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मोदी हैं तो मुमकिन हुआ

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The Governor of Nagaland, Shri R.N. Ravi calling on the Prime Minister, Shri Narendra Modi, in New Delhi on August 08, 2019.

“यह आश्चर्य का विषय है कि भारत में अब भी कुछ राजनीतिक दल और उनके कुछ नेता विशेष (सारे नहीं) अभी तक जाने-अनजाने पाकिस्तान की ही बोली बोलते रहते हैं। पाकिस्तान को सहायता पहुंचाने वाला यह समूह मुख्य रूप से सोनिया-कांग्रेस है, जो भारत में पाकिस्तान का ‘विचार प्रकोष्ठ’ बन कर रह गया है। कांग्रेस उसे भले ही अपनी भाषा में अपनी पार्टी का ‘अंतरराष्ट्रीय प्रकोष्ठ’ कहती होगी। पर वास्तव में वह ‘पाकिस्तान प्रकोष्ठ’ बन कर रह गया है।”

“जम्मू-कश्मीर के जिस एक तिहाई हिस्से पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है, वह अब पाकिस्तान तत्काल भारत को लौटा दे। जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन हो जाने से पाकिस्तान का हर दावा और हर व्याख्या ही अब भरभरा कर समाप्त हो गयी है।”
गतांक से आगे

आर.के. सिन्हा

जम्मू-कश्मीर के मामले में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के विचार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 को संविधान में शामिल करवाया और कांग्रेस नेनउसे बनाये रखा। कश्मीर घाटी में भी कोई नहीं चाहता कि अनुच्छेद 370 बना रहे। वहां एक लोक कथा प्रचलित है कि ‘अनुच्छेद 370 की जरूरत न ‘मराज’ को है और न ही ‘कामराज’ को है। यह अनुच्छेद तो केवल ‘यमराज’ को चाहिए।’ कश्मीर में दक्षिणी हिस्से को ‘मराज’ और उत्तरी हिस्से को ‘कामराज’और मध्य हिस्से को ‘यमराज’ कहा जाता है।

वास्तव में भारत के संविधान में अनुच्छेद 370 से सिर्फ पाकिस्तान और अलगाववादियों का ही हित साधता था। यह पाकिस्तान के हित में भी था और अनुच्छेद 370 के रहने से ही पुलवामा जैसे आतंकी हमले हो सकते थे। इस अनुच्छेद की व्याख्या में जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच के क्षेत्र को विवादित क्षेत्र सिद्ध करने का प्रयास किया गया था, जबकि वास्तविकता ठीक इसके उलट है। अनुच्छेद 370 और उसकी अवैध संतान 35ए के समाप्त कर दिये जाने से जम्मू-कश्मीर स्वत: भारत के सभी अन्य राज्यों की श्रेणी में आ गया है।

अब अगर कोई विवाद है तो सिर्फ इतना ही है कि जम्मू-कश्मीर के जिस एक तिहाई हिस्से पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है, वह अब पाकिस्तान तत्काल भारत को लौटा दे। राज्य के पुनर्गठन हो जाने से पाकिस्तान का हर दावा और हर व्याख्या ही अब भरभरा कर समाप्त हो गयी है। यह आश्चर्य का विषय है कि भारत में अब भी कुछ राजनीति दल और उसके कुछ नेता विशेष (सारे नहीं) अभी तक जाने-अनजाने पाकिस्तान की ही बोली बोलते रहते हैं।

कांग्रेस भारत में पाक का ‘विचार प्रकोष्ठ’

पाकिस्तान को सहायता पहुंचाने वाला यह समूह मुख्य रूप से सोनिया-कांग्रेस है, जो भारत में पाकिस्तान का ‘विचार प्रकोष्ठ’ बन कर रह गया है। कांग्रेस उसे भले ही अपनी भाषा में अपनी पार्टी का ‘अंतरराष्ट्रीय प्रकोष्ठ’ कहती होगी। पर वास्तव में वह ‘पाकिस्तान प्रकोष्ठ’ बन कर रह गया है। इसकी शुरूआत तो वैसे राजीव गांधी ने ही की थी। इसके लिए कुछ तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों ने उन्हें भरपूर सहायता भी पहुंचायी थी।

न्यूयार्क टाइम्स ने यही काम अपने संपादकीय लेखों के द्वारा भी किया था। पूर्व गृह और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने तो यहां तक कह दिया था कि ‘मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर को इसलिए निशाना बना रही है, क्योंकि वहां मुसलमान रहते हैं। उनके अनुसार जम्मू-कश्मीर में तानाशाही है और लोकतंत्र का गला लगभग दबा ही दिया गया है।’

