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चुनाव आयोग की विश्वनीयता का सवाल

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“पूरी दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाला चुनाव आयोग अगर स्वयं को इतना असहाय समझेगा तो लोकतंत्र की उस बुनियाद का क्या होगा, जो देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव कराने की आयोग की भूमिका पर ही पूरी तरह टिकी है।”
योगेश कुमार गोयल 22.05.2019

इस बार लोकसभा चुनाव प्रक्रिया के इस बेहद लंबे दौर में जिस प्रकार पहली बार चुनाव आयोग की भूमिका पर शुरू से लेकर आखिर तक उंगलियां उठती रही, वह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत के लिए सही नहीं है। बात कुछ राजनीतिक दलों या नेताओं द्वारा चुनाव आयोग की ईमानदारी और निष्पक्षता पर सवाल उठाने तक ही सीमित रहती तो मामला अलग होता किन्तु जिस प्रकार तीन चुनाव आयुक्तों में से एक अशोक लवासा ने चुनाव आयोग को कठघरे में ला खड़ा किया, उससे चुनाव आयोग की निष्पक्ष छवि को गहरा आघात लगा है।

क्रियाकलापों पर गंभीर सवाल

भले ही मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा बचाव की मुद्रा में दलील देते नजर आए कि मतभेद की स्थिति में बहुमत से फैसला करने का ही प्रावधान है किन्तु निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा के इस तर्क को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आयोग द्वारा असहमति के फैसलों को आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं किया गया। ऐसे में बैठकों में उनकी उपस्थिति निरर्थक हो जाती है। चुनाव आयोग की नियमावली के अनुसार मतभेद होने की स्थिति में भी सभी के विचारों को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना भी अनिवार्य है।

आयोग भले ही इसे आंतरिक मामला बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा हो, किन्तु इससे उसकी गरिमा को जो ठेस पहुंची है, उसकी भरपाई कौन करेगा? वैसे स्वतंत्र भारत के इतिहास में संभवत: यह पहला ऐसा चुनाव रहा, जहां बार-बार आयोग के फैसलों पर उंगलियां उठती रहीं और उसकी विश्वसनीयता का संकट बरकरार रहा। उस पर कई अवसरों पर एकतरफा फैसला लेने के गंभीर आरोप भी लगे। फिर भी उसने कभी ऐसा प्रयास नहीं किया कि आमजन को उसकी कार्यशैली संदिग्ध न लगे। यह पहली बार देखा गया, जब तमाम राजनीतिक दलों द्वारा देशभर में बड़े स्तर पर खुलकर आचार संहिता की धज्जियां उड़ायी गयी और किसी भी दल को चुनाव आयोग का रत्तीभर भी डर नजर नहीं आया। यह भी पहली बार हुआ, जब आयोग के क्रियाकलापों पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए उसकी निष्पक्षता को अदालत में चुनौती दी गयी। हद तो तब हो गयी जब सुप्रीम कोर्ट को निर्वाचन आयोग को उसकी शक्तियों का एहसास कराना पड़ा।

आयोग की गरिमा दांव पर

लोकतंत्र की सेहत के लिए देश के तमाम राजनीतिक दलों में चुनाव आयोग का कितना खौफ होना चाहिए, यह वर्तमान चुनाव आयुक्तों को शेषन सरीखे तत्कालीन चुनाव आयुक्त से सीखना चाहिए। यह शेषन का खौफ ही था कि उस वक्त कहा जाने लगा था कि भारतीय राजनेता सिर्फ दो चीजों से ही डरते हैं, एक ईश्वर और दूसरा शेषन से। शेषन के कार्यकाल से पहले ‘आदर्श आचार संहिता’ वास्तव में कागजों में ही सिमटी थी। उसे अमलीजामा पहनाकर उन्होंने कड़ाई से लागू कराने का कार्य किया था। वो शेषन ही थे, जिन्होंने चुनाव आयोग को सर्वशक्तिसम्पन्न और स्वायत्त संवैधानिक संस्था में परिवर्तित कर चुनाव आयोग को गरिमा प्रदान की थी किन्तु अगर आज आयोग की यही गरिमा पूरी तरह से दांव पर है तो क्या उसके लिए जिम्मेदार चुनाव आयोग नहीं है।

सवाल आयोग की निष्पक्षता या संवैधानिक संस्था के रूप में उसकी स्वायत्तता पर नहीं बल्कि सवाल उठता है उसकी क्षमता पर, जो तमाम अधिकारों के बावजूद आचार संहिता के गंभीर मामलों में भी कहीं दिखाई नहीं दी। ऐसा सिर्फ इसी चुनाव की बात नहीं है। पूरी दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाला आयोग अगर स्वयं को इतना असहाय समझेगा तो लोकतंत्र की उस बुनियाद का क्या होगा, जो देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव कराने की आयोग की भूमिका पर ही पूरी तरह टिकी है।

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