Sun. Sep 27th, 2020

तरह-तरह के दूध

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“एक जमाना था जब दूध को बेचना गलत समझा जाता था। दूध हासिल करने के लिए गाय या भैंस के बछड़े को उसकी मां से अलग कर दिया जाता है। 70 के दशक के बाद श्वेत क्रांति के जनक वर्गीस कूरियन द्वारा आपरेशन फ्लड चलाया गया और इसमें भारत ने अमेरिका जैसे देश को दूध उत्पादन में पीछे छोड़ दिया था। हमारे देश में दूध को लोकप्रिय बनाने की जरूरत तब आन पड़ी थी, जब देश में कोका कोला और दूसरे शीत पेय का वर्चस्व हो गया था। लोगों को दूध पीने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु सरकार द्वारा कई विज्ञापन दिये गये। हमारे देश में गाय, बकरी, ऊंटनी, याक और गधी का दूध इस्तेमाल में लाया जाता है।”

गधी का दूध

गधी का दूध काफी हद तक मानव के दूध जैसा होता है। गधा एक ऐसा जानवर है जिसकी समाज में कोई प्रतिष्ठा नहीं है। ऐसे में गधी के दूध को भी लोग पीना अच्छा नहीं समझते। यह कफ, थकान और लिवर संबंधी बीमारियों के लिए फायदेमंद होता है। लोग इसके एक चम्मच दूध के लिए 50 रुपये तक खर्च करने के लिए तैयार होते हैं। यह कहना है एनआरसी यानी नेशनल रिसर्च सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.यशपाल का। कर्नाटक में लो फैट और आयरन से भरपूर गधी का दूध उन लोगों को लेने की सलाह दी जाती है, जिन्हें गाय और भैंस के दूध में मौजूद प्रोटीन से एलर्जी होती है।

यह अस्थमा के रोगियों के लिए भी फायदेमंद होता है। लेकिन इसके लिए वैज्ञानिक पुष्टि जरूरी होती है। तमिलनाडु और पुड्डूचेरी में बूढ़ी औरतें नवजात शिशुओं की आवाज को बढ़ाने के लिए मांओं को गधी का दूध पिलाने की सलाह देती हैं। कहते हैं कि इससे बच्चे के मस्तिष्क का विकास अच्छी तरह होता है। हालांकि इससे कुछ नवजात शिशुओं की मृत्यु भी हुई है। दक्षिण भारत में गधे पालने वाले ग्रामीण वहां के गांवों में जा-जाकर लोगों को गधी का ताजा दूध पेश करते हैं।

बकरी का दूध

बकरी के दूध से बने पनीर की दूसरे देशों में बहुत मांग है। नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनडीआरआई) के डॉ. राजन शर्मा का कहना है पूरे देश में दुग्ध उत्पादन में बकरी के दूध की आपूर्ति केवल 4 प्रतिशत होती है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और बिहार में बकरी पालक अतिरिक्त दूध ही बेचते हैं। गुजरात और राजस्थान में इसे सुनियोजित तरीके से उत्पादित किया जाता है।

केवल कुछ डेयरियों में ही इसे व्यावसायिक रूप से बेचा जाता है। इससे एक खास किस्म की गंध आती है और माना जाता है कि डेंगू और चिकनगुनिया के इलाज में इसका इस्तेमाल होता है। जिन दिनों लोग चिकन गुनिया से पीड़ित थे, इसकी कीमत बहुत बढ़ गई थी। पहले जहां यह 25 से 30 रुपये प्रति लीटर बिकता था तब इसे लोगों ने 1000 रुपये लीटर तक में बेचा था। ऐसा कहना है, सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च आॅन गोट्स में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनुपम कुमार दीक्षित का। बकरी के कच्चे दूध से कुछ लोगों की मौत होने के कारण वह इसे उबालकर पीने की सलाह देते हैं।

