आलेख

मेरठ से लाल किला तक मार्च

“ह्यजो करना है, कर गुजरोह्ण और ह्यदिल्ली चलोह्ण सभी के नारे थे। बीच-बीच में ह्यहर-हर महादेवह्ण का नारा भी लगता। उनको रोकने वाला कोई नहीं था। छावनी से निकलते ही हिंदुस्तानी सिपाहियों की नजर उस काठ-गाड़ी पर पड़ी। एक झुंड लपका। पलक झपकते ही काठ-गाड़ी के परखच्चे उड़ गये। डाक के कागज निकाल कर फेंक दिये गये। चित्तु काका अपनी गाड़ी का यह हश्र होता चुपचाप देखते रहे। दुख था। लेकिन इसके टूटने में कुछ नया बनने की आशा भी थी। हिंदुस्तानी सिपाहियों ने चित्तु काका को कुछ नहीं कहा। एक मित्र सिपाही ने काका का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा और वे पहले स्वतंत्रता संग्राम के हिस्सा बन गये। दिल्ली जाने को तैयार। लेकिन इस बार बगैर काठ-गाड़ी के बगैर।”

चित्तु काका ने दिखायी राह
राकेश जावा मेरठ से 22.05.2019

दिल्ली का रास्ता चित्तु काका से बेहतर और कौन जानता? महीने में पांच-सात बार जाना ही होता था। सिपाही भी जानते थे। छावनी से निकलते ही इस बारे में बात हुई। सही रास्ता पकड़ना जरूरी था। हालांकि सिपाहियों ने मेरठ छावनी के तार काट दिये थे, लेकिन अंग्रेजों की मक्कारी पर वे सशंकित थे। दिल्ली सूचना भेजने के लिए वे कोई दूसरा रास्ता भी अपना सकते थे। लिहाजा तय हुआ कि मुख्य मार्ग छोड़ कर दूसरा रास्ता अपनाया जाये। गांव-गांव जाना सुरक्षित समझा गया। कुछ सिपाहियों के पास घोड़े थे। वे मील दो मील आगे का रास्ता देख आते। रास्ता दिखाने का काम काका को सौंपा गया। रात का समय था। अंधेरे में आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा था, लेकिन दो हजार सिपाहियों के बीच एक आदमी ऐसा भी था, जो रास्ते का जानकर भी था और भरोसेमंद भी। उसका नाम था चित्तु काका।

चित्तु काका शेरशाह द्वारा बनवाई गयी सड़क को ह्यसड़के आजमह्ण के नाम से पुकारते थे। यह नाम उन्होंने लखमीचंद से सुना था। सड़क के दोनों ओर छायादार पेड़ लगे थे। काका एक-एक गांव जानते थे। पता था- रास्ते में गोरे सिपाही मिल सकते थे। विशेष रूप से धौलाना और मुरादनगर में। परतापुर मेरठ के बहुत करीब था। दुहाई दिल्ली के करीब था। वहां भी खतरा। काठ-गाड़ी मिलने के बाद उनका यही रास्ता हुआ करता था। पहले पैदल आते थे। डाक थैला पीठ पर लादे। कुछ कागजात कंधे से लटके थैले में। साल भर से गांव वाला रास्ता छूट गया था। अब काठ-गाड़ी थी नहीं, लिहाजा काका एक साल पहले की यादों में खो गये।

पहला गांव सरधना

यात्रा शुरू हो गयी। पहला बड़ा गांव सरधना पड़ा। बेगम समरू का गांव इसकी पहचान थी। बेगम समरू बहुत हिम्मत वाली महिला थी। छोटे कद की, लेकिन थी सौंदर्य की मलिका। 14 वर्ष की आयु में उसने एक अंग्रेज सिपाही वाल्टर रेनहार्ड सांब्रे से शादी कर ली थी। उससे तलवारबाजी और बंदूक चलाना सीखा। धीरे-धीरे उसने सांब्रे को कंपनी के खिलाफ लड़ने को प्रेरित किया। कंपनी से कई लड़ाईयां जीतीं। बदले में सरधना की जागीर मिली। सांब्रे को नवाब का ओहदा मिला। समरू बेगम हो गयी। बेगम ने अपनी आजादी कभी अंग्रेजों के हाथों नहीं सौंपी। कंपनी समरू की ताकत से खौफ खाती थी। चित्तु काका ने आजादी की लड़ाई के अगुवा को सलाम किया।

बरनावा होते पहुंचे भामोरी गांव

सरधना से भामोरी गांव बरनावा होते हुए पहुंचे। रास्ते में दो छोटे गांव पांचली और जानी बुर्ज पहुंचे। इसके आगे बालानी गांव था। तब-तक उड़ते-उड़ते खबर फैल गयी थी। सबको मालूम था कि मेरठ में क्या हुआ। यह भी पता चल गया था कि मेरठ से सिपाही आ रहे हैं। कुछ उत्साही युवक दौड़कर आगे के गांव में खबर देने चले गये। उधर, सिपाही तेजी से आगे बढ़ रहे थे। किसी के चेहरे पर थकान नहीं थी। और यह खुशी कि बिजरौल पहुंचे तो बागपत दूर नहीं होगा। आधा रास्ता पार हो जायेगा। भामौरी में सिपाहियों की अगवानी में पूरा गांव उठकर चला आया। आधी रात होने को थी। गांव वाले चाहते थे कि सिपाही थोड़ी देर आराम कर लें, लेकिन कोई नहीं रुका।

बिजरौल बड़ा गांव था और संपन्न भी था। अच्छी जमीन और पानी। हरी सब्जियों के लिए दिल्ली तक मशहूर। सिपाहियों के आने की सूचना मिली तो गांव के बुजुर्ग एकत्र हुए। एक ने कहा, सिपाहियों के खाने का बंदोबस्त करना चाहिए। भूख लग आयी होगी। शाम से निकले हैं और अब आधी रात होने को है। फौरन खाने की तैयारियां शुरू हो गयीं। महिलाएं खाना बनाने के काम में लग गयीं। कुछ बुजुर्ग सिपाहियों की अगवानी को आधा मील आगे चले गये। उनको साथ लेकर आने के लिए। जब बिजरौल के बुजुर्ग सिपाहियों की आगवानी के लिए जा रहे थे, तो उनके साथ लाठियां और भाले भी थे। रात में जंगली जानवर खेतों की ओर आते थे।

सिपाहियों ने खेत के किनारे भीड़ देखी तो सजग हुए। हथियार संभाल लिए। एक बुजुर्ग ने आगे बढ़कर कहा, ह्यसितारा गिर पड़ेगाह्ण। ह्यसब लाल होगाह्ण। इस जवाब से सारा संदेह दूर हो गया। भोजन के प्रस्ताव को सिपाहियों ने स्वीकार कर लिया। भूख तो लगी ही थी। रास्ते में और खाना खाते समय बातचीत नहीं के बराबर हुई। न तो सिपाही बोले और न ही गांव वाले। सिपाही जब चलने लगे तो औरतों ने एक घड़े में पानी रखकर उसके ऊपर आम के पत्ते रख दिये।

पिछले पांच घंटों में बहुत कुछ बदल गया था। मेरठ पीछे छूट चुका था। स्थिति की गंभीरता का एहसास सबको था। अगली मंजिल दिल्ली थी। सिपाहियों ने नारा लगाना बंद कर दिया था। यह जरूरी भी था। चुपचाप लगभग दौड़ते हुए दिल्ली पहुंचने की जल्दी थी। दिन निकलने से पहले अगला गांव डौला था। इसके बाद टटेरी और काठा। वहां से खेकड़ा जोहड़ी। रात तीन-साढ़े तीन का समय होगा। अंदाजा था कि गांव का रास्ता पांच-सात मील लंबा है। रफ्तार बढ़ा दी गयी। सिपाही तड़के पांच बजे लोनी पहुंच गये। शाहदरा। फासला अब बस कुछ मील का ही था।

नावों को उलट कर यमुना में बनाया पुल

आगे यमुना थी। चौड़ा पाट। खूब पानी। इतनी नाव नहीं थीं कि सब एक साथ पार उतर सकें। कुछ का ख्याल था कि मुंह अंधेरे नदी पार कर ली जाये। वह भी तैर कर। लेकिन समस्या हथियारों की थी। हाथ में बंदूक लिए तैरना संभव नहीं था। अंत में पुल से नदी पार करने का फैसला लिया गया। पुल नावों को उल्टा कर बनाया गया था। तेज बहाव में बह भी जाया करता था, लेकिन उस दिन पुल था। पूरा और सही सलामत।

कर्नल रिप्ले के सीने में लगी गोली

11 मई, सोमवार सुबह सात बजे। नदी पार कर हिंदुस्तानी सिपाही लालकिले की दीवार के पास एकत्र हुए। महल बस कुछ कदम दूर था। बहादुर शाह जफर से मुलाकात होनी थी। लेकिन कुछ अवरोध अभी शेष थे। इस बीच पता चला कि अंग्रेजों को मेरठ के संघर्ष की खबर लग गयी थी। कर्नल रिप्ले ने 54वीं पलटन को आगे बढ़कर मुकाबला करने का आदेश दिया। अगले ही पल वे मेरठ के सिपाहियों के सामने थे। फासला कुछ गज का ही था। दोनों ओर हिंदुस्तानी सिपाही। दोनों शांत। एक मिनट, दो मिनट। रिप्ले के लिए वह समय सदियों की तरह बीता। अंग्रेज अधिकारी अगला आदेश देता, इससे पहले उसने अजीब दृश्य देखा। दोनों ओर के सिपाहियों ने एक-दूसरे को सलामी दी। गले मिले। बादशाह की जय जयकार हुई। तभी पहली गोली चली। उस गोली ने रिप्ले का सीना फाड़ दिया और वह जमीं पर किसी कटे वृक्ष की भांति कट कर गिर पड़ा।

अलग-अलग टुकड़ियां बनीं

दिल्ली के सिपाहियों ने तीसरी कैवलरी के सेनानियों को शहर के अंदर आमंत्रित किया। वही टुकड़ी, जिसे मेरठ जेल से आजाद कराया गया था। सिपाहियों ने वहीं तय कर लिया था कि यही टुकड़ी दिल्ली में सबसे आगे होगी। मेरठ और दिल्ली के सिपाही एक साथ कश्मीरी गेट से शहर में घुसे। दूसरी टूकड़ी कलकत्ता गेट से दाखिल हुई। घुसते ही मारकाट शुरू। जो सामने पड़ा, मारा गया। दरियागंज की ओर कुछ ज्यादा। फिरंगियों के घरों में आग लगा दी गयी। औरतें और बच्चे भी मारे गये। हर तरफ धुआं, चीख पुकार। सिपाही महल की ओर बढ़ रहे थे। फिरंगी अधिकारी कमीश्नर फ्रेजर ने रोकने की कोशिश की, लेकिन मारा गया।

लाल किले पर स्वतंत्रता सेनानियों का कब्जा

अब लाल किले पर स्वतंत्रता सेनानियों का कब्जा हो चुका था। सिपाही अंदर घुसे तो पीछे-पीछे भारी भीड़ भी अंदर आ गयी। स्वतंत्रता सेनानी बहादुर शाह जफर से मिलना चाहते थे। आमने- सामने। लेकिन रास्ते में कैप्टन डगलस आ गया। भीड़ ने उसे रास्ते से हटा दिया। बादशाह इस घटनाक्रम से खुद हैरान था। उसको तो स्वतंत्रता संग्राम की तारीख 31 मई मालूम थी। अभी 20 दिन शेष थे। अगर स्वतंत्रता की लड़ाई तब होनी थी तो अब क्या हो रहा है? जफर ने सोचा, कहीं यह षडयंत्र न हो? लेकिन हालात कुछ और कह रहे हैं। अंतत: जफर ने अपने सलाहकारों से मंत्रणा कर सिपाहियों से मुलाकात करने का निर्णय कर लिया।

बहादुरशाह जफर का प्रस्ताव

सिपाहियों ने बहादुरशाह जफर से स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व स्वीकार करने करने का आग्रह किया। जफर ने खजाना खाली होने और वेतन देने में असमर्थता व्यक्त की। इस पर सिपाहियों ने जफर से वायदा किया कि वे अंग्रेजों का खजाना लूट कर आपको दे देंगे। लेकिन बहादुर शाह जफर के दिल में अंग्रेजों की दहशत इस कदर थी कि उसने सैनिकों का नेतृत्व करने से इंकार कर दिया। बावजूद जफर के इंकार से सिपाहियों का मनोबल नहीं टूटा। सिपाहियों की नजर अब अंग्रेजों के तोपखाने और गोला-बारूद पर थी। एक गोदाम लालकिले के ठीक बगल में था। दूसरा वजीराबाद में। सिपाही दोनों के बारे में जानते थे और उनको पता था कि उन भंडारों पर कब्जा करना जरूरी था। इसके बिना दिल्ली पर कब्जे का कोई मतलब नहीं है। पहली कोशिश पहले दिन ही की। सिपाहियों की एक टुकड़ी गोदाम पर पहुंच गयी। अंदर कुछ अंग्रेज और हिंदुस्तानी सिपाहियों की एक टुकड़ी थी। गोलीबारी शुरू हो गयी।

अंग्रेजों को समझ में आ गया कि अब बच निकलना संभव नहीं है। असलहा अगर हिंदुस्तानी सिपाहियों के हाथ लगा तो एक चिंगारी से अंग्रेजी हुकूमत उड़ जायेगी। रास्ता एक ही था। बारूद को खुद आग लगा देना। अचानक हजारों तोपों के एक साथ चलने की आवाज आयी। लपटें आसमान तक छू रही थीं। आवाज इतनी भयानक थी कि यमुना पार भी दहशत फैल गयी। धमाके में सैकड़ों लोग मारे गये। लेकिन दूर वजीराबाद में बारूद गोदाम स्वतंत्रता सैनिकों के कब्जे में आ गया था। इससे सिपाहियों की ताकत बढ़ गयी।

दिल्ली पर कब्जे के बाद भी मारकाट

दिल्ली पर कब्जा तो पहले दिन ही हो गया था, लेकिन सड़कों पर मारकाट पांच दिन तक चलती रही। यह समय था 11 से 16 मई तक। ऐसे हमले के लिए अंग्रेज तैयार नहीं थे। उन पर यह दोहरा हमला था। एक तरफ तो स्वतंत्रता सेनानी थे तो दूसरी ओर जन सेना। दोनों ओर से घिरे अंग्रेजों के सामने भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। अंग्रेजों को अपने परिवारों और मृतकों के बारे में भी सोचने का समय नहीं था। जो छूटा, उसे हमेशा के लिए छूटा मान लिया। अंग्रेज यमुना पुश्ते के पश्चिमी रिज की ओर जा छिपे। ह्यबात सिर्फ उन पांच दिनों की नहीं थी। किसी ने कुछ नहीं पूछा तो कुछ रुक कर।ह्ण चित्तु काका ने कहा, सिपाही स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगा चुके थे। अंग्रेज असहाय और निरीह दिख रहे थे। उन्होंने माना कि हिंदुस्तानियों की ताकत उनकी एकता और उनका चारित्रिक बल था। उस उन्माद की खुशी में कुछ भी हो सकता था। लेकिन कुछ नहीं हुआ। औरतें मारी जरूर गयीं, लेकिन किसी ने उनको हाथ तक नहीं लगाया। काका उठ कर खड़े हो गये। एक बार फिर कुर्ते से आंख के आंसू पोंछे।