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‘खबरदार! जिहादी मदरसों को छूना सख्त मना है’!, दिवालिया पाकिस्तान पर मंडरा रहा ‘ब्लैक लिस्ट’ में आ जाने का खतरा

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“पाकिस्तान की तबाही का एक बड़ा कारण है वहां कट्टरपंथी मदरसों की तेजी से बढ़ती संख्या। पाकिस्तान के शिक्षा मंत्री शफकत महमूद ने एक बयान में कहा है कि 1947 में पाकिस्तान में मदरसों की संख्या 247 थी जो अब बढ़कर 30,000 से अधिक हो गयी है। यह कोई बड़ा तथ्योद्घाटन नहीं है। इस बयान की अहमियत बस इतनी है कि पाकिस्तान सरकार के एक बड़े सत्ताधिकारी ने एक बार फिर यह कबूल किया है कि बहुत-से मदरसे आतंकवाद के प्रशिक्षण स्थल बन गये हैं।”

“उधर आतंकवाद को पालते-पोसते रहने वाली पाकिस्तान सरकार की मजबूरी यह है कि यदि वह भस्मासुर बन चुकी आतंकवाद की इन फैक्टरियों पर अंकुश नहीं लगाती तो आर्थिक दिवालियेपन की स्थिति का सामने कर रहे पाकिस्तान को फाइनेंशनल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ब्लैक लिस्ट में रख दिये जाने का खतरा उत्पन्न हो जायेगा, जिससे उसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं यथा वर्ल्ड बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि से वित्तीय सहायता नहीं मिल पायेगी।”

बलबीर दत्त

पाकिस्तान की तबाही का एक बड़ा कारण है वहां कट्टरपंथी मदरसों की तेजी से बढ़ती संख्या। पाकिस्तान के शिक्षा मंत्री शफकत महमूद ने एक बयान में कहा है कि 1947 में पाकिस्तान में मदरसों की संख्या 247 थी जो अब बढ़कर 30,000 से अधिक हो गयी है। यह कोई बड़ा तथ्योद्घाटन नहीं है। इस बयान की अहमियत बस इतनी है कि पाकिस्तान सरकार के एक बड़े सत्ताधिकारी ने एक बार फिर यह कबूल किया है कि बहुत-से मदरसे आतंकवाद के प्रशिक्षण स्थल बन गये हैं।

इसके कोई दो वर्ष पूर्व पाकिस्तानी फौज की खुफिया एजेंसी आईएसआई के जनसंपर्क डाइरेक्टर-जनरल मेजर जनरल आसिफ गफूर ने एक प्रेस कांफे्रंस में यही बात कहीं थी, लेकिन इसके साथ ही यह दावा किया था कि सब मदरसों में आतंकवाद की शिक्षा नहीं दी जाती।

केवल सौ मदरसे ही ऐसे हैं जहां आतंकवादियों को प्रशिक्षण मिल रहा है। उनकी इस बात का पाकिस्तान में शायद ही किसी ने यकीन किया हो, क्योंकि विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी कुछ और ही बताती है। सौ से अधिक मदरसे तो अकेले हाफिज सईद ही अपनी दीनी तालीम के अंतर्गत चला रहा है।

कोई समय था जब इन मदरसों ने स्वयं को धार्मिक शिक्षा तक सीमित रखा हुआ था, जहां छात्रों को बेदाग, ईमानदार और बेहतर जिंदगी बसर करने की तालीम दी जाती थी। लेकिन आज मदरसे की आड़ में ऐसी बहुत-सी संस्थाएं आ गयी हैं जो आतंकवाद की ट्रेनिंग देती हैं। यही कारण है कि सही ढंग से चलने वाली इसलामी पाठशालाओं पर भी अंगुलिया उठने लगी हैं। तालिबानी असर के कारण इन छद्म इसलामी पाठशालाओं ने इसलाम की सूरत और मूरत बिगाड़ दी है।