दिग्गी राजा दिग्विजय सिंह तो उससे भी आगे बढ़ गए। वे भारतीय मीडिया को ही कोस रहे हैं। शशि थरूर एक कदम और बढ़े और आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को फिलिस्तीन बना दिया है। पाकिस्तान को आज जिस समर्थन और तर्कों की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह उसे सोनिया कांग्रेस से ही तो प्राप्त हो रही है।

यही स्थिति 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद में भी पैदा हुई थी, जब भारत के प्रतिनिधि या सच पूछिए तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के व्यक्तिगत प्रतिनिधि गोपालस्वामी अयंगार बोल रहे थे। उस समय भी किसी ने यह टिप्पणी की थी कि अगर श्रोताओं को यह न पता होता कि बोलने वाला भारत का प्रतिनिधि है, तो सभी प्रतिनिधि उनके भाषण को सुनकर तो यही कहते कि पाकिस्तान का प्रतिनिधि ही बोल रहा है। करीब सात दशक बाद भी कांग्रेस कश्मीर के सवाल पर जहां खड़ी थी, वहीं आज भी खड़ी है।

जम्मू-कश्मीर एक ऐसा प्रदेश है जिसमें 15 प्रतिशत से भी ज्यादा आबादी जनजातीय लोगों की है। जिसमें गुर्जर ज्यादा हैं जो मुख्यत: मवेशीपालक हैं। लेकिन सरकारी नौकरियों में या कहीं और भी उनको आरक्षण नहीं दिया जाता था। मोदी सरकार ने अब वह आरक्षण उन्हें दिलवाया है। भारत सरकार ने मोदी जी के नेतृत्व में 2014 से ही प्रभावी स्वच्छता अभियान चला रखा है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति भी लगता है कि उसी ‘स्वच्छता अभियान’ का हिस्सा है।

राजनीति का एजेंडा तय करते मोदी

बीते सितंबर 2013 के महीने से ही नरेंद्र मोदी ने जो जो विषय छेड़े हैं, उस पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार, कांग्रेस पार्टी और वामपंथियों को अपनी प्रतिक्रिया में बोलना ही पड़ा। वैसे यह जरूरी तो नहीं था, पर यह उनकी मजबूरी अवश्य थी। उन्हें अपनी जमीन तेजी से खिसकती नजर आ रही थी। चाहे बात जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की हो या सांप्रदायिक लक्षित हिंसा विरोधी विधेयक की, या फिर सरदार पटेल की उपेक्षा की, सभी मुद्दों को मोदी जी ने ही बहस को केंद्र में लाया। यह साबित करता है कि पिछले छह सालों से नरेंद्र मोदी ही देश की राजनीति का एजेंडा तय कर रहे हैं।

उस दिन तो जम्मू में गजब ही हो गया था। बात 8 दिसंबर, 2013 की है। वह नजारा पहली बार ही देखा गया। जम्मू के मौलाना आजाद स्मारक स्टेडियम में जो आकुल भीड़ उमड़ कर आयी, वह सबको चकित कर देने वाली थी। जो जम्मू के इतिहास और भूगोल को जानते हैं, वे भी भयंकर रूप से चकित थे। वे भी चकित थे, जो अपने को जम्मू के जनमानस का गहरा जानकार मानते हैं।

उस स्टेडियम में नरेंद्र मोदी को सुनने के लिए भारी संख्या में लोग आएंगे, यह तो माना ही जा रहा था, लेकिन, किसी को भी इसका अंदाज नहीं था कि वहां मोदी जी एक नया इतिहास रचेंंगे। सचमुच उस मैदान ने मोदी जी के स्वागत में एक लंबी रेखा खींच दी, उस स्टेडियम के इतिहास की और जम्मू-कश्मीर की राजनीति की भी। एक ऐसी रेखा जिससे बड़ी रेखा खींचना भविष्य में शायद किसी अन्य के लिए संभव भी न हो।

यह वही मैदान है, जहां 1983 में इंदिरा गांधी भी आयी थीं। लोगबाग उनकी सभा को अब तक की सबसे बड़ी सभा मानते थे। वह नरेंद्र मोदी की सभा के सामने फीकी पड़ गयी। इंदिरा गांधी की सभा से तुलना अकारण नहीं है। इसके मजबूत आधार भी हैं। वे तब फारूक अब्दुल्ला को उनकी हैसियत में रखने की राजनीति कर रही थीं।

