April 18, 2021

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महंगाई से मुकाबला बड़ी चुनौती

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तेजी से बढ़ती महंगाई के लिए मुनाफाखोरी तो एक बड़ी वजह है ही लेकिन मुनाफाखोरी से भी बड़ी वजह कम उत्पादन की है। खाने-पीने की जिन चीजों के दाम तेजी से बाजार में बढ़े हैं, उनका उत्पादन इस वर्ष किसानों ने कम किया है।

नरेंद्र देवांगन; 17.05.2019

महंगाई से पूरा देश परेशान है। सबसे बड़ी परेशानी की बात यह है कि महंगाई का सबसे ज्यादा असर खाने-पीने की वस्तुओं पर पड़ा है। खाने के सामान के साथ सब्जी, दूध और फलों के दाम आम जनता की पहुंच से दूर हो गए हैं। सबसे बड़ी परेशानी की बात यह है कि महंगाई का लाभ उन किसानों को नहीं मिल रहा है जो मेहनत करके खाने-पीने की चीजों, सब्जियों और फलों का उत्पादन करते हैं। इन चीजों के थोक बाजार और फुटकर भाव में भी बहुत अंतर है।

जानकारों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के फलस्वरूप देश में ममहंगाई की नयी खेप आने वाली है। इस संकट से निपटने के लिये लोकसभा चुनाव के बाद नयी सरकार को पूरी सावधानी के साथ नीतिगत सतह पर ठोस तैयारी करनी होगी। नयी सरकार को इस सामान्य गणित को ध्यान में रखना होगा कि महंगाई में तब तक कमी नहीं आयेगी जब तक खाद्यान की कीमतें कम करने के उपाय नहीं किये जाएंगे।

कम उत्पादन का असर
तेजी से बढ़ती महंगाई के लिए मुनाफाखोरी तो एक बड़ी वजह है ही लेकिन मुनाफाखोरी से भी बड़ी वजह कम उत्पादन की है। खाने-पीने की जिन चीजों के दाम तेजी से बाजार में बढ़े हैं, उनका उत्पादन इस वर्ष किसानों ने कम किया है। आलू और अरहर की दाल इसके बड़े उदाहरण हैं। 2007 की स्थिति को याद करें। इस वर्ष आलू का उत्पादन बहुत हुआ था। आलू की भरपूर फसल का प्रभाव यह हुआ कि बाजार में आलू की कीमत गिर गयी। आलू फुटकर बाजार में 5 रुपए प्रति किलो से ऊपर नहीं गया। थोक बाजार में आलू की कीमत 2 रूपए किलो से भी कम थी जिससे किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ा। इसका असर यह हुआ कि अगले साल 2008 में आलू की खेती घट गयी और आलू का भाव सबसे आगे निकल गया। आलू जैसा ही हाल गन्ने का भी हुआ है।

गन्ने की कीमत को लेकर किसान सरकार, चीनी मिल और अदालत के बीच पिसता जा रहा है। इससे गन्ने की बोआई का रकबा घटता जा रहा है। सरकारी आंकड़ों में भले ही यह कहा जाता हो कि गन्ने की बोआई का रकबा कम घटा है पर हकीकत में गन्ने की बोआई बहुत कम हो गयी है। पहले लोग धान व गेहूं की खेती न करके गन्ने की खेती करते थे। चीनी मिलें अक्टूबर से शुरू होकर अप्रैल तक चलती थीं। इसके बाद भी पूरा गन्ना नहीं कट पाता था। इसके अलावा बहुत सा गन्ना गुड़ बनाने के काम भी आता था। अब ऐसा नहीं है।

अब गन्ने की जगह गेहूं, आलू और सब्जियों की खेती बढ़ गयी है। दलहन फसलों के साथ भी ऐसा ही हुआ है। दलहन फसलों की कमी की सबसे बड़ी वजह कम उत्पादन है। इसके अलावा बंदर और नीलगाय जैसे पशुओं से इन फसलों को बचाना बड़ी परेशानी की बात होती है। इसके चलते दलहन फसलों के दाम भी बढ़े। एक तरफ पैदावार कम हो रही है तो दूसरी ओर कारोबारी मुनाफाखोरी में लगे हैं जिससे जनता को चीजों के दाम ज्यादा चुकाने पड़ रहे हैं। साथ ही नरेगा के चलते गांव में मजदूरी बढ़ गयी है। अब गांव में मजदूर 100 रुपए प्रतिदिन से कम पर नहीं मिलते। इन मजदूरों के शहर में न आने से शहर में मजदूरों की संख्या घट गयी है। मांग ज्यादा होने के कारण शहरों में मजदूरी बढ़ गयी है।

खर्च पर अंकुश जरूरी
बिजली की कमी के कारण लोगों ने डीजल और पेट्रोल से काम चला रहें हैं जिससे खेती की लागत बढ़ गयी है। डीजल, पेट्रोल के दाम बढ़ने से सामानों की ढुलाई का खर्च बढ़ा गया है इसका असर चीजों के दाम पर पड़ रहा है। महंगाई बढ़ी तो भी राज्य सरकारों ने करों का शिकंजा मजबूत रखा। यही वजह है कि केंद्र सरकार महंगाई को घटाने के लिए जो भी उपाय कर रही है उसका प्रभाव कम पड़ रहा है। बढ़ती महंगाई का मुकाबला करने के लिए बढ़ते खर्चों को कम करने का भी एक सिद्धांत है जिसे जनता बिना किसी सरकारी दबाव के कर सकती है। शादी-विवाह, तीज-त्योहारों में बढ़ती खरीदारी को देखते हुए कहा जा सकता है कि जनता ने अपने खर्चे कम करने की कोई कोशिश नहीं की है। बढ़ती महंगाई का मुकाबला करने के लिए हर तरफ से प्रयास होने चाहिए। कारोबारियों पर जमाखोरी का आरोप लगाकर उनका शोषण करने के लिए सरकारी नौकरों को अधिकार तो दिए जा सकते हैं लेकिन उससे समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता।

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