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प्रारंभ में वेद से बाहर का समझा जाता था भागवत धर्म

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“भागवत धर्म प्रारंभ में वेद से बाहर का समझा जाता रहा, जिसे बाद में वेदपरक सिद्ध करने के लिए इसके अनुयायियों ने ग्रंथों की रचना भी की। यामुनाचार्य ने अपने ग्रंथ आगम-प्रामाण्य में पंचरात्र धर्म को प्रामाणिक सिद्ध करने का अथक प्रयास किया है। किन्तु इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि पाणिनि के युग में न केवल भागवत धर्म की नींव पड़ चुकी थी बल्कि लोक में उसका समृद्ध रूप भी व्याप्त हो चुका था।”

सुमन कुमार सिंह 08.08.2019

भारतीय वांग्मय के प्राचीन ग्रंथों की बात करें तो पाणिनि के व्याकरण-सूत्रों में मंदिरों और मूर्तियों का प्रामाणिक उल्लेख हमें मिलता है। पाणिनि के काल निर्धारण की बात करें तो अधिकांश विद्वान इस बात पर सहमत हैं कि पाणिनि का काल ईसा से लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व का है। अपने सूत्रों में पाणिनि ने जिन देवताओं का उल्लेख किया है वे हैं- अग्नि, इंद्र, वरुण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, वृषाकपि, पूषा, अर्यमा, त्वष्टा, सूर्य, वायु, महेंन्द्र, अपानप्तृ, सोम और नासत्य। इसके अलावा इनमें से कुछ देवताओं के युग्म का भी वर्णन है यथा- अग्नि-सोम,अग्नि-वरुण, द्वापृथिवी, शुतासीर, सोम-रुद्र, इंद्र-पूषा व शुक्रामंथी।

अब अगर आज के संदर्भ में हम इसे देखें तो इनमें से कई देवताओं के बारे में किसी तरह का वर्णन तो क्या उन नामों से भी हम पूरी तरह अपरिचित ही हैं। पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी की बात करें तो यहां जो देव मूर्तियों का वर्णन है उसमें जो अर्चा शब्द आया है उसे हम प्रतिमा के अर्थ में लेते हैं। इन वर्णनों से यह तो ज्ञात होता है कि मूर्ति-पूजा का सूत्रपात भारत में याज्ञिक विधानों की अनुरूपता को लेकर हुआ है। पर यह कब, कैसे और किस व्यक्ति या व्यक्ति समूह द्वारा हुआ यह कहना कठिन ही है।

वैसे पाणिनि के युग में कृष्ण वासुदेव की भक्ति को लगभग सभी विद्वानों ने माना है, यह समुदाय वासुदेवक कहलाता था। साथ ही कृष्ण के साथ ही उनके अभिन्न सखा अर्जुन की पूजा के प्रचलित होने का विवरण भी मिलता है। जिसे कालांतर में नर-नारायण के रुप में मान्यता दी गयी, इस तरह से हम कह सकते हैं कि वासुदेव और अर्जुन की युगल जोड़ी का ही नामांतर नर-नारायण है।

वेदों में भी देव-साहचर्य का वर्णन

वैसे इससे पहले वेदों में भी देवताओं के साहचर्य का वर्णन मिलता है जैसे अग्नि-वरुण, इंद्र-सोम व इंद्र-वृहस्पति। समझा जाता है कि इसी नर-नारायण की भांति ही संकर्षण और वासुदेव तथा प्रद्युम्न व अनिरुद्ध के मिलने से चार देवताओं का समूह बना और आगे चलकर इसमें साम्ब का नाम जब जुड़ गया, तबसे पंच वृष्णि/वीरों की कल्पना पूर्ण हुई।

महाभारत के शांति पर्व में उपरोक्त चार देवताओं का वर्णन कुछ इस रुप में आया है। इस कथा के अनुसार देवर्षि नारद ने भगवान श्रीहरि के दर्शन की इच्छा से उनकी आराधना की, तब श्रीहरि ने उन्हें दर्शन देते हुए कहा- विप्रवर धर्म के घर में अवतीर्ण हुए, वे नर-नारायण आदि चारों भाई मेरे ही स्वरुप हैं। अत: तुम सदा उनका भजन किया करो तथा जो कार्य प्राप्त हो उसका साधन करो। जो नेत्रों से नहीं देखा जाता, त्वचा से जिसका स्पर्श नहीं होता, गंध ग्रहण करने वाली घ्राणेन्द्रिय नली से जो सूंघने में नहीं आता, जो रसेन्द्रिय की पहुंच से परे है सत, रज एवं तम नामक गुण जिसपर कोई प्रभाव नहीं डालते, जो सर्वव्यापी, साक्षी और संपूर्ण जगत का आत्मा कहलाता है।

सनातन परमात्मा

जो स्वयं नष्ट नहीं होता, जिसको अजन्मा नित्य, सनातन, निर्गुण और निषकलंक बताया गया है, जो चैबीसों तत्वों से परे पच्चीसवें तत्व के रुप में विख्यात है, जिसे अंतर्यामी पुरुष निष्क्रिय तथा ज्ञानमय नेत्रों से ही देखने योग्य बताया जाता है, जिसमें प्रवेश करके श्रेष्ठ द्विज मुक्त हो जाता है, वही सनातन परमात्मा है। उसी को वासुदेव नाम से जानना चाहिए। संसार में उस एकमात्र सनातन पुरुष वासुदेव को छोड़कर कोई भी चराचर भूत नित्य नहीं है। इसी मान्यता से यह धार्मिक दृष्टिकोण पल्लवित हुआ कि एक ही शक्ति नर और नारायण के दो रुपों मे विकसित हुई। डा. वासुदेव शरण अग्रवाल का कथन है कि – वासुदेव कृष्ण की परिवार कल्पना का दूसरा स्वरुप और भी अधिक व्यापी एवं स्थायी हुआ।

वह चर्तुव्यूह या पंचरात्र की कल्पना थी। उसके अनुसार पहले तो वासुदेव और संकर्षण इन दोनों का जुड़वां रुप लोक में प्रसिद्ध हुआ। इसे ही व्याकरण के उदाहरणों में वासुदेव-संकर्षण कहा गया है। इस प्रकार के जुड़वां देवता की कल्पना पहले से चली आती थी। वासुदेव और संकर्षण तो उसी प्रथा का नया दृष्टांत थे। देवता द्वंद्वेच सूत्र से ज्ञात होता है कि ऐसे कुछ देवताओं के जोड़े के साह्चर्य का विश्वास वैदिक देवताओं के विषय में भी था, जैसे इंद्र -सोम, इंद्र- वृहस्पति आदि। साथ ही कुछ देवता ऐसे थे, जिनका साह्चर्य लोक से प्रसिद्ध था, जैसे ब्राह्म-प्रजापति, शिव-वैश्रवण आदि नर-नारायण की भांति संकर्षण और वासुदेव नए भक्ति धर्म का मुख्य सूत्र बन गए। इसी में आगे चलकर प्रध्युम्न और अनिरुद्ध के मिलने से चतुर्व्यूह का स्वरुप पूरा हुआ।

प्रकृति की पूजा

पंचरात्र या पंचायतन के संबंध में डा. मुशीराम शर्मा का विचार भी यहां महत्वपूर्ण हो जाता है- प्रकृति की पूजा यहां पंचायतन में अभिव्यक्त हुई है। वैष्णवी की व्यूह पूजा में जो नाम आते हैं, वे भी प्रकृति की मूल विकृतियों के ही नाम हैं। कौटिल्य अर्थशास्त्र में विष्णु मंदिर के निर्माण की आज्ञा का वर्णन है तथा शिव और वैश्रवण की मूर्तियों का भी उल्लेख है।

स्पष्ट है कि इन मूर्तियों को मंदिर में स्थापित किया जाता था। इस मूर्ति पूजा का सूत्रपात इस देश में याज्ञिक विधानों की अनुरूपता को लेकर हुआ इतना तो स्पष्ट है। वैसे वेद में प्रतिमा पूजन का विधान कहीं भी वर्णित नहीं है। अत: यह कहा जा सकता है कि वैदिकों तथा भागवतों में किसी न किसी रुप में विषमता रही होगी। पराशर पुराण, वशिष्ट संहिता जैसे ग्रंथ जहां पंचरात्रों को अवैदिक मानते हैं, वहीं महाभारत, भागवत व विष्णु पुराण जैसे ग्रंथ इसका समर्थन करते नजर आते है।

इन वर्णनों से ऐसा प्रतीत होता है कि भागवत धर्म प्रारंभ में वेद से बाहर का समझा जाता रहा, जिसे बाद में वेदपरक सिद्ध करने के लिए इसके अनुयायियों ने ग्रंथों की रचना भी की। यामुनाचार्य ने अपने ग्रंथ आगम-प्रामाण्य में पंचरात्र धर्म को प्रामाणिक सिद्ध करने का अथक प्रयास किया है। किन्तु इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि पाणिनि के युग में न केवल भागवत धर्म की नींव पड़ चुकी थी बल्कि लोक में उसका समृद्ध रूप भी व्याप्त हो चुका था। पतंजलि के अष्टाध्यायी के भाष्य पातंजल योगदर्शन, जिसकी रचना का काल ईसा से डेढ सौ वर्ष पूर्व माना जाता है,के रचयिता के अनुसार वासुदेव कृष्ण और संकर्षण के मंदिर थे और उनकी पूजा की जाती थी।

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