इस कारण जम्मू में उनके प्रति अत्यधिक आकर्षण उभरना स्वाभाविक था। वे उस समय देश की प्रभावी प्रधानमंत्री तो थीं ही। उनकी लोकप्रियता ने फारूक अब्दुल्ला के प्रति लोगों की नाराजगी में थोड़ी वृद्धि जरूर कर दी। नरेंद्र मोदी की सभा में तो हर जगह से, हर तरफ से लोग खिंचे ही चले आ रहे थे। जम्मू में मोदी जी की यह पहली रैली थी। इसलिए एक उत्सुकता सबके मन में यह अवश्य रही होगी कि वे कैसा बोलते हैं? क्या बोलते हैं? और उनके कहे में जम्मू-कश्मीर मसले का कोई मर्म होगा या नहीं? उत्सुकता इन्हीं बातों के लिए ही रही होगी।

पुराने मुद्दे पर नयी बहस

जम्मू के जानकार बता रहे हैं कि स्टेडियम में उमड़ी भीड़ तो स्वत:स्फूर्त थी। यह भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भी एक बड़ा चमत्कार और सुखद आश्चर्य ही था। इससे भी बड़ी बात वहां जो हुई, वह कुछ और है। नरेंद्र मोदी ने एक पुराने मुद्दे पर ही एक नयी बहस छेड़ दी। मुद्दा पुराना है। एक विधान, एक प्रधान और एक निशान का मुद्दा। इसी मुद्दे पर ही डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान भी हो गया था। पहले जनसंघ और अब भाजपा भी इस मुद्दे को अभी तक अपने सीने से चिपकाए हुए ही थी, लेकिन कोई हल नहीं निकल पा रहा था।

इसलिए उसका रवैया किसी को चौंकाता भी नहीं। लेकिन, नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण से पूरे देश को चौंका दिया। अनुच्छेद 370 के बारे में एक क्रांतिकारी रुख अपनाया। पुरानी लिखावट पर नयी स्याही चला दी। बात वही कही, जो भाजपा अपने स्थापना काल से कहती रही है, लेकिन ढंग उनका अपना था और नयापन लिए हुए था। और यह नयापन उस व्यक्ति का था, जो आज का सशक्त और लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने सिर्फ इतना जोड़ा कि अनुच्छेद 370 पर इस लिहाज से विचार हो कि क्या यह जम्मू-कश्मीर के वासियों के हित में है अथवा नहीं?

उनका इतना ही कहना ही एक चिंगारी साबित हो गयी। देशव्यापी बहस छिड़ गयी। वह अभी भी जारी है और चलती ही रहेगी और लम्बे समय तक रुकेगी भी नहीं। इसलिए कि जो नयी बहस छिड़ी है, उसकी लकीर पुरानी भी नहीं है। उसे न खारिज ही किया जा सकता है और न उसकी उपेक्षा ही की जा सकती है। नरेंद्र मोदी का मतलब भी यही था। जो लोग पहले नरेंद्र मोदी को नाचीज मानते थे, वे भी अब अपने को सुधार चुके हैं। उसमें पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, जयराम रमेश, शशि थरूर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देबड़ा, दिग्विजय सिंह और स्वयं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी हैं। सिर्फ तीन महीनों में यह बड़ा परिवर्तन आ गया है। नरेंद्र मोदी जो बोलते हैं, वह जनमानस में छा जाता है। इसीलिए उस पर जमकर बहस भी होती है।

नेहरू की सफाई

अनुच्छेद 370 के बारे में कभी जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी सफाई दी थी कि ‘वह (अनुच्छेद 370) घिसते-घिसते एक दिन स्वयं लुप्त हो जाएगी।’ नरेंद्र मोदी जी स्वयं उसके घिसने के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहना चाहते थे। वे उसे जनहित और देशहित की कसौटी पर परखने का न्यौता देने को आतुर थे। इसलिए यह बहस तो चलती ही रहेगी। और भी कई कारण हैं। नरेंद्र मोदी के बयान पर भाजपा की ओर से स्वर्गीय अरुण जेटली जी ने भी जो सफाई दी थी, वही वस्तुस्थिति है। स्वर्गीय अरुण जेटली सिर्फ भाजपा के बड़े नेताओं में से ही एक नहीं थे, वे संविधान के जाने-माने जानकार भी थे। वे जाने-माने विधि विशेषज्ञ थे।

उन्होंने जो बात कही, वह नरेंद्र मोदी के कथन का ही विस्तार था। अन्य बातों के अलावा उनका यह भी कहना था कि ‘सच तो यह है कि अनुच्छेद 370 खुद अपने ही (जम्मू-कश्मीर) नागरिकों को दबाने या उनके साथ भेदभाव करने का हथियार बन सकता है। यह कहना भी गलत है कि इस अनुच्छेद के जरिए ही राज्य को पंथनिरपेक्ष रखा जा सका है। मेरा निजी अध्ययन तो यह कहता है कि कैसे यह धारा लोगों को सताने और उनके साथ ऊंच-नीच करने में वहां की सरकार का साधन बन गया था।