सरकार से अधिक ताकतवर मदरसा लॉबी

इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए पाकिस्तानी पत्रिका ‘न्यूजवीक’ (Newsweek) के सलाहकार संपादक खालिद अहमद ने When madrasa challenges state (जब मदरसा हुकूमत को चुनौती दे) शीर्षक अपने लेख में लिखा- Nobody ever thought that madrasas in Pakistan would become powerful enough to challenge the state itself. They have become the most powerful civil society element capable of challenging the state to sell-correction. This ideology of Pakistan has finaly wrenched the monopoly of violence from the state and established the clergy as the arbiter of state behaviour. Lawyers, military personnel, doctors, teachers serving in the state sector, journalists and the unemployed supplement the power of seminarian boys, who form the front line as against the state without knowing it. Pakistan tells the world it does not know where Azhar is today. His madrasa in Bahawalpur is flourishing as one of the watering holes of Taliban killers roaming in Pakistan.
(किसी ने कभी यह सोचा नहीं था कि पाकिस्तान में मदरसे इतने ताकतवर हो जायेंगे कि हुकूमत को ही चुनौती देने लगेंगे। सिविल सोसाइटी में वे सर्वाधिक शक्तिशाली हस्ती बन गये हैं, इतने कि वे हुकूमत को दुरुस्त हो जाने के लिए ललकार सकते हैं।

पाकिस्तान की इस विचारधारा ने राजसत्ता से हिंसा का एकाधिकार छीन लिया है और धर्माधिकारियों को अंतिम रूप से सत्ता के आचरण के निर्णयकर्ता के रूप में स्थापित कर दिया हैं। वकीलों, सैन्यकर्मियों, डाक्टरों, सरकारी क्षेत्र में सेवारत शिक्षकों, पत्रकारों और बेरोजगार वर्गों ने इन तालीमी इदारों के उन लड़कों की ताकत में इजाफा कर दिया है, जोे बिना जाने राज सत्ता के विरुद्ध अग्रिम मोर्चे का रूप धारण कर चुके हैं।

पाकिस्तान दुनिया को बताता है कि उसे नहीं मालूम कि अजहर आज कहां है। बहावलपुर में उसका मदरसा फल-फूल रहा है- पाकिस्तान में घूमने-फिरने वाले तालिबानी कातिलों के एक जलगर्त्त के रूप में।)

जनरल जिया ने अपने कार्यकाल (1977-1988) में सत्ता पर कब्जा बनाये रखने के लिए विपक्षी पार्टियों के विरुद्ध कट्टरपंथी पार्टियों को बढ़ावा दिया। अफगान युद्ध के बाद पाकिस्तान में कट्टरवादी मदरसों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी।

1980 के दशक में अफगानिस्तान में अमेरिका के सहयोग से छेड़े गये सोवियत-विरोधी जिहाद और फिर अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद तालिबानी जेहनियत ने अपना रंग दिखाना शुरू किया। अफगान तालिबान के मुल्ला उमर अख्तर मसूर और जलालुद्दीन हक्कानी तथा तहरीक-एक-तालिबान पाकिस्तान के हकीमुल्ला और मुल्ला फजलुल्लाह सभी मदरसों की उपज हैं।

गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान में मदरसों की संख्या 30,000 नहीं, कम-से-कम 36,000 है। जुलाई 2015 में मदरसों की स्थिति पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में मदरसों की संख्या 35,000 के पार बतायी गयी। इनमें 26,000 मदरसे रजिस्टर्ड बताये गये।

जिन मदरसों ने खुद को रजिस्टर्ड नहीं कराया है, उनके खिलाफ कार्रवाई करने की सरकार की हिम्मत नहीं, क्योंकि कट्टरपंथी धार्मिक संगठनों का कहना है कि सरकार को मजहबी तालीम में दखल देने का कोई हक नहीं है। नवाज शरीफ की सरकार के कार्यकाल में जब यह बात उठी तब उन्होंने कहा कि मदरसे परमपावन हैं, उनकी कोई जांच नहीं की जायेगी।