ऊंटनी का दूध

राजस्थान की कई आदिवासी जातियां मरूस्थल के जहाज को सदियों से पालती आ रही हैं। डॉ. रागवेंद्र सिंह का कहना है कि पहले कभी ऊंटनी के दूध को बेचा नहीं जाता था। माना जाता था कि जो इसे बेचेगा उसका पूरा परिवार ही खत्म हो जायेगा। लेकिन धीरे-धीरे सिकुड़ती चारा भूमि और सरकारी नीतियों में ऊंट पालने को अमान्य घोषित करने से इनकी संख्या में कमी आ गई। क्योंकि अब इसे ट्रांसपोर्ट में इस्तेमाल नहीं किया जाता। लेकिन साल 1996 में राइका जनजाति द्वारा पशुधन को बढ़ावा देने के लिहाज से जर्मनी के रिसर्चर के साथ मिलकर हनवंत सिंह नाम के एक व्यवसायी ने ‘लोकहित पशु पालक’ संस्थान की स्थापना की।

साल 2010 में उन्होंने ऊंटों की ब्रीडिंग द्वारा लोगों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने पर बल दिया और ऊंट से जुड़े उत्पाद जैसे दूध, ऊन और गोबर की नयी चीजें इजाद कीं। पाली और रणकपुर में आप इन चीजों को उनके स्टोर से ले सकते हैं या उनकी वेबसाइट पर जाकर घर पर भी मंगवा सकते हैं। ‘नेशनल रिसर्च सेंटर्स आन कैमल इन बीकानेर’ द्वारा ऊंटनी के दूध पर अध्ययन किया जा रहा है, उनके अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि ऊंटनी का दूध टाइप वन डायबिटीज के उपचार में इस्तेमाल होता है। इनके द्वारा ऊंटनी के दूध से पेड़े, बर्फी और दूध पाउडर बनाया जा रहा है और गुजरात में इस पर और भी रिसर्च की जा रही है। अमूल ने आधे किलो लीटर के दूध के बोतल बनाये हैं, पूरी दुनिया में इसे अब खनिज लवणों से भरपूर सुपर फूड माना जाता है और इससे लिवर तथा किडनी संबंधी बीमारियों का इलाज होता है।

गाय और भैंस का दूध

गाय का दूध पतला होता है। भैंस के दूध में गाढ़ापन होता है। भारत में कुल दुग्ध उत्पादन में 96 प्रतिशत भैंस के दूध का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि गाय की तुलना में भैंस को ज्यादा महत्ता दी जाती है। हमारे देश में भैंस के दूध की ज्यादा मांग है। उत्तरी और पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में भैंस का दूध, दक्षिण और पूर्वी भारत में गाय के दूध को श्रेष्ठ माना जाता है। खोया भैंस के दूध से अच्छा बनता है जबकि गाय के दूध से रसगुल्ला अच्छा बनता है। गाय के दूध का चिकित्सीय महत्व है। भारतीय डेयरी दुग्ध उत्पादन कंपनियां ज्यादा से ज्यादा दूध पीने को प्रचारित करती हैं।

याक का दूध

याक पर्वतीय क्षेत्रों में बहुत ज्यादा ऊंचाई पर पाये जाने वाला जानवर है। भारत में यह सिक्किम, गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में पाया जाता है। बौद्ध धर्म में इसे धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है। अरुणाचल प्रदेश में मोमपाश 5000 से 10,000 की ऊंचाई पर पाये जाने वाले मिथुन और याक की संकर प्रजातियां तैयार की जाती है। इन जगहों पर स्थानीय लोग याक के दूध से पनीर और मिठाइयां बनाते हैं और इसे लोग बेचते भी हैं। इसमें वसा काफी ज्यादा होती है। याक चूंकि एलपाइन घास चरते हैं इसलिए इनके दूध में प्रोटीन होती है। नये दौर के याक की प्रजातियां कठिन परिश्रम करने वाली नहीं हैं, जिसके कारण इनकी संख्या में लगातार घटोत्तरी हो रही है।

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