अनुच्छेद 370 की तरह ही अनुच्छेद 35(ए) भी ऐसा ही है जो भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार में विभिन्न अनुच्छेद जैसे 14 (समानता) 15 (धर्म, जाति, समुदाय या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव न करने), 16 (सरकारी संस्थानों में रोजगार के समान अवसर और आरक्षण), 19 (मौलिक अधिकार समेत, बोलने की आजादी, जीने का अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत मिले स्वतंत्रता के अधिकार को पूरी तरह से खारिज करता है। एक दिन बातचीत में जब अनुच्छेद 35 (ए) को समझने के लिए लोकसभा के पूर्व महासचिव सी.के. जैन से वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री राम बहादुर राय ने पूछा तो वे संविधान को ध्यानपूर्वक एक बार फिर से पढ़कर बोल पड़े कि ‘यह तो संविधान के साथ धोखाधड़ी है।’

अरुण जेटली सही मायने में नरेंद्र मोदी के कथन का ही संवैधानिक अर्थ बता रहे थे। जिसे जम्मू.कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला समझते हुए भी अंजान बने रहना चाहते थे। मीडिया में भी बहुत दिनों बाद अब कहीं जाकर अनुच्छेद 370 के तमाम पहलुओं पर वाद-विवाद हो रहा है। नरेंद्र मोदी को ही यह श्रेय प्राप्त है कि उनके कुछ वाक्यों से ही देशभर में ही नहीं विश्वभर में एक नया संवाद प्रारंभ हुआ है।

कोई कह रहा है कि अनुच्छेद 370 से जम्मू-कश्मीर का विकास रुका है, तो दूसरा उसे भारत के संघीय स्वरूप से जोड़कर देख रहा है। साफ है कि जिस मुद्दे को सिरे से खारिज कर दिया जाता था और जो एक पार्टी का घिसा-पिटा मोहरा मान लिया गया था, वह अब सारे देश के समक्ष एक गंभीर प्रश्न बन कर खड़ा हो गया। नरेंद्र मोदी ने ही असल में यह यक्ष प्रश्न उपस्थित कर दिया।

मनमोहन सिंह को मोदी का पत्र

जम्मू से लौटकर जिस प्रश्न को मोदी जी छेड़ बैठे थे, वही संसद के समक्ष आया। कांग्रेस की अल्पसंख्यक राजनीति का वह हिस्सा था। नरेंद्र मोदी ने उसे खुली चुनौती दे दी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर सांप्रदायिक लक्षित हिंसा विरोधी विधेयक को ‘तबाही का नुस्खा’ कह कर विरोध किया। उनका कहना था कि यह विधेयक जल्दबाजी में बिना सोचे-समझे तैयार किया गया है। इस तरह बिना विचार के पेश किये जाने वाले विधेयक को रोक देना चाहिए।

राज्य सरकारों से इस पर बात होनी चाहिए, क्योंकि यह विधेयक राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण है। नरेंद्र मोदी के पत्र का प्रभाव तत्काल पड़ा। नरेंद्र मोदी ने इसे ऐसा मुद्दा बना दिया, जो कांग्रेस सरकार के गले में हड्डी की तरह फंस कर रह गया।

नरेंद्र मोदी ने जो,जो विषय छेड़ा उस पर तत्कालीन मनमोहन सरकार, कांग्रेस और वामपंथियों को प्रतिक्रिया में बोलना ही पड़ा। गुजरात का विकास मॉडल सबसे पहले बहस के बीच आया। वह तो एक शुरूआत थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में जिस दिन नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो यह दुर्दशा नहीं होती।’ इतना कहना भर था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तत्काल जवाब में बोलना पड़ा।

वे इतना भर ही कह सके कि सरदार पटेल तो कांग्रेस के नेता थे। इस कहा-सुनी होने भर से सरदार पटेल पर भी एक ऐतिहासिक बहस छिड़ गयी। सरदार पटेल का मूल्यांकन होने लगा। उसमें से यह बात निकलकर स्पष्ट रूप से सामने आ गयी कि कांग्रेस ने सरदार पटेल की घोर उपेक्षा की। अनेक इतिहासकार इस बहस को देश के हित में मानते हैं। ये कुछ उदाहरण तो कुछ नमूने भर हैं। इनसे यही नतीजा निकलता है कि सितंबर 2013 से नरेंद्र मोदी ही देश की राजनीति का एजेंडा तय कर रहे हैं। इसमें ही भावी राजनीति के संकेत हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह कहा जा सकता है कि ‘मोदी थे तो मुमकिन हुआ।’ (समाप्त)

(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं।)

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