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क्रूर राजा और संत

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22.05.2019

प्राचीन काल में एक अत्यंत निर्दयी और क्रूर राजा था। दूसरों को पीड़ा देने में उसे बड़ा आनंद आता था। उसने आदेश दे रखा था कि उसके राज्य में हर सप्ताह एक अथवा दो आदमियों को फांसी लगनी ही चाहिए। उसके इस क्रूर व्यवहार से प्रजा बहुत दुखी हो गयी थी। एक दिन उस राजा के राज्य के कुछ वरिष्ठजन इस समस्या को लेकर एक प्रसिद्ध संत के पास पहुंचे और बोले-महाराज! हमारी रक्षा कीजिए। यदि राजा का लोगों यह विवेकहीन क्रम जारी रहा तो नगर खाली हो जाएगा। संत भी काफी दिनों से यह देख-सुन रहे थे।

उन्होंने इस संबंध में राजा से मिलने का फैसला किया। वे अगले ही दिन दरबार में जा पहुंचे। राजा ने उनका स्वागत किया और आने का प्रयोजन पूछा। तब संत बोले-मैं आपसे एक प्रश्न करने आया हूं। यदि आप शिकार खेलने जंगल में जाएं और मार्ग भूलकर भटकने लगें और प्यास के मारे आपके प्राण निकलने लगें, ऐसे में कोई व्यक्ति गंदा पानी लाकर आपको इस शर्त पर पिलाए कि तुम आधा राज्य उसको दे दोगे तो क्या तुम उसकी शर्त मानोगे? राजा ने कहा-प्राण बचाने के लिए मुझे उसे आधा राज्य देना ही होगा।

संत पुन: बोले. अगर वह गंदा पानी पीकर तुम बीमार हो जाओ और तुम्हारे प्राणों पर संकट आ जाए, तब कोई वैद्य तुम्हारे प्राण बचाने के लिए शेष आधा राज्य मांग ले तो क्या करोगे? राजा ने तत्क्षण कहा. प्राण बचाने के लिए वह आधा राज्य भी दे दूंगा। जीवन ही नहीं तो राज्य कैसा? तब संत बोले-अपने प्राणों की रक्षा के लिये आप राज्य लुटा सकते हैं तो दूसरों के प्राण क्यों लेते हैं? संत का यह तर्क सुनकर राजा को चेतना आयी और वह सुधर गया।

संदेश : शासकों को अपने अधिकारों का उपयोग हर हाल में लोकहित में और विवेक सम्मत ढंग से करना चाहिए।

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