Wed. Apr 1st, 2020

न्यायिक प्रक्रिया में संस्थागत मध्यस्थता

“राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रीड के आंकडों के अनुसार 3 करोड़ 14 लाख न्यायिक प्रकरण देश की निचली एवं जिला अदालतों में ही लंबित चल रहे हैं। एक जानकारी के अनुसार देश की सर्वोच्च अदालत में ही 59 हजार 867 मामले लंबित हैं।”

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

अदालत सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविन्द बोबड़े ने अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए संस्थागत मध्यस्थता की जरूरत जतायी है। दिल्ली में फिक्की के समारोह में अदालतों में मुकदमों के अंबार पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने यह सुझाव दिया। इसमें कोई दोराय नहीं कि मुकदमों के बोझ तले दबी न्यायिक व्यवस्था को लेकर न्यायालय, सरकार, गैरसरकारी संगठन और आमजन सभी गंभीर हैं।

इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अनावश्यक पीएलआर दाखिल करने की प्रवृत्ति पर सख्त संदेश देकर आए दिन लगने वाली पीएलआर पर कुछ हद तक अंकुश लगाने में सफल रह चुके हैं। यह सही है कुछ पीएलआर अपने आपमें मायने रखती हों,पर पीएलआर दाखिल करने की सुविधा का दुरुपयोग भी जगजाहिर है। लोक अदालतों के माध्यम से भी आपसी समझ से मुकदमों को कम करने के प्रयास जारी हैं।

1000 मामले 50 साल से लंबित

देश के न्यायालयों में लंबित मुकदमों के गणित को लोकसभा में पिछले दिनों लिखित उत्तर में प्रस्तुत आंकड़ों से समझा जा सकता है। राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रीड के आंकडों के अनुसार 3 करोड़ 14 लाख न्यायिक प्रकरण देश की निचली एवं जिला अदालतों में ही लंबित चल रहे हैं। एक जानकारी के अनुसार देश की सर्वोच्च अदालत में ही 59 हजार 867 मामले लंबित हैं।

आंकड़ों का सबसे बड़ा सच यह है कि देश की अदालतों में करीब एक हजार मामले 50 साल से लंबित हैं तो करीब दो लाख मामले 25 साल से विचाराधीन हैं। 44 लाख 76 हजार से अधिक मामले देश की 24 हाईकोर्टों में लंबित हैं। करीब पौने तीन करोड़ मामले देश की निचली अदालतों में विचाराधीन हैं।

देश के वर्तमान और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की चिंता से पुराने मामलों के निपटारे की कार्ययोजना भी बनी है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने पुराने मामलों के लंबित होने की गंभीरता को समझा। सर्वोच्च न्यायालय में प्रतिदिन 10 पुराने मामलों को सुनवाई के लिए विशेष बेंच के सामने रखने के निर्देश निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने दिए थे।

कुल लंबित तीन करोड़ से अधिक मामलों में से करीब 14 प्रतिशत मामले गत दस सालों से लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय की पहली प्राथमिकता पांच साल से पुराने लंबित मामलों की शीघ्र निस्तारित करने की है। सर्वोच्च न्यायालय ने सुझाव दिया है कि मुकदमों के अंबार को कम करने के लिए अत्यंत इमरजेंसी को छोड़कर कार्य दिवस पर छुट्टी न ली जाएं।

नये मैकेनिज्म की जरूरत

मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने संस्थागत मध्यस्थता की जो आवश्यकता महसूस की है उसको इस मायने में भी समझा जा सकता है कि हमारी सनातन परंपरा और ग्रामीण व्यवस्था में पंच परमेश्वरों की जो भूमिका थी, आज उस भूमिका को पुनर्स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। यातायात नियमों की अवहेलना, मामूली कहासुनी, मामूली विवाद आदि के प्रकरणों को चिह्नित कर इनकी सुनवाई कर तत्काल निर्णय की जरूरत है। ऐसे मामलों में अनावश्यक अपील का प्रावधान भी न हो।

ऐसा करके मुकदमों के बोझ को कम किया जा सकता है। राजस्व के मामलों के अंबार को भी पंच परमेश्वरों या अन्य दूसरी तरह के निस्तारण का मैकेनिज्म बनाकर काफी हद तक कम किया जा सकता है। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि हाल ही में राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन की जारी रिपोर्ट के मुताबिक बीते तीन दशकों में मुकदमों की संख्या दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है। इस पर ब्रेक लगाने के लिए भी संस्थागत मध्यस्थता जरूरी है।

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