Sat. Jan 25th, 2020

अलविदा खगेन्द्र ठाकुर

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“खगेन्द्र ठाकुर का संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य की सेवा और वामपंथी आंदोलन को गति प्रदान करने में बीता। वे सदा साहित्य सृजन, वाम आंदोलन को वैचारिक गति देने, शिक्षकों की भलाई और आम लोगों के हक के लिए संघर्षरत रहे।”

विजय केसरी

देश के जाने माने हिंदी के साहित्यकार कवि, आलोचक, व्यंग्यकार व स्तंभकार खगेंद्र ठाकुर अब इस दुनिया में नहीं रहे। एक स्नेह से भरा निर्झर बह गया। खगेंद्र ठाकुर जी का जन्म 9 सितंबर 1937 को बिहार (अब झारखंड) के गोड्डा जिले के मालिनी ग्राम में हुआ था। 13 जनवरी 2020 को वे इस दुनिया से सदा सदा के अलविदा कह दिया। 83 वर्षों तक वे सशरीर इस धरा पर रहे। उनका संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य की सेवा और वामपंथी आंदोलन को गति प्रदान करने में बीता।

लेखककीय व्यस्तता और पार्टी के कार्यों के लिए उन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय के मोरारका कॉलेज से वीआरएस ले लिया। कहने को तो उन्होंने गृहस्थी जरूर बसायी थी, किंतु वे सदा साहित्य सृजन, वाम आंदोलन को बैचारिक गति देने, शिक्षकों की भलाई और आम लोगों के हक के लिए संघर्षरत रहे। उन्होंने सिद्धांतों और मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी शालीनता और धैर्य नहीं खोया। अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव रहते हुए उन्होंने संघ को काफी ऊंचाई तक पहुंचाया। वे एक उच्चकोटि के साहित्यकार और वाम चिंतक के रूप में सदा याद किये जाते रहेंगे।

साहित्य की विभिन्न विधाओं पर काम

उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर काम किया। उनकी कविताएं, आलोचना और व्यंग्य अपनी विशेषता से सदा पाठकों को आकर्षित करती रहेंगी। कविता संग्रह, ‘धार एक व्याकुल’,’रक्त कमल परती पर’। व्यंग्य ‘देह-धरे का दंड :ईश्वर से भेंटवार्ता’। आलोचना-‘विकल्प की प्रक्रिया :आज का वैचारिक संघर्ष’, ‘मार्क्सवाद :आलोचना के बहाने’, ‘समय’, ‘समाज व मनुष्य’, ‘कविता का वर्तमान’,’छायावाद काव्य भाषा की विवेचना’,’दिव्या का सौंदर्य’, ‘राममधारी सिंह दिनकर, व्यक्तित्व और कृतित्व’आदि खगेन्द्र ठाकुर की रचनाएं सदा समय से संवाद करती रहेंगी।

ठाकुर जी की सरलता, सहजता और उनके साथ बिताए पल मेरी स्मृतियों में आकार ग्रहण करने लगे। उनका ठहर-ठहर कर बोलना, धीरे-धीरे चलना और किसी के द्वारा पूछे गए सवालों पर पूरी गंभीरता के साथ जवाब देना आदि बातें एक-एक कर याद आने लगी । एक अच्छे इंसान में जितने गुण होने चाहिए, खगेंद्र ठाकुर में प्राय: वे सभी मिलते थे। खगेंद्र जी का हजारीबाग के साहित्यकारों से बड़ा लगाव था। वे हजारीबाग की धरती को साहित्य की उर्वरा भूमि मानते थे। वे खासकर कवि शंभू बादल, कवि भारत यायावर, कथाकार रतन वर्मा आदि की रचनाओं से काफी प्रभावित थे।

साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता

आज से लगभग पन्द्रह वर्ष पूर्व एक साहित्यिक आयोजन में खगेंद्र ठाकुर का हजारीबाग आगमन हुआ था। वे यहां तीन दिनों तक रुके थे। तब मुझे तीन दिनों तक उनके साथ रहने और नजदीक से सुनने का बहुत ही बेहतर अवसर प्राप्त हुआ था। हिंदी साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता देखते बनती थी। वे एक कवि के साथ दमदार आलोचक भी थे। उनकी आलोचना तर्क व पांडित्य पूर्ण होती थी। वे बात को बिना इधर-उधर घुमाए सीधे विषय पर प्रहार करते थे। खगेंद्र जी की आलोचना रचनाकारों को और बेहतर ढंग से रचना कर्म के लिए प्रेरित करती रही थी।

उसी प्रवास के दौरान वब हमारे आग्रह और आमंत्रण पर प्रात: कालीन टहलने वालों की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, वैचारिक एवं सामाजिक संस्था के लोगों से बीच आये और सागर भक्ति संगम के सदस्यों के भजनों को उन्होंने बड़े ही इत्मीनान के साथ सुना था। भजन के समापन के बाद उन्होंने ‘राम के विचार और हमारा समाज’ विषय पर लगातार एक घंटे तक धाराप्रवाह वक्तव्य दिया। उन्होंने भगवान राम के त्याग और प्रजा के प्रति उनके समर्पण भाव को बड़े ही प्रभावोत्पादक ढ़ंग से प्रस्तुत कर लोगों को अपना मुरीद बना लिया।

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