आधुनिक शिक्षा से अनभिज्ञ मदरसा छात्र

पाकिस्तान के एक पूर्व गृहमंत्री चौधरी निसार अली खान का कहना था कि केवल 10 प्रतिशत मदरसे आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न हैं। यदि इसे सही माना जाये तब भी मदरसों में पढ़ने वालों की संख्या 1,50,000 से 3,00,000 के बीच होगी। इन्हें संभावित आतंकवादी कहा जा सकता है। यदि इनमें मात्र एक प्रतिशत को ही आत्मघाती बमबाज माना जाये तब भी इनकी संख्या 3000 के आसपास होगी।

यदि वे खुद को बम से नहीं भी उड़ा दे तब भी उनके द्वारा हासिल की गयी तालीम हिंसक मनोवृत्ति के कारण समाज के लिए नुक्सानदेह ही साबित होगी। बाकी 90 प्रतिशत के बारे में क्या अनुमान लगाया जाये? पाकिस्तानी अंगरेजी दैनिक ‘द नेशन’ (The Nation) के अनुसार मदरसों से निकले ये छात्र सीधे आतंकी गतिविधियों में लिप्त न भी हों तब भी यकीनन वे आतंकवाद के लिए सहायक माहौल पैदा कर सकते हैं।

अखबार ने लिखा- The students that graduate from these instuitutes about 2,00,000 a year, have only ever been educated in religion. They have no marketable talents, little experience of the outside world and the only social setting they feel comfortable is in the only one they have known. Composed of segregated jealous acolytes. They inevitably fail in the outside world and return to this one track world where advancement is limited and intraction with terrorists highly probable.
(इन संस्थानों से निकलने वाले छात्रों को, जिनकी संख्या हर साल करीब 2,00,000 होती है, हमेशा धर्म के बारे में ही शिक्षा दी गयी होती है। वे मार्केट में अपनी काबिलियत के बल पर रोजगार प्राप्त करने की स्थिति में नही होते। उन्हें बाहरी दुनिया का कोई तजरुबा नहीं होता।

वे सिर्फ अलग-थलग रहने वाले कट्टरपंथी खिदमतगारों के बने हुए सामाजिक वातावरण को ही जानते हैं और इसी में खुद को सहज महसूस करते हैं। वे बाहरी दुनिया में अनिवार्य रूप से असफल होते हैं और इस एक लीक वाली दुनिया में लौटते हैं, जहां आगे बढ़ने की हद काफी छोटी होती है और आतंकवादियों से अंतरसंपर्क की संभावनाएं बहुत अधिक रहती हैं।)

सोने का अंडा देने वाली मुर्गी

पाकिस्तान के लिए सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी स्थिति बहुत विकट होती जा रही है। बताया जाता है कि इन मदरसों में करीब 20 लाख बच्चे पढ़ते हैं। लाखों गरीब बच्चों के पास मदरसों के अलावा शिक्षा का कोई और जरिया नहीं हैं। एक और समस्या है मौलवियों द्वारा इन बच्चों के यौन शोषण की घटनाएं, जो इतनी अधिक बढ़ गयी हैं कि सरकार को सूझ नहीं रहा है कि वह इनसे कैसे निपटे। इस समस्या का एक और पहलू है।

आज स्थिति यह है कि पाकिस्तान में जिहाद ने सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का रूप ग्रहण कर लिया है। जिहाद को जिंदा रखने के लिए विदेशों से, विशेषकर खाड़ी देशों और सऊदी अरब में रहने वाले प्रवासी पाकिस्तानी मुसलमानों और अन्य स्रोतों से, चंदे के रूप मे बेपनाह दौलत मिलती है।

इसके अलावा घरेलू स्तर पर भी पैसे की कोई कमी नहीं है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तान के जिहादी मानसिकता के रिटायर्ड फौजी अफसरों से भी भारी रकम मिलती है। कुछ लोगों ने तो जिहाद को पैसा बनाने का धंधा बना लिया है।

मसजिदों के बाहर असली-नकली तंजीमों के बैनर लगाकर अल्लाह के नाम पर जिहाद के लिए धन संग्रह करते हैं। विदेशों से प्राप्त होने वाले धन का हिसाब-किताब करना निहायत मुश्किल है। फिर भी अप्रैल 2014 में सीनेट में एक एक सवाल के जवाब में बताया गया कि एक साल में सऊदी अरब और चार अन्य इसलामी देशों- कत्तर, यूएई, बहरीन और कुवैत- ने पाकिस्तान के 15 तालीमी इंदारों को 25 करोड़ 80 लाख रुपये मुहैया कराये। विदेशों से कुछ पैसा बैंकों के जरिये आता है भांति-भांति के खातों में। इसका सुराग पा लेना काफी मुश्किल होता है। बहुत-सा पैसा हवाला और हुंडी के माध्यम से आता है।

‘ब्लैक लिस्ट’ में डाल दिये जाने का खतरा

मदरसों के प्रति पंजाब सरकार का रवैया जहां काफी नरम रहा है, वहीं खैबर पख्तूनख्वा सरकार उन पर मेहरबान रही है। इमरान खान के मुख्य मंत्रित्व काल में मात्र एक ही मदरसे दारुल-उलमा-हक्कानिया को 30 करोड़ रुपये की मदद दी गयी। इसकी आलोचना होने पर स्पष्टीकरण दिया गया कि यह रकम सिर्फ नये भवन खंडों के निर्माण के लिए दी गयी है, किसी और काम के लिए नहीं।

पाकिस्तान की एक प्रसिद्ध पत्रिका ‘हेरल्ड’ (Herald) ने कुछ अरसा पूर्व खुलासा किया था कि आतंकियों को विभिन्न स्रोतों से प्राप्त धन का प्रयोग भारत में, विशेषकर जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में, आतंकी कार्रवाइयों को तेज करने में होता है। आतंकी संगठन बाकायदा परचे जारी करके अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, इजराइल और भारत को अपना दुश्मन बताते हैं।

नोट करने लायक बात यह है कि जिहाद के लिए ‘शहीद’ होने वालों को जन्नत नसीब होने की बात करने वाले अपने बच्चों और रिश्तेदारों को जन्नत की राह पर नहीं चलने देते। इस प्रकरण में एक निहायत दिलचस्प बात यह है कि कई बड़े मदरसे, जो स्वयं को यूनिवर्सिटी स्तर का समझते हैं अपने छात्रों को जिहादी एम.ए. (M.A.) और जिहादी पीएच.डी. (Ph.D.) की डिग्रियां भी जारी करते हैं।

पाकिस्तान में सरकार द्वारा प्रस्तावित किये गये उसे कानून का पुरजोर विरोध किया जा रहा है जो मसजिदों और इसलामी मदरसों को प्राप्त होने वाले धन और कामकाज की निगरानी का सरकार को अधिकार देता है। मुल्ला-मौलवी और कट्टरपंथी इसलामी नेता इस प्रस्तावित कानून का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आये हैं।

उधर आतंकवाद को पालते-पोसते रहने वाली पाकिस्तान सरकार की मजबूरी यह है कि यदि वह भस्मासुर बन चुकी आतंकवाद की इन फैक्टरियों पर अंकुश नहीं लगाती तो आर्थिक दिवालियेपन की स्थिति का सामने कर रहे पाकिस्तान को फाइनेंशनल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ब्लैक लिस्ट में रख दिये जाने का खतरा उत्पन्न हो जायेगा, जिससे उसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं यथा वर्ल्ड बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि से वित्तीय सहायता नहीं मिल पायेगी।

जानकार सूत्रों का कहना है कि मदरसों की रजिस्ट्री और उन पर कथित निगरानी, यहां तक कि पाठयक्रम में परिवर्तन का भी मात्र मामूली प्रभाव पड़ेगा। असली असर तब होगा जब आतंकी गुटों को पालने वाली सरकारी एजेंसियों तथा पाकिस्तान सरकार के एजेंडे को चलाने के लिए मदरसो से निकले रंगरूटों की भरती करने वाले आतंकी गुटों के बीच गठजोड़ समाप्त किया जायेगा। सरकार को मदरसों को मुख्य धारा में लाने के लिए एक यथार्थ परक प्लान बनाना होगा।

 

 

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