रांची

निदेशक की कार्यप्रणाली से डॉक्टरों में रोष, खमियाजा भुगत रहे मरीज

मरीजों को समुचित चिकित्सा का लाभ नहीं मिल पा रहा है

वरुण सिन्हा 11.06.2019

रांची : रिम्स निदेशक की कार्यप्रणाली से चिकित्सकों एवं पीजी छात्रों में अच्छा खासा रोष अभी जारी है, जिसका खमियाजा अस्पताल में भर्ती मरीजों एवं उनके परिजनों को उठाना पड़ रहा है। मरीजों का समुचित चिकित्सा का लाभ नहीं मिल पा रहा है। रिम्स ओपीडी हो या इनडोर, मरीजों को इलाज के लिए अस्पताल में उपलब्ध दवा ही डॉक्टर लिख रहे हैं। बाहर की दवा नहीं लिख रहे हैं। इससे मरीजों के इलाज पर भी आफत आ गयी है। रिम्स में बाहर से बेहतर इलाज की चाह में आने वाले मरीजों को निराशा ही हाथ लग रही है।

कई गंभीर मरीजों का इलाज पूरी तरह प्रभावित हो रहा है। इस संबंध में पूछे जाने पर कई डॉक्टरों ने रिम्स निदेशक के कार्य प्रणाली पर रोष जताया है। साथ ही कहा कि रिम्स मेडिकल इंस्टीच्यूट है, जहां कई ऐसे गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीज बेहतर इलाज के लिए आते हैं। उन्हें बाहर की दवा भी लिखना पड़ता है। सभी बीमारियों के लिए एक जैसा दवा नहीं लिखा जा सकता है। कुछ दवा का कम्बीनेशन ऐसा होता है कि बाहर की दवा लिखना ही पड़ता है। रिम्स प्रबंधन डॉक्टरों पर बाहर की दवा लिखने पर कार्रवाई कर रही है। ऐसे में डॉक्टर क्यों अपनी बेइज्जती उठायेगा।

जानकारों का कहना है कि रिम्स प्रबंधन इस मामले पूरी तरह असंवेदशील बनी हुई है। इससे रिम्स की छवि खराब हो रही है, वहीं डॉक्टरों के प्रति विश्वास में भी कमी हो रही है। डॉक्टरों का कहना है कि पहले सरकारी अस्पतालों में लिखा होता था कि आवश्यकता पड़ने पर बाहर से दवा लाया जा सकता है।

लेकिन राज्य सरकार और रिम्स प्रबंधन न तो अस्पताल में पर्याप्त दवा उपलब्ध करा पा रही है और न मरीजों के बेहतर इलाज के लिए बाहर से दवा मंगाने दे रही है मरीजों को घूट घूट कर मरने को मजबूर किया जा रहा है। गरीब और लाचार मरीजों को जो प्राइवेट अस्पताल में इलाज नहीं करा सकते वही सबसे ज्यादा परेशान हैं। संपन्न लोग तो प्राइवेट अस्पताल में अपना इलाज करा रहे हैं। समय रहते सरकार अगर इस मामले पर गंभीर नहीं हुआ तो आने वाले समय में अस्पताल में बेहतर इलाज के अभाव में मरीजों की मौत को नहीं रोका जा सकेगा।