Thu. Sep 19th, 2019

बेहतर विकल्प है अक्षय ऊर्जा

1 min read

हमारे घरों, गलियों, मोहल्ले-बाजारों, गांवों, शहरों आदि को रोशन करने वाली बिजली हम किस कीमत पर, किन स्त्रोतों से हासिल करते हैं यह समझना जरूरी है। भारत सरकार के केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण की अप्रैल-2019 की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रतिवर्ष, प्रतिव्यक्ति 1,181 किलोवाट बिजली का उपभोग किया जा रहा है। वर्ष 2005-06 से 2018-19 के दौरान प्रति व्यक्ति उपभोग में लगभग दो गुना वृद्धि दर्ज की गयी है। बिजली उत्पादन के आंकड़े प्रतिदिन बदलते रहते हैं और उसका बाजार भी अर्थशास्त्र के मांग और आपूर्ति के नियम पर आधारित हो गया है। भारत सरकार के राष्ट्रीय पावर पोर्टल के अनुसार वर्तमान स्थिति में देश में 3,56,817.60 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है जो कुल मांग से 2.41 प्रतिशत कम है। देश में परम्परागत स्रोतों, जिसमें 63.41 प्रतिशत ताप-विद्युत (थर्मल-पॉवर), 12.70 प्रतिशत पन-विद्युत (हाइड्रो-पॉवर) उत्पादित की जा रही है।

कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि

ताप-विद्युत संयंत्रों की पर्यावरणीय चुनैतियां हैं। देश के केवल सार्वजनिक क्षेत्र के 128 ताप-विद्युत स्टेशनों में रोज करीब 18.17 लाख टन कोयले की खपत हो रही है। कोयले से बिजली उत्पादन पर्यावरण के लिए कितना घातक है, इसे अमेरिका के वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के सुब्रत चक्रवर्ती द्वारा वर्ष 2018 में प्रकाशित शोधपत्र से समझा जा सकता है। उनके मुताबिक वर्ष 2005 से 2013 के बीच भारत में 25.54 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड (बव2)उत्सर्जित हुई और इसी दौरान उसमें प्रतिवर्ष 5.5 प्रतिशत की वृद्धि होती रही है। देश में प्रति व्यक्ति ऊर्जा उत्सर्जन 4 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। रिपोर्ट यह तथ्य भी उजागर करती है कि भारत में 2005-2013 के बीच कुल कार्बन उत्सर्जन में 68 प्रतिशत उत्सर्जन का कारण ऊर्जा क्षेत्र था और ऊर्जा क्षेत्र में भी 77 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन बिजली उत्पादन से होता है।

हमारी ऊर्जा जरूरतों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग और उसके दुष्परिणाम पर्यावरणीय असंतुलन और संयंत्रों के तीखे विरोध के रूप में सामने हैं। ऐसे में बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारे सामने क्या विकल्प हैं, इसे समझना जरूरी है। क्या गैर-परम्परागत ऊर्जा परियोजनाएं बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहतर विकल्प हो सकती हैं? दुनियाभर में बायोमास, बायोगैस, दीप्तिमान ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, वायु ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा आदि गैर-परम्परागत स्रोतों से बिजली पैदा की जाती है। देश में 21.96 प्रतिशत बिजली गैर-परम्परागत स्रोतों के माध्यम से पैदा की भी जा रही है जिसमें प्रमुख रूप से विंड (50.53 प्रतिशत), सोलर (35.74 प्रतिशत) और बायोमास (13.73 प्रतिशत) हैं। भारत सरकार की राष्ट्रीय पवन-सौर स्वच्छता नीति-2018 के अनुसार पवन-सौर उर्जा के मौजूदा लगभग 80 गीगावॉट उत्पादन को वर्ष 2022 तक 175 गीगावॉट तक ले जाना है, अर्थात वर्तमान उत्पादन में दो गुनी से ज्यादा वृद्धि करना होगी। केन्द्र सरकार की मार्च 2019 की एक केबिनेट बैठक में 15 वें वित्त आयोग के अंतर्गत वर्ष 2020-21 से 2024-25 के दौरान गैर-परम्परागत ऊर्जा के लिए 1,48,302 करोड़ रुपए के बजट प्रावधान का प्रस्ताव रखा गया था। अक्षय ऊर्जा देश की जरूरतों का प्रमुख विकल्प है, जो पर्यावरण के अनुकूल होने के अलावा टिकाऊ भी है।

अक्षय ऊर्जा की चुनौतियां

अक्षय ऊर्जा की भी अपनी कुछ चुनौतियां हैं जिन्हें समझना जरूरी है। अक्षय ऊर्जा के स्रोत विंड, सोलर और बायोमास हैं, परन्तु इनके उपकरणों का निर्माण नगण्य है। अधिकांश उपकरण आयात करने पड़ते हैं। नतीजे में इससे उत्पादित बिजली महंगी तो पड़ती ही है, साथ ही इसका भार अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा और विकसित तकनीक के परिणाम स्वरुप वर्ष 2010 से अब तक विंड ऊर्जा में 20 प्रतिशत और सोलर ऊर्जा में लगभग 75 प्रतिशत केपिटल-कास्ट कम हो गयी है। अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में अनुभव रहा है कि प्लांटों को लगाते समय पर्यावरणीय हितों से समझौता कर लिया जाता है। देश और दुनिया के सामने ऊर्जा, खासकर बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए सीमित प्राकृतिक संसाधन, पर्यावरण असंतुलन और विस्थापन जैसी चुनौतियां हैं। इनसे निपटने के लिए अक्षय ऊर्जा एक बेहतर विकल्प है, परन्तु इसके लिए निवेश के साथ निर्माण के कदम उठाने होंगे। बिजली उत्पादन के गैर-परंपरागत स्रोतों को कुछ इस तरह स्थापित करना होगा जिससे पर्यावरणीय और मानवीय पक्षों की अनदेखी होने की लापरवाहियां न होने पाएं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

shares
error

Enjoy this blog? Please spread the word :)