, खालिस्तानी सिखों को अपने विचार प्रसारित करने की सुविधा हमेश दी। श्रीमती थैचर तब भी प्रधानमंत्री थीं, जब जगजीत सिंह चौहान ने बी.बी.सी. के माध्यम से कहा था कि भारतीय प्रधानमंत्री की हत्या कर दी जायेगी। परंतु इसे आतंकवाद को प्रोत्साहन देना नहीं माना गया। आयरिश रिपब्लिकन आर्मी के नेता ने तो किसी व्यक्ति की हत्या की बात भी नहीं कहीं थी तब भी उसका साक्षात्कार प्रसारित नहीं किया गया। श्रीमती गांधी की हत्या पर जब लंदन की सड़कों पर कुछ लोगों ने जश्न मनाया तो ब्रिटेन के टेलीविजन पर जश्न मनाने के दृश्य दिखाये गये। यह क्या प्रदर्शित करता है?

हद तो तब हो गयी जब बी.बी.सी. ने कश्मीर की चरारे शरीफ दरगाह में पाक-प्रशिक्षित उग्रवादियों से भारतीय सेना के मुकाबले को एक अत्याचार के रूप में दिखाने के लिए रूसी सेना द्वारा चेचेन्या में की गयी सैनिक कार्रवाई के दृश्य को शामिल कर दिया। असलियत पकड़ाई में आने पर बीबीसी को माफी मांगनी पड़ी। भारत के लोग यह सोच भी नहीं सकते कि बी.बी.सी. जैसी संस्था इस प्रकार का छल-कपट कर सकती है।

अमेरिकियों की निगाह में मीडिया कितना विश्वसनीय?
पश्चिमी देशों के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में यह आम शिकायत है कि वे विकासशील देशों की पॉजिटिव व विकास-संबंधित खबरों को कोई अहमियत नहीं देते। उनका ध्यान नेगेटिव खबरों पर ज्यादा रहता है। वर्ष 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रसंघ महासभा में एक महत्वपूर्ण भाषण दिया। इसकी झलक भी अमेरिकी मीडिया में नहीं दिखी। ताज्जुब की बात यह कि उसी मंच से बोलने वाले पाकिस्तानी तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ मीडिया में छाये रहे, वह भी भारत-विरोधी भाषण के साथ। इससे पूर्व 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण पर अमेरिका और उसके मित्र देशों द्वारा भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगाये जाने की जब कोई परवाह प्रधानमंत्री वाजपेयी ने नहीं की तब अमेरिका और वहां के ‘स्वतंत्र’ कहलाने वाले मीडिया की भारत के विरुद्ध महीनों जारी बौखलाहट हास्यप्रद हो गयी। यहां तक कि भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार द्वारा भारत का मनोबल तोड़ने का भी प्रयास किया गया, लेकिन कुछ हुआ नहीं। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई के नाम पर अमेरिका से करोड़ों-अरबों डॉलर ऐंठने वाला पाकिस्तान अमेरिका को लगातार झांसा देता रहा। वर्षों बाद अमेरिकी सरकार और वहां के मीडिया की आंखें खुलीं।

भारत के एक शक्तिशाली राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर होने के कारण स्थिति में काफी परिवर्तन हुआ है, लेकिन अमेरिकी मीडिया के भारत-विद्वेष और कथित हिंदुत्ववादी शक्तियों के प्रति असहिष्णुता में उस अनुरूप अंतर नहीं आया है।

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी मीडिया के बारे में खुद अमेरिकी लोगों की धारणा अच्छी नहीं। कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका के एक प्रमुख अखबार ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ ने अमेरिकी प्रेस के बारे में जनता की धारणा जानने के लिए एक राष्ट्रव्यापी जनमत सर्वेक्षण कराया। करीब 40 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके विचार में जनसंचार के लोग अपनी उत्तरदायित्वहीनता द्वारा अपनी महान शक्ति का दुरुपयोग करते हैं। करीब 20 प्रतिशत ने कहा कि मीडिया के अनुचित आचरण से निपटने के लिए सरकार को कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। चार में से केवल एक ने कहा कि मीडिया तत्वता नीतिपरक या नैतिक है। तीन में से एक ने कहा कि हम समाचारों को निष्पक्ष ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

वैसे मीडिया के आचरण की स्थिति भारत में भी अच्छी नहीं है, लेकिन इस लेख का विषय पश्चिमी मीडिया है जिसके प्रति भारत के बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में बड़ी दीवानगी है, जबकि असलियत यह है कि स्वयं को बड़ा तीसमारखां समझने वाला कोई भी पश्चिमी मीडिया भारत में मतदान या मतदाताओं को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है।

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