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नेपाल-पाक मैत्री भारत के लिए खतरे की घंटी

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नेपाल से भारत के संबंध सामान्य पड़ोसियों जैसे नहीं हैं। भारत-नेपाल संबंधों के मूल में धर्म और संस्कृति का अटूट रिश्ता भी है। भारत ही उसे पूरे विश्व से जोड़ता भी है। इसलिए वे चीन और पाकिस्तान से संबंधों को मजबूत करने में बहुत ज्यादा हड़बड़ी न दिखाएं तो अच्छा रहेगा।

आर.के. सिन्हा; 27.03.18

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नेपाल एक संप्रभुत्ता संपन्न देश है , इसलिए उसकी विदेश नीति में भारत या कोई भी अन्य देश दखल नहीं दे सकता। पर नेपाल-पाकिस्तान के संबंधों में बढ़ती घनिष्ठता को तो भारत कदापि अनदेंखी नहीं कर सकता। इसलिए बीते दिनों जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी काठमांडू के दो दिनों के दौरे पर गए तो भारत की उन पर पूरी नजर थी। अब्बासी नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के आमंत्रण पर नेपाल गए थे। ओली मूलत: चीन के करीबी मने जाते हैं।

भारत की चिंता
भारत की चिंता स्वाभाविक है। भारत को अब अपनी आतंरिक सुरक्षा व्यवस्था को और चुस्त करने की जरूरत होगी। कारण जाहिर है कि पाकिस्तान की घोर भारत विरोधी खुफिया एजेंसी आईएसआई अब नेपाल के रास्ते भारत में अस्थिरता फैलाने की तैयारी कर सकती है। उसका तो यही इतिहास ही रहा है। वर्ष 1999 में आईएसआई के इशारे पर ही भारतीय यात्री विमान आईसी 814 को काठमांडू से हाइजैक किया गया था और इस विमान को हाइजैक करने की साजिश नेपाल में ही रची गयी थी। उस घटना के बाद से नेपाल आईएसआई की भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र रहा है जिस पर मुश्किल से भारत काबू पाने के लिए संधर्ष कर रहा है।

पहली नजर में तो लगता है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी नेपाल के साथ अपने देश के संबंध प्रगाढ़ करने के प्रयास में ही काठमांडू गए थे। वहां उन्होंने अपने नेपाली समकक्ष केपीशर्मा ओली के साथ विस्तार से विभिन्न मसलों पर बातचीत भी की। उन्होंने दक्षेस को दोबारा जीवंत करने की प्रक्रिया पर भी चर्चा की। ओली के नेपाल का प्रधानमंत्री बनने के बाद पाकिस्तान की किसी शिखर हस्ती की यह पहली यात्रा थी।

आईएसआई होगी एक्टिव
भारत को आखिरकार इस बात से क्यों तकलीफ होगी कि किसी भी दो अन्य देशों में संबंध प्रगाढ़ हो रहे हैं। दरअसल भारत इसलिए इस बेमेल दोस्ती से चिंतित है क्योंकि भारत-नेपाल की 2200 किलोमीटर लम्बी सीमाएं खुली हैं। दोनों देशों के लोग एक-दूसरे के देशों में आते-जाते रहते हैं। बस, इसी नाजुक स्थिति का फायदा उठाना चाहेगी आईएसआई। वो भारत में अपने गुर्गों के माध्यम से आतंक फैलाने का मंसूबा पाल सकती है। वो भारत में बरसों से जाली नोटों की खेप की सप्लाई करती ही रही है। कुछ समय पहले ही बिहार के बेतिया जिले से गिरफ्तार आईएसआई के गुर्गों ने जो खुलासा किया वह तो बेहद चौंकाने वाला था। उन्होंने यह बताया था कि यूपी और बिहार में सक्रिय नेटवर्क नेपाल के रास्ते भारत में नए जाली नोटों की बड़ी खेप ला रहे हैं और उसे यहां खपाने का काम करते हैं। ये सभी नोटों के खेप पाकिस्तान से लाए जा रहे थे। यहां तक कि नोटबंदी के समय भी इन भारत के शत्रुओं ने जाली नोटों को भारत में खपाने में सफलता पायी थी ।

बातें करते सार्क की
अब्बासी की नेपाल यात्रा को लेकर दोनों देश जाहिर तौर पर तो यही कह रहे हैं कि वे दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) को फिर से सक्रिय करना चाहते हैं। यह वैसे तो एक बहुत बढ़िया बात है। पर कोई जरा पाकिस्तान से यह तो पूछे कि सार्क आंदोलन को पंगु आखिरकार किया किसने ? भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क राष्ट्रों के नेताओं को व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करके इस मृतप्राय: संगठन में प्राण फूंके थे। इस लिहाज से मोदी की पहल बहुत ही महत्वपूर्ण थी। आठ देशों का संगठन दक्षेस यानि सार्क आर्थिक सहयोग, आतंकवाद के खात्मे और गरीबी उन्मूलन के लिए ठोस काम कर सकता था। लेकिन, सार्क को पाकिस्तान ने कभी पनपने का अवसर ही नहीं दिया। पाकिस्तान तो सार्क देशों में आतंकवाद फैलाने से लेकर उनके आतंरिक मामलों में दखलंदाजी के पंगे लेता रहा। यही वजह है कि पाकिस्तान के न केवल भारत से बल्कि बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भी, बेहद तनावपूर्ण संबंध हैं। कभी पाकिस्तान का ही अंग था बांग्लादेश। अब दोनों देशों के रिश्ते लगातार खराब ही होते जा रहे हैं।

आतंकवाद की फैक्ट्री पाक
वैसे यह भी कम हैरानी वाली बात नहीं है कि आतंकवाद को खाद-पानी देने वालेऔर पड़ोसी देशों के लिए परेशानी खड़ी करने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नेपाल में सार्क को फिर से सक्रिय करने पर बात करते हैं। क्या पाकिस्तान यह भूल गया कि पाकिस्तान दक्षेस का 19 वां सम्मेलन 2016 में इस्लामाबाद में आयोजित होने वाला था लेकिन भारत ने उड़ी हमले में पाकिस्तान की भूमिका का हवाला देते हुए इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया था। उस समय तीन अन्य दक्षेस देश भी भारत का साथ देते हुए सम्मेलन से अलग हो गए थे। पाकिस्तान के नकारात्मक व्यवहार के चलते ही सार्क आंदोलन अपने लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाया। हालांकि पूरी दुनिया परस्पर आर्थिक सहयोग के महत्व को अब अच्छी तरह समझने लगी है पर इस मोर्चे पर पाकिस्तान की नकारात्मक नीतियों के कारण ही अब तक अपेक्षित सफलता नहीं मिल पायी है

दरअसलए ओली ने ही नेपाल का प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन और पाकिस्तान से संबंधों को मजबूत बनाने की कोशिशें तेज की हैं। अब वे पाकिस्तान की यात्रा पर भी जाएंगे। यहां तक तो एक प्रधानमंत्री के नाते वे करें तो सब ठीक ही है। पर ओली को समझना होगा कि वे भारत के हितों की अनदेखी करके अपने देश का अहित ही करेंगे। ओली यह जरूर याद रखें कि भारत-नेपाल संबंध सामान्य पड़ोसियों जैसे नहीं हैं। भारत-नेपाल संबंधों के मूल में धर्म और संस्कृति का अटूट रिश्ता भी है। भारत ही उसे पूरे विश्व से जोड़ता भी है। इसलिए वे चीन और पाकिस्तान से संबंधों को मजबूत करने में बहुत ज्यादा हड़बड़ी न दिखाएं तो अच्छा रहेगा।
(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)

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