Mon. Oct 26th, 2020

धैर्य का महत्व

1 min read

20.05.2019

महात्मा गांधी जी ने विनोबा भावे जी को अपने आश्रम साबरमती में रहने और साथ-साथ कार्य करने का आमंत्रण भेजा। आमंत्रण पा कर विनोबा भावे साबरमती आश्रम पहुंचे। वह आश्रम पहुंचने के बाद सर्वप्रथम गांधी जी से मिले। गांधी जी और उनके बीच अहिंसा के महत्व के बारे में चर्चा हुई। अहिंसा के सवाल पर विनोबा जी के मन में द्वन्द्व था और वह गांधी जी के बिचारों से सहमत नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने कहा-‘बापू आपकी अहिंसा का आदर्श मेरे गले नहीं उतरता। मैं इसे स्वराज प्राप्ति से जोड़ कर देखता हूं तो मेरे मन में शंकाएं उत्पन्न होने लगती है।

उन्होंने बापू से कहा कि यह ठीक है कि अहिंसा मानव समाज के लिये उन्नति कारक है और हिंसा मुक्त समाज मानव जीवन में उन्नति और उत्कर्ष के लिए भी आवश्यक है। भविष्य में भले ही इस की उपयोगिता हो किन्तु आज की परिस्थितियों में जब हमारा देश परतंत्र है, हिंसा के बिना स्वराज्य प्राप्त करना सम्भव दिखायी नहीं देता। स्वराज्य मुझे अपनी जान से भी ज्यादा प्यारा है और इसके लिए मैं मानसिक स्तर पर किसी भी हिंसा के लिए तत्पर हूं, त्याग, बलिदान के लिए कटिबद्ध हूं। ऐसी हालत में भी क्या आप मुझे अपने आश्रम में रख सकेंगे? गांधी जी मुस्कुराते हुए बोले-‘जो तुम्हारे विचार हैं वही सारी दुनिया के हैं। तुम्हें साबरमती आश्रम में न लूं तो और किसे लूं? मैं जानता हूं कि बहुमत तुम्हारे जैसे विचारधारा वाले लोगों का है किन्तु मैं सुधारक हूं। आज अल्पमत में हूं, सुधारक सदैव अल्पमत में ही रहता है अत: हमें धैर्य के साथ समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। सुधारक अगर बहुमत की बात बर्दाश्त न करे तो दुनिया में उसी को बहिष्कृत होकर रहना पड़ेगा। किन्तु सीमा के परे जिनमें धैर्य है, ऐसे ही विरले लोग समाज को नयी दिशाए नवजीवन प्रदान कर पाते हैं।’

shares
error

Enjoy this blog? Please spread the word :)