May 11, 2021

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जामुन ने इस बार मधुमेह पीड़ितों को किया निराश

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नयी दिल्ली : मधुमेह के उपचार के लिए रामबाण माने जाने वाले जामुन ने इस साल जलवायु परिवर्तन के प्रकोप के कारण लोगों को निराश किया है। इस बार जामुन की फसल बहुत से स्थानों पर अच्छी नहीं हुई , कहीं-कहीं पर तो एक भी फल नहीं आया। वैसे भी जामुन सभी जलवायु में समान रूप से नहीं फलते हैं। कहीं फसल अच्छी होती है और कहीं बिल्कुल भी फल नहीं आते हैं।

केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान के अनुसार जलवायु परिवर्तन का असर जामुन के फसल पर इस बार पड़ा। जनवरी से लगातार हो रही बारिश ने अधिकतर पेड़ों में फूल की जगह पत्तियों वाली टहनियों को प्रेरित किया। आमतौर पर जाड़े का मौसम कुछ ही दिन में खत्म हो जाता है। मौसम के आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि जाड़े की ऋतु के बाद तुरंत तापमान के बढ़ जाने से जामुन में बहुत से स्थान पर फूल नहीं आए।

सावंतवाड़ी जो कि कोंकण क्षेत्र में स्थित है, जामुन के लिए मशहूर है परंतु इस वर्ष किसानों को फल ना लगने से परेशानी का सामना करना पड़ा। बहुत से नए उद्यमी जिन्होंने जामुन के संबंधित पदार्थ बनाने में प्रवीणता हासिल की है, फल उपलब्ध न होने के कारण काफी हताश हुए। जलवायु परिवर्तन का जामुन के उत्पादन पर एक विशेष प्रभाव देखा गया। जब पेड़ों पर फूल आते हैं, उस समय पत्तियां निकली परिणामस्वरूप उपज बहुत कम हो गई।

औषधीय गुणों के कारण जामुन की बढ़ती लोकप्रियता से बाजार में इसके फलों की मांग बढ़ती जा रही है और अधिक लाभ के कारण किसान इसके नए बाग लगा रहे हैं। चार दशक पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि जामुन की व्यावसायिक खेती होने लगेगी और बाग कलमी पौधों के होंगे। आमतौर पर जामुन के बाग बीजू पौधों से लगाए जाते हैं लेकिन किसानों की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान ने जामुन की कलम बनाने का तरीका निकाला और वर्तमान में कलमी (ग्राफ्टेड) पौधों की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है।

संस्थान के निदेशक शैलेन्द्र राजन ने बताया कि संस्थान में विकसित की गई जामुन की किस्में सीआईएसएच-जामवंत और सीआईएसएच जामुन-42 दोनों ही लोकप्रिय होते जा रहे हैं। किसान हजारों पौधों की मांग कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश ही नहीं राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु से निरंतर संपर्क करते हैं। कलमी पौधों की बढ़ती हुई मांग के अनुसार इतनी अधिक संख्या में पौधे बनाना कठिन है।

कुछ वर्ष पूर्व जामुन के बीजू पौधों से वृक्षारोपण होता था और किसान अपने बाग में एक दो पौधे लगा लेते थे लेकिन आज किसान सैकड़ों पौधे लगाने के लिए तैयार है। कुछ किसान गुजरात और महाराष्ट्र में जामुन की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। दिल्ली और बड़े शहरों के बाजारों में फल 200 से 300 रुपये प्रति किलोग्राम आसानी से बिक जाते हैं। फलों की बढ़ती मांग को देखकर पंजाब में कई किसानों ने जामुन की खेती करने के लिए उत्साहित होकर संस्थान से संपर्क किया। संस्थान द्वारा निकाली गई सीआईएसएच-जामवंत किस्म के फलों में 90 प्रतिशत से भी अधिक गूदा होने के कारण इसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है।

मधुमेह से पीड़ित लोग इसके गूदे का सेवन करने के बाद गुठलियों को भी सुखाकर पीसकर चूर्ण बनाकर नियमित रूप से प्रयोग में ला रहे हैं। स्वास्थ के प्रति बढ़ती सजगता ने जामुन के मौसम में जामुन को और अधिक महँगा कर दिया है। इसका मुख्य कारण है कि यह मौसमी फल बाजार में कुछ ही दिनों का मेहमान होता है।

आम से कई गुना अधिक दाम में बिकने के बाद भी जामुन का व्यापार बहुत आसान नहीं है। यह पकने के बाद ही तुरंत खराब होने लगता है और जरा सी असावधानी से सारे फल फंफूद से ग्रस्त हो जाते हैं। बरसात में इस फंफूद को रोकना और कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में जामुन के उत्पाद बनाने के लिए भी लोग आकर्षित हुए हैं। कई उद्यमी इस दिशा में अग्रसर है क्योंकि जामुन के बहुत से उत्तम कोटि के संवर्धित पदार्थ बनाने में सफलता मिल चुकी है। केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान ने भी कई उत्पाद बनाकर उनकी लोकप्रियता बढ़ाई है।

ताजे जामुन का व्यापार थोड़ा कठिन एवं जोखिम से भरा हो सकता है। मूल्य संवर्धित पदार्थों को बनाकर साल भर संरक्षित रखा जा सकता है। इन पदार्थों की तरफ भी लोगों की रुचि बढ़ रही है और भविष्य में बिना रसायनों के प्रयोग से संरक्षित बहुत से उत्पाद बाजार में आ सकते हैं जिन्हें अच्छा बाजार मूल्य मिलने की पूर्ण संभावनाएं हैं। अभी जामुन का परिरक्षण आमतौर पर सिरके के रूप में ही होता रहा है परंतु जैसे-जैसे नए उत्पाद बाजार में आएंगे, कच्चे माल की कमी के कारण ताजे जामुन का और दाम बढ़ सकते हैं।

कोरोना की मार से जामुन भी अछूता ना रहा। बाजार में बढ़ती लोकप्रियता के बाद भी इसकी ज्यादा उपस्थिति दर्ज ना हो पाई। खरीदारों की कमी और माल का ना आना किसानों और व्यापारियों के लिए अच्छा नहीं रहा। बहुत से जामुन प्रेमियों को इस साल इसकी कमी खली लेकिन लॉकडाउन के चलते सब मजबूर हैं। धीरे-धीरे वैज्ञानिक औषधीय गुणों पर शोध करके जामुन के फ़ायदों पर प्रमाणिक डाटा उपलब्ध कराने में तत्पर हैं। औषधीय गुणों से भरपूर इस फल के बारे आयुर्वेद में बताई गई बातें विज्ञान की कसौटी पर भी सही उतर रही हैं।

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