Mon. Oct 26th, 2020

अपना काम स्वयं करो

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24.04.2019

प्रख्यात शिक्षाविद् ईश्वर चन्द्र विद्या सागर को भला कौन नहीं जानता, जिनके त्याग, परोपकार, न्यायप्रियता, क्षमाशीलता के किस्से मशहूर हो चुके हैं। एक दिन की बात है, एक नवयुवक कलकत्ता स्टेशन पर रेल गाड़ी से उतरा और कुली-कुली पुकारने लगा। वह युवक अमीर घराने का था। हालांकि उसके पास इतना ही सामान था कि वह आसानी से ढो सकता था। लेकिन उसे यह सब करने की आदत नहीं थी। कुली नहीं मिलने से वह परेशान था। वह स्टेशन के प्लेटफार्म में एक तरफ खड़ा हो कर इधर-उधर नजरें दौड़ा रहा था। कुली नहीं मिलने से उसकी परेशानी बढ़ने लगी। उसकी परेशानी देख कर एक सज्जन व्यक्ति को उस पर दया आ गयी।

उन्हें लगा कि युवक की मदद करनी चीहिए। वह सीधे-सादे सज्जन उनके पास आये और बोले-‘कहां चलना है’, वह युवक किसी स्कूल में पढ़ने (ट्रेनिंग के लिए) आया था। इसलिए उसने स्कूल का नाम बताया। उस भद्र पुरुष ने युवक का सामान उठा लिया और स्कूल की ओर चलने लगे। स्कूल पास ही में था। जल्दी ही वह पहुंच गये। जब वह सामान रखकर जाने लगे तो युवक ने उन्हें इनाम देना चाहा। सामान ढोने वाले ने कहा-‘मुझे कोई इनाम नहीं चाहिए। अपना काम स्वयं करने की कोशिश करें यही मेरा इनाम है।, इतना कहकर वह आदमी चला गया।

अगले रोज जब वह विद्यार्थी कॉलेज पहुंचा तो प्रार्थना स्थल पर उसने देखा कि वह अदमी प्रधानाचार्य के उच्चासन पर विराजमान हैं। उसे काटो, तो खून नहीं। प्रार्थना के बाद जब विद्यार्थी अपनी-अपनी कक्षाओं में चले गये तो उसने प्रधानाचार्य के चरणों में अपना सिर रखकर माफी मांगी। प्रधानाचार्य थे-ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, जो किसी भी काम को छोटा नहीं समझते थे। उन्होंने अपने विद्यार्थी का सामान ढोकर उसे अच्छा सबक सिखाया और अपना काम स्वयं करने की प्रेरणा भी इसी बहाने दी। अब ढूंढे़ से भी ऐसे प्रधानाचार्य नहीं मिल पाते हैं।

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