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एक्जिट पोल और उसके बाद

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“23 मई को चुनावी नतीजा आने के पहले तक विपक्षी नेताओं की राजनैतिक गतिविधियां एक्जिट पोल के नतीजों से प्रभावित होती रहेंगी। वैसे ये नेता एक्जिट पोल को गलत मान रहे हैं, लेकिन इनके सच होने का डर भी उन्हें सता रहा है।”
उपेन्द्र प्रसाद 22.05.2019

एक्जिट पोल एक बार फिर नरेन्द्र मोदी की सरकार बनवा रहा हैं। हालांकि एक्जिट पोल बहुत विश्वसनीय नहीं रह गए हैं। आमतौर पर वे गलत ही साबित होते हैं, लेकिन जब सारे के सारे एक्जिट पोल एक ही दिशा में इशारा करे, तो उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। जाहिर है, 23 मई को चुनावी नतीजा निकलने के पहले तक विपक्षी नेताओं की राजनैतिक गतिविधियां एक्जिट पोल के नतीजों से प्रभावित होती रहेंगी। वैसे ये नेता एक्जिट पोल को गलत मान रहे हैं, लेकिन इनके सच होने का डर भी उन्हें सता रहा है।

अलग अलग चैनलों और एजेंसियों द्वारा जारी किए गए नतीजे नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को 245 से 350 तक सीटें दे रहे हैं। अधिकांश बहुमत के आंकड़े से ऊपर ही बता रहे हैं और यदि उन सबका औसत निकाला जाय, तो वह 300 से ऊपर ही रहता है। इन नतीजों ने विपक्षाी दलों के नेताओं को बेचैन कर दिया है। उनमें से चन्द्रबाबू नायडू तो चाहते थे कि 23 मई के पहले ही विपक्षी दलों के नेताओं की एक बैठक हो जाए। लेकिन प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाल रही ममता बनर्जी और मायावती ने इनकार कर दिया।

विपक्षी नेताओं का मूड खराब

मायावती को प्रधानमंत्री बनाने को आतुर अखिलेश यादव ने तो यहां तक कह दिया कि मेज पर बैठने के पहले यह तो लोगों को पता चले कि कौन कितना लेकर आया है। दरअसल अखिलेश यादव को लग रहा था कि उनका मोर्चा उत्तर प्रदेश की 80 में से 70 या 75 सीटों पर चुनाव जीत रहा है और प्रधानमंत्री उनके मोर्चे का ही किसी को बनना चाहिए। वह चाहते हैं कि मायावती प्रधानमंत्री बन जाएं, ताकि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में उन्हें माया की ओर से किसी प्रकार के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़े। लेकिन एक्जिट पोल ने उनका और उनकी नेता मायावती का मूड खराब कर दिया है। हो सकता है नतीजे के बाद सारे एक्जिट पोल के नतीजे गलत हो जाएं, लेकिन तबतक जो मूड खराब हुआ है, वह तो खराब ही बना रहेगा।

ममता बनर्जी का भी मूड खराब हुआ है। इस बार भी उन्हें लग रहा है कि उन्हें 40 के आसपास सीटें मिलेंगी और सीटो की संख्या के लिहाज से उनकी पार्टी भाजपा और कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। वे चूंकि राजनीति में राहुल गांधी से सीनियर हैं इसलिए वह राहुल को नेता मानने से इनकार कर देगी व अन्य गैर कांग्रेसी पार्टियों की सहायता और कांग्रेस के सपोर्ट से देश की प्रधानमंत्री बन जाएंगी। उन्होंने अपने आपको नरेन्द्र मोदी के सबसे प्रमुख विकल्प के रूप में पेश कर दिया है। पर एक्जिट पोल ने निश्चय ही ममता बनर्जी का मूड भी खराब कर दिया है।

चन्द्र बाबू नायडू विपक्ष की ओर से सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। वे तो 23 मई के पहले ही एक विपक्षी बैठक बुलाए जाने के पक्ष में थे। उनकी नजर भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। वे लंबे समय तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। अभी भी वे उसी पद पर हैं। संयुक्त मोर्चा के संयोजक के रूप में वे राष्ट्रीय राजनीति में 20-22 साल पहले भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। अब चन्द्रबाबू नायडू अपने बेटे को अपनी राजनैतिक विरासत थमाना चाहते हैं। लेकिन इसके पहले वे प्रधानमंत्री का पद भी हासिल करना चाहते हैं। आंध्र में लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव भी हुए हैं। एग्जिट पोल में राज्य की सत्ता भी उनके हाथों से जाती हुई बतायी गयी है। इस तरह एग्जिट पोल ने उनका मूड खराब कर रखा है।

उम्मीद की किरणें

एक्जिट पोल के नतीजों के बीच विपक्षी दल इस बात से राहत की सांस ले सकते हैं कि अधिकांश एक्जिट पोल गलत ही साबित होते रहे हैं। 2004 में सारे एक्जिट पोल अटल की सरकार दुबारा बनवा रहे थे, लेकिन हुआ इसका उल्टा। 2014 में भी एक को छोड़कर अन्य किसी ने भी भाजपा की उतनी बड़ी जीत की भविष्यवाणी नहीं की थी। 2009 में भी किसी एक्जिट पोल ने यूपीए को 225 से ज्यादा सीटें नहीं दी थीं, जबकि वास्तव में उसे 261 सीटें मिली थीं। यानी एक्जिट पोल के बाद भी उम्मीद की किरणें तो टिमटिमा ही रही हैं, लेकिन इससे बेचैनी समाप्त नहीं होती